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US stand on investigation of Corona origin

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छानबीन से कोरोना का स्रोत तक पहुंचना संभव

अवधेश कुमार

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन द्वारा नए सिरे से कोरोनावायरस की उत्पत्ति की जांच के आदेश के बाद फिर संभावना बढ़ी है कि शायद हमारे सामने सच आए। बिडेन ने अपनी खुफिया एजेंसियों से इसका स्रोत खंगालने की कोशिशों में केवल तेजी लाने को नहीं कहा बल्कि 90 दिनों के भीतर एक विस्तृत विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का भी आदेश दिया है। बिडेन ने कहा कि मैंने यह निर्देश उस खुफिया रिपोर्ट के संदर्भ में दिया है जिसमें महामारी के खुलासे से पहले 2019 में वुहान इंस्टीच्यूट ऑफ वायरोलोजी यानी वुहान विषाणु विज्ञान संस्थान के तीन शोधकर्ताओं में कोरोना से मिलते-जुलते लक्षण उभरने के बाद अस्पताल में भर्ती होने का दावा किया गया था। बिडेेन अपने निर्देश में कहा है कि वायरस की उत्पत्ति से जुड़ी सूचना जुटाने और उनका विश्लेषण करने का प्रयास तेज करें। इस प्रयास में अमेरिकी प्रयोगशालाओं और सरकारी एजेंसियों के तरफ से की गई पड़ताल भी शामिल करने की बात है ताकि वायरस की और गहरी समझ हासिल हो सके।

कोरोना प्रकोप सामने आने के समय से ही से संपूर्ण विश्व इसकी उत्पत्ति के स्रोत के बारे में भी जानना चाहता है। डेढ़ वर्ष के बाद भी यह प्रश्न अनुत्तरित है कि विश्व भर में तबाही मचाने वाले इस वायरस की उत्पत्ति कहां हुई? विश्व का शायद ही कोई कोना हो जहां संदेह की उंगलियां चीन की ओर नहीं उठी। अब अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन द्वारा नए सिरे से कोरोनावायरस की उत्पत्ति की जांच के आदेश के बाद फिर संभावना बढ़ी है कि शायद हमारे सामने सच आए। बिडेन ने अपनी खुफिया एजेंसियों से इसका स्रोत खंगालने की कोशिशों में केवल तेजी लाने को नहीं कहा बल्कि 90 दिनों के भीतर एक विस्तृत विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का भी आदेश दिया है। बिडेन ने कहा कि मैंने यह निर्देश उस खुफिया रिपोर्ट के संदर्भ में दिया है जिसमें महामारी के खुलासे से पहले 2019 में वुहान इंस्टीच्यूट ऑफ वायरोलोजी यानी वुहान विषाणु विज्ञान संस्थान के तीन शोधकर्ताओं में कोरोना से मिलते-जुलते लक्षण उभरने के बाद अस्पताल में भर्ती होने का दावा किया गया था। बिडेेन अपने निर्देश में कहा है कि वायरस की उत्पत्ति से जुड़ी सूचना जुटाने और उनका विश्लेषण करने का प्रयास तेज करें। इस प्रयास में अमेरिकी प्रयोगशालाओं और सरकारी एजेंसियों के तरफ से की गई पड़ताल भी शामिल करने की बात है ताकि वायरस की और गहरी समझ हासिल हो सके। दूसरी और अमेरिका और ब्रिटेन तथा उसके बाद कई देशों ने विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्लूएचओ को कहा है कि कोविड-19 की उत्पत्ति के स्रोत की संभावनाओं को फिर गहराई से देखा जाए। इनकी मांग में यह भी शामिल है कि जांच दल फिर चीन का दौरा करे। भारत ने भी इसका समर्थन कर दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि कोविड-19 की उत्पत्ति पर डब्ल्यूएचओ की तरफ से वैश्विक अध्ययन कराया जाना एक महत्वपूर्ण कदम है। इस अध्ययन को आगे बढ़ाने और एक ठोस नतीजे तक पहुंचने की जरूरत है। निस्संदेह, भारत का बयान अति संतुलित है। वायरस से बार-बार पीड़ित होते देश की ओर से जैसी दृढ़ता और स्पष्टता होनी चाहिए वैसा न होना थोड़ा निराश करता है।


बहरहाल, जैसा हम जानते हैं पिछले कुछ समय से अलग-अलग देशों की मीडिया में कई स्रोतों से यह समाचार दिया जा रहा है कि कोरोना वायरस चीन की प्रयोगशाला में उत्पन्न किया गया और वहीं से यह दुनिया में फैला। विश्व समुदाय के बढ़ते दबाव के बीच पिछले वर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ ने एक संयुक्त जांच दल का गठन किया था जिसमें चीन के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। यह दल अस्पतालों, हुनान सीफूड मार्केट, वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी और वुहान सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल की प्रयोगशालाओं के साथ अस्पतालों में भी गया। बावजूद संयुक्त जांच रिपोर्ट में ऐसी कोई बात नह आई जिसे नया कहा जाए। वायरस फैलने को लेकर कई बातें कही जा रही है। एक, संभवतः चमगादड़ से निकलकर वायरस किसी और जानवर में होते हुए मनुष्य में पहुंचा है। चीन का कहना है कि वायरस प्राकृतिक है। हालांकि इसकी पुष्टि के लिए कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला। दूसरा, एक समूह का कहना है कि वुहान इंस्टीट्यूट आफ वायरोलॉजी में वायरस पर प्रयोग चल रहा था और वहीं से गलती से लिक हो गया। तीसरा, कई वैज्ञानिक शोधकर्ता आदि यह भी कह रहे हैं कि चीन भविष्य में जैविक युद्ध का ध्यान रखते हुए प्रयोग कर रहा था। इस समूह के अनुसार कोरोना वायरस 2020 में अचानक नहीं आया, बल्कि इसकी तैयारी चीन 2015 से कर रहा था। चीन की सेना छः वर्ष पहले से कोविड-19 वायरस को जैविक हथियार की तरह इस्तेमाल करने की साजिश रच रही थी। सबसे पहले द वीकेंड ऑस्ट्रेलियन ने अपनी एक रिपोर्ट में यह बात कही। रिपोर्ट में चीन के एक रिसर्च पेपर को आधार बनाने का दावा है। इसमें कहा गया कि चीन छह साल पहले से सार्स वायरस की मदद से जैविक हथियार बनाने की कोशिश कर रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक चीनी वैज्ञानिक और स्वास्थ्य अधिकारी 2015 में ही कोरोना के अलग-अलग स्ट्रेन पर चर्चा कर रहे थे। उस समय चीनी वैज्ञानिकों ने कहा था कि तीसरे विश्वयुद्ध में इसे जैविक हथियार की तरह उपयोग किया जाएगा। इस बात पर भी चर्चा हुई थी कि इसमें हेरफेर करके इसे महामारी के तौर पर कैसे बदला जा सकता है। ब्रिटेन के द सन अखबार ने द ऑस्ट्रेलियन की तरफ से जारी रिपोर्ट के हवाले से कहा कि अमेरिकी विदेश विभाग के हाथ लगे विस्फोटक दस्तावेज दर्शाते हैं कि चीन की पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी (पीएलए) के कमांडर यह घातक पूर्वानुमान जता रहे थे। इसके अनुसार अमेरिकी अधिकारियों को मिले दस्तावेज वर्ष 2015 में कोविड-19 की उत्पत्ति के संबंध में जांच करने वाले सैन्य वैज्ञानिकों और वरिष्ठ चीनी स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा लिखे गए थे। कुछ रिपोर्ट में पीएलए के दस्तावेजों का भी उल्लेख है। इसके अनुसार इसमें दर्शाया गया है कि जैव हथियार हमले से दुश्मन के चिकित्सा तंत्र को ध्वस्त किया जा सकता है। दस्तावेजों में अमेरिकी वायुसेना के कर्नल माइकल जे के कार्यों का भी जिक्र किया गया है, जिन्होंने इस बात की आशंका जताई थी कि तीसरा विश्व युद्ध जैविक हथियारों से लड़ा जा सकता है। दस्तावेजों में इस बात की भी आशंका उठाई गई है कि चीन में वर्ष 2003 में फैला सार्स एक मानव-निर्मित जैव हथियार हो सकता है, जिसे आंतकवादियों ने जानबूझकर फैलाया हो।


स्वाभाविक ही चीन ने इसका कड़ा विरोध किया है। सरकारी पत्र ग्लोबल टाइम्स ने तीखे शब्दों में दी आस्ट्रेलियन की आलोचना की और इसे चीन की छवि खराब करने का कारनामा कहा। हालांकि ऑस्ट्रेलियाई साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट रॉबर्ट पॉटर ने कहा कि चीनी रिसर्च पेपर का गहरा अध्ययन करने के बाद मेरा निष्कर्ष कि रिसर्च पेपर बिल्कुल सही है। हम चीन के रिसर्च पेपर पर अध्ययन करते रहते हैं। इससे पता चलता है कि चीनी वैज्ञानिक क्या सोच रहे हैं। इसमें सच क्या है यह जानना ही होगा। विश्व की इतनी वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद चारों तरफ कोहराम मचाने वाले वायरस के स्रोत का पता न चले इससे शर्मनाक कुछ नहीं हो सकता। वायरस का स्रोत पता चलने से अगर चीन ने इसे जानबूझकर फैलाया तो फिर वह खलनायक बनेगा एवं विश्व समुदाय उसके खिलाफ कदम उठाएगी जिससे दूसरा कोई देष ऐसा न कर सके। चीन दोषी साबित न हुआ तो भी इससे इलाज, भविष्य में इससे बचाव का रास्ता निकलेगा या इसके अंत की भी संभावनाएं बन सकती है। प्रश्न है कि क्या वाकई जांच के आधार पर इसकी उत्पत्ति की जानकारी मिल सकती है?
यह बात ठीक है कि किसी जांच के पूर्व कोई धारणा बनाना ठीक नहीं है। पर चीन से इसकी उत्पत्ति पर फोकस रहना आवश्यक है। ऐसा नहीं हुआ तो ज्यादा संभावना है कि इसकी उत्पत्ति की सही जानकारी नहीं आए। आखिर चीन से यह निकला इसे लेकर तो कोई संदेह नहीं है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप स्पष्ट रूप से इसे चीनी वायरस कहते थे। अब यह सामने आया है कि ट्रंप अपनी ओर से नहीं बोल रहे थे , शीर्ष वैज्ञानिकों, मेडिकल सलाहकारों, खुफिया एजेंसियों आदि ने उनको सूचना दी थी कि चीन के द्वारा यह निर्मित वायरस है। बिडेन के इस आदेश के पहले ट्रंप कार्यकाल के विदेश मंत्री माइक पौम्पियो ने बयान दिया था कि चीन अपनी प्रयोगशाला में वायरस के भविष्य में युद्ध में उपयोग करने की दृष्टि से प्रयोग कर रहा था और उसी ने वायरस फैलाया है। अमेरिका की कई बड़ी हस्तियों ने इस तरह के बयान दिए, मीडिया में भी इस तरह की खबरें लगातार आईं और जो बिडेन प्रशासन पर दबाव बढ़ा कि वह इसकी जांच कराकर सही निष्कर्ष सार्वजनिक करें। ध्यान रखिए कि अभी तक स्वयं जो बिडेन ने कोरोनावायरस और चीन की भूमिका को लेकर कुछ नहीं कहा है। बिडेन ट्रंप की चीन नीति को बदलना चाहते थे। पर इस समय कोरोना को लेकर देश के अंदर माहौल अलग है। स्वयं उनकी पार्टी और प्रशासन के अंदर भी यह भाव गहरा है कि इस समय दुनिया में त्राहि-त्राहि का मूल कारण चीन है। तो अमेरिकी एजंेसियों की जांच रिपोर्ट का इंतजार करिए। हालांक अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर के कार्यालय की प्रवक्ता अमांडा शोस ने कहा है कि अभी खुफिया एजेंसियों के पास किसी निष्कर्ष पर पहुंचने लायक तथ्य नहीं है। राष्ट्रपति ने जो समय सीमा दी है उसमें रिपोर्ट सौंप दी जाएगी। लेकिन ज्यादा संभव है कि जांच समय सीमा में पूरी न हो और इसे आगे भी चलाना पड़ सकता है। टामांडा शोस के बयान का एक अर्थ यह है कि खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट की बात तो सच है लेकिन इसमें निश्चयात्मक जैसे तथ्यों की कमी है।


इसके साथ डब्लूएचओ की दूसरी जांच और उसके बाद की रिपोर्ट की भी प्रतीक्षा की जाएगी। चीन से सच बाहर निकालना लगभग असंभव है। उसने पहले डब्ल्यूएचओ की जांच का विरोध किया। चीन किसी तरह की जांच को अपने को दोषी ठहराने के प्रयास के रुप में देखेगा और हर हाल में इसे बाधित करना चाहेगा। ऐसा उसने विश्व स्वास्थ्य संगठन की जांच दल को लेकर भी किया। चीन से सच निकनना कितना कठिन है इसका प्रमाण डब्ल्यूएचओ के जांच दल के सदस्यों का बयान और रिपोर्ट है।उदाहरण के लिए इसमें शामिल रुस के प्रतिनिधि ब्लादिमीर देवकोव ने वुहान के हुन्नान बाजार का दौरा करने के बाद बयान दिया कि यहां से वायरस फैलने की पूरी संभावना मौजूद हैं, पर इसका यह मतलब नहीं कि यह यहीं से फैला। इस बाजार में सब्जी के साथ समुद्री और अलग-अलग प्रकार के मांस बेचे जाते हैं। कहा जाता है कि कोरोना से शुरू में संक्रमित होने वाले लोग भी इस बाजार में काम करते थे। इसे बंद कर दिया गया था। उन्होंने कहा कि यह भी स्पष्ट नहीं है कि कोरोना वायरस वुहान में ही फैला। शायद वायरस दूसरी जगह उत्पन्न हुआ लेकिन वुहान में कोरोना के प्रसार की सभी स्थितियां मौजूद हैं, इसलिए यहां फैला। देवकोव ने यह कहते हुए प्रकारांतर से चीन को दोषमुक्त भी कर दिया कि वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में सभी चीजें अच्छी तरह से व्यवस्थित हैं और शायद ही कोई इस संस्थान से लीक की कल्पना कर सकता है। दिसंबर 2019 में देवकोव ने कहा था कि बेशक, हमारे मिशन के लिए इस केंद्र का दौरा करना, हमारे सहयोगियों से बात करना और यह देखना जरूरी था कि वहां सब कुछ कैसे व्यवस्थित है। यह सुव्यवस्थित है। मुझे नहीं पता कि किसने इसकी आलोचना की, प्रयोगशाला पूरी तरह से सुसज्जित है, मेरे लिए यह कल्पना करना कठिन है कि वहां से कुछ लीक हो सकता है।
इस तरह के बयान का मतलब क्या है? यह आरोप तो पहले से है कि चीन ने सारे सबूत नष्ट कर दिए हैं। इससे यह भी स्पष्ट है उसने जांच दल के सदस्यों को प्रभावित करने में सफलता पाई। दल ने जिनयांतन के उस अस्पताल का भी दौरा किया जहां 2020 की शुरुआत में अज्ञात वायरस से पीड़ित लोगों का इलाज किया गया था। चीन के अनुसार कोरोना संक्रमण के पहले मरीज का इलाज हुबेई इंटिग्रेटेड चाइनीज एंड वेस्टर्न मेडिसीन हॉस्पिटल में हुआ था। यहां कोविड-19 का पहला मामला 27 दिसंबर, 2019 को सामने आया था। इतने दौरे के बाद उसके हाथ कुछ न लगना बताता है कि या तो जांच ठीक से नहीं हुई या नहीं करने दी गई या फिर इनने जानबूझकर केवल खानापूर्ति की। ऐसा न हो कि उसी की पुनरावृत्ति हो जाए। इसलिए अमेरिका सहित विश्व के प्रमुख देश उन दबाव बनाएं रखने के साथ नजर भी रखें ताकि अगर संदेह भी पैदा हो तो उसे रिपोर्ट में स्थान मिल सके। उससे निष्कर्ष निकाला जा सकता है। हालांकि विश्व इससे कहीं ज्यादा उत्कंठा से अगले 90 दिनों के अंदर आने वाले अमेरिकी रिपोर्ट की प्रतीक्षा करेगा।

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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