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Toolkit in corona crisis

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मोदी विरोधी दुष्प्रचार के लिए टूलकिट द्वारा कोरोना महाआपदा के वीभत्स दुरुपयोग का अपराध

अवधेश कुमार

महामारी के दौर में सरकार और भारत तथा एक धर्म के विरुद्ध दुनिया भर में झूठ फैलाने का अपराध इस टूलकिट के माध्यम से किया गया है। मानवीय विनाश वाली एक महाआपदा को कैसे हथियार बनाकर राजनीति की जा सकती है इसका सबसे गिरा हुआ और नीच उदाहरण टूलकिट के प्रायोजकों ने पेश किया है। चारों ओर मचे हाहाकार की सूचनाएं और तस्वीरें देखकर लंबे समय तक किसी की समझ में ही नहीं आया कि आखिर हो क्या रहा है। दुर्भाग्य से सोशल मीडिया पर तो टूलकिट के माध्यम से फैलाया जा रहा झूठ व्यापक रूप से प्रसारित हो ही रहा था मुख्यधारा की मीडिया में पत्रकारों के बड़े वर्ग ने इन सूचनाओं, तथ्यों, तस्वीरों और विचारों को आगे बढ़ाया। इनमें से ज्यादातर ने जांचने की भी कोशिश नहीं की टूलकिट से जो कुछ दिए जा रहे हैं वाकई में सच है भी या नहीं।

देश में कोरोना के कहर के कारण मचे हाहाकार और भयावह दृश्यों को कोई नकार नहीं सकता। किंतु पूरे देश मैं जिस तरह की दहशत और दुनिया में कोरोना के समक्ष भारत की विफल राष्ट्र की जैसी ह्रयदयविदारक तस्वीरें लगातार पेश की जाती रहीं उनसे करोड़ों लोग विस्मित थे। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कोरोना के मामले देशभर में कम हुए हैं। तो उसी अनुपात में हाहाकर भरी सूचनाएं भी कम होनी चाहिए, वैसी भयावह तस्वीरें, सूचनाएं तथा सोशल मीडिया का हाहाकार लगभग रुक गया है। टूलकित को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच जारी द्वंद को कुछ समय के लिए छोड़ दीजिए। सोशल मीडिया पर टूलकिट संबंधी भाजपा के आरोपों की खिल्ली उड़ाने वाले महाज्ञानियों की भी तत्काल अनदेखी करिए। पहले कुछ पैदा होते सवालों का उत्तर तलाशिए। मसलन, अचानक रेमदेसीविर का हाहाकार कहां चला गया ,ऑक्सीजन की त्राहि-त्राहि कैसे खत्म हो गई, श्मशानों में जलती चिताओं की भयावह तस्वीरें भारतीय व विदेशी मीडिया में आनी कैसे बंद हुई आदि आदि आदि? टूलकिट का निरीक्षण करने के बाद साफ होता है कि उसका कितना प्रभाव हुआ नहीं हुआ इस पर विवाद हो सकता है लेकिन इससे नहीं कि उसके माध्यम से कोरोना आपका को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ,मोदी सरकार, भारत, महाकुंभ जैसे हिंदुत्व के सांस्कृतिक आयोजनों आदि की विकृत छवि बनाने का पूरा षड्यंत्र किया गया और कुछ समय तक इसे सूत्रधार सफल भी रहे। कांग्रेस ने आरोपों को नकारते हुए एफआईआर दर्ज करा दिया है जिसमें टूलकिटको भाजपा की साजिश है कहा गया है। मामला उच्चतम न्यायालय में भी गया है। हम अभी इनकी कानूनी परिणतियों में नहीं जाना चाहेंगे। हालांकि अगर यह साबित हो जाए कि वाकई कांग्रेस पार्टी ने यह टूलकिट बनवाया और इसका संचालन किया तो इसके पीछे के कई चेहरों को देशद्रोह तक के मुकदमे झेलने पड़ सकते हैं। पर मूल बात इसकी घृणित मंशा है।


इससे तो इन्कार नहीं किया जा सकता कि एक महामारी के दौर में सरकार और भारत तथा एक धर्म के विरुद्ध दुनिया भर में झूठ फैलाने का अपराध इस टूलकिट के माध्यम से किया गया है। मानवीय विनाश वाली एक महाआपदा को कैसे हथियार बनाकर राजनीति की जा सकती है इसका सबसे गिरा हुआ और नीच उदाहरण टूलकिट के प्रायोजकों ने पेश किया है। चारों ओर मचे हाहाकार की सूचनाएं और तस्वीरें देखकर लंबे समय तक किसी की समझ में ही नहीं आया कि आखिर हो क्या रहा है। दुर्भाग्य से सोशल मीडिया पर तो टूलकिट के माध्यम से फैलाया जा रहा झूठ व्यापक रूप से प्रसारित हो ही रहा था मुख्यधारा की मीडिया में पत्रकारों के बड़े वर्ग ने इन सूचनाओं, तथ्यों, तस्वीरों और विचारों को आगे बढ़ाया। इनमें से ज्यादातर ने जांचने की भी कोशिश नहीं की टूलकिट से जो कुछ दिए जा रहे हैं वाकई में सच है भी या नहीं। न महाकुंभ में आए लोगों और उनमें संक्रमितों की संख्या, जिन राज्यों से ज्यादातर लोग आए वहां संक्रमण, हरिद्वार आदि की स्थिति को जांचने परखने की कोशिश हुई न संबंधित दवाइयों के हाहाकार तथा ऑक्सीजन के स्थितियों की। विदेशी अखबारों में भारत की समस्याओं में जलती चिताओं की ऐसी तस्वीरें छापी गईं और उन पर टिप्पणियां ऐसे लिखी गई मानो भारत में कोरोना के कारण केवल मौतें ही हो रही हैं । न्यूयॉर्क टाइम्स के पहले पृष्ठ पर राजधानी दिल्ली में श्मशान घाट में जलती चिताओं की बड़ी तस्वीरें किसे याद नहीं होंगी। जिस ढंग से भारत में सोशल मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया में वो तस्वीर तथा रिपोर्ट चलती रही अब उसका स्रोत समझ में आ रहा है।


लंदन टाइम्स में मोदी सरकार की तीखी आलोचना वाली रिपोर्ट हो या ऑस्ट्रेलिया के एक समाचार पत्र में उस रिपोर्ट का पुनर्प्रकाशन, सब भारत सहित अन्य देशों में संचारित होती रहे। लांसेट जैसी विज्ञान की पत्रिका के चीनी मूल की एशिया संपादक ने राजनीतिक लेख लिखकर मोदी के लिए अक्षम्य अपराध तक की बात कही और उसके वेबसाइट पर आते-आते भारत में न केवल सोशल मीडिया बल्कि मुख्यधारा की मीडिया की वेबसाइटों पर उसके अंश नजर आने लगे। ऐसे-ऐसे मनगढंत तथ्य टूलकिट के माध्यम से दिए गए जिन से साबित होता था कि मोदी सरकार अपनी फासीस्ट नीतियों के अंधेपन में धर्म के नाम पर महाकुंभ का आयोजन होने दे रही है और यह भारत में कोरोना के प्रसार का सबसे बड़ा कारण बन गया है। यह भी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोरोना के वर्तमान महाआपदा को फैलाने के एकमात्र खलनायक तथा विफलता के नायक हैं, स्थिति उनके नियंत्रण से बाहर हैं। न वो ठीक से उपचार का प्रबंधन कर रहे हैं और न बचाव का। यानी मोदी सरकार कोरोना के समक्ष घुटने टेक चुकी है और जनता भगवान भरोसे है। बीमारी और मौतों से चारों ओर चीत्कार का आलम है। विधानसभा चुनावों को लेकर ऐसी छवि बनाई गई जैसे केवल नरेंद्र मोदी औरभाजपा ही चुनाव अभियान चला रही है और यह कोरोना के प्रसार का एक बड़ा कारण बन गया। योजनाबद्ध तरीके से सोशल मीडिया के माध्यम से उसे विश्व के अनेक देशों व वैश्विक संस्थाओं को भेजा जाता रहा।


इन सबसे यह निष्कर्ष तो निकलता है कि मानवीय संकट की आड़ में बुने गए षडयंत्र के पीछे गहन योजना थी। एक पूरा चक्र बना हुआ था जिसमें अलग-अलग समूहों की भूमिका तय रही होगी, अन्यथा इतने व्यवस्थित और आक्रामक तरीके से सब कुछ संचालित होता नहीं रहता। दुर्भाग्य देखिए कि इसी आधार पर दुनिया के प्रमुख लोगों ने अपने बयान भी दे दिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्यक्ष ने बयान दिया कि भारत की दशा को व्यक्त करने के लिए हृदय विदारक शब्द भी छोटा है। किस तरह मोदी सरकार की विश्वसनीयता को संदिग्ध बनाने का अभियान चल रहा था उसका एक उदाहरण और देखिए। ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर पैट कमिंस और ब्रेट ली ने प्रधानमंत्री केयर्स फंड में पैसा दिया। उन्होंने कहा कि भारत के प्रति उनके दिल में प्रेम है। ट्विटर पर अभियान आरंभ हो गया। यह कहा गया कि अरे इसमें पैसा मत डालो इससे तो भाजपा का चुनाव अभियान चलता है। भारत की अंतरराष्ट्रीय साख और विश्वसनीयता के कारण दुनिया भर के देशों ने जिस तरह बिना मांगे सहायता देनी आरंभ की उसे भी बाधित करने की कोशिश की गई। कहा गया कि बाहर से आने वाले सामान उपयुक्त पात्रों तक पहुंची नहीं रहे हैं, उनके वितरण का कोई प्रबंधन नहीं है, कई-कई दिनों तक वे हवाई अड्डे पर ही पड़े रहते हैं। अमेरिका, ब्रिटेन सहित कई देशों में पत्रकार वार्ताओं में सवाल उठाया गया कि जो सामग्रियां भेजी जा रही है वह लोगों तक पहुंच रही है इसकी गारंटी दिया जाएगा? इन सबका विश्व समुदाय पर कितना नकारात्मक असर पड़ा होगा इसकी कल्पना कर सकते हैं। दुनिया भर की कई संस्थाओं ने भारत को लेकर जिस तरह की नकारात्मक रिपोर्टें दी उनका स्रोत कौन हो सकता है यह भी अब समझ में आ रहा है। कोई संस्था कह रही है कि भारत से तो कोरोना से जुड़े सही आंकड़ा प्राप्त करना कठिन है। वहां जितने लोगों के संक्रमित होने और मरने के दिए जा रहे आंकड़ें झूठे हैं। वास्तविक आंकड़े कई गुना ज्यादा हैं। कोई संस्था यह कह रहा है कि कोरोना की दृष्टि से भारत सबसे असुरक्षित देश हो गया है।


हालांकि यह टूलकिट अब बंद हो चुका है लेकिन इसके फैलाए गए जहर का प्रभाव कायम है। एक उदाहरण लीजिए। भारत में 18 मई को कोरोना से हुई 4529 मौत को न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अखबार ने विश्व में एक दिन में सर्वाधिक मौत बता दिया। यह लिखा कि जनवरी में एक दिन अमेरिका में इसके पहले 4468 मौतें सर्वाधिक थी। भारत की मीडिया में यह खबर चली और सोशल मीडिया में भी। छानबीन करने पर तथ्य यह आया कि अमेरिका में ही 12 फरवरी को एक दिन में 5463 लोगों की मौत हुई। वास्तव में देश और विदेश की अनेक शक्तियां इस महाआपदा को भारत में हाहाकार और विदेशों में दुष्प्रचार के लिए जितना संभव हुआ उपयोग करतीं रहीं। टूलकिट दुष्प्रचार सामग्रियों के लिए सबसे बड़ा स्रोत होकर इस अभियान का एक प्रमुख अंग बन गया था। मोदी सरकार को मजबूर होकर बार-बार तथ्यों के साथ स्पष्टीकरण देना पड़ा। हालांकि नरेंद्र मोदी ने स्वयं अभी इन पर अपना मुंह नहीं खोला है और प्रधानमंत्री के लिए यही इस समय यथेष्ट भी है।
अनेक तथ्य आ गए हैं जिनसे ऐसे अभियानों और दुष्प्रचारों की हवा भी निकल जाती है। जैसे प्रचारित होता रहा कि मोदी सरकार ने कोरोना को खत्म मानकर राज्यों को न आगाह किया ना उनके साथ संवाद बनया। केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में जो शपथ पत्र दिया है उसके अनुसार 7 फरवरी से 28 फरवरी के बीच कोरोना को लेकर राज्यों से केन्द्र का 17 बार संवाद हुआ था। यह स्पष्ट हो गया है कि सितंबर 2020 से अप्रैल 2021 तक प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों के साथ साथ कई बैठकें की और कोरोना के प्रति सतर्क किया। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया है कि जनवरी से मार्च तक दो दर्जन बार राज्यों को आगाह किया गया, उन्हें सलाह दी गई और जहां आवश्यक लगा मदद के लिए केंद्रीय टीम भी भेजी गई। जहां तक चुनावी राज्यों की बात है तो केरल में जनवरी से प्रतिदिन लगभग 5000 मामले सामने आ रहे थे और सभी पार्टियां वहां चुनाव प्रचार करती रहीं। इसी में वहां चुनाव भी संपन्न हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 मार्च को मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की थी। इसमें उनके भाषण का एक अंश यह था कि देश के 70 जिलों में पिछले कुछ दिनों में कोरोना की वृद्धि 150 प्रतिशत से भी ज्यादा है। उन्होंने कहा था कि दूसरी लहर को तुरंत रोकना होगा वरना यह देशव्यापी आउटब्रेक बन सकती है। महाकुंभ के बारे टूलकिट ने दुनिया को नहीं बताया कि यह एक आध्यात्मिक-सांस्कृतिक आयोजन है जो हर 12 वर्ष पर आता है। यह सदियों से चला आ रहा धर्मतंत्र और आम जन का आयोजन है जिसमें सरकारें दखल नहीं देतीं, केवल आवश्यकताओं का प्रबंधन करती हैं। देश में कोरोना मामले बढ़ने के सथ प्रधानमंत्री की अपील के बाद साधु-संतों और अखाड़ों ने महाकुंभ को प्रतीकात्मक कर दिया और ज्यादातर वहां से वापस चले गए। यही नहीं जिन राज्यों में कोरोना के प्रकोप सबसे ज्यादा हुए वहां से महाकुंभ में आने वालों की संख्या अत्यंत ही कम थी। हरिद्वार के होटल एसोसिएशन ने आंकड़ा दियाा कि जितने दिन महाकुंभ रहा उस दौरान होटलों केवल 20 से 30 प्रतिशत ही कमरे बुक हुए। विश्व में कोरोना के 16.50 करोड़ से ज्यादा मामलों में सबसे अधिक 3 करोड़ 80 लाख मामले केवल अमेरिका के हैं। मरने वाले भी सबसे ज्यादा छः लाख लोग वहीं के हैं, जबकि भारत की इससे आधा से भी कम। अमेरिका की आबादी 33 करोड़ है और भारत की 135 करोड़। ब्राजिल में मरने वालों की संख्या चार लाख पार गई है। तो भारत कैसे सबसे सुरक्षित देश हो गया?
लेकिन जब संसाधनों से भरे और संपर्कों की ताकत रखने वाले कुछ समूह मिलकर पूरी योजना के साथ ऐसे टूलकिट बनाकर संचालित करने लगे तो सच काफी समय तक ओझल हो जाता है। ध् जिस सौम्या वर्मा पर इसके बनाने का आरोप है कांग्रेस के साथ उसके संबंधों को कोई नकार नहीं सकता।यह आवश्यक नहीं कि पार्टी की ओर से किसी को ऐसा टूल किट बनाने का निर्देश दिया गया हो। वैसे भी कांग्रेस पार्टी की इस समय जो दशा है उसमें स्वयं नेता या कुछ नेताओं कें समूह अपने स्तर पर ही राजनीतिक निर्णय ले रहे है। तो टूलकिट के पीछे कांग्रेस के लोगों की भूमिका का संदेह पुखता है। भारत में केंद्र से लेकर राज्य सरकारें और राजनीतिक पार्टियां ही नहीं नेताओं तक ने अपना सोशल मीडिया टीम बना लिया है। क्षमता के अनुसार इन पर खर्च किया जाता है। पार्टियां करोड़ों खर्च करतीं हैं। आईटी सेल के नाम से प्रचारित ये टीमें 24 घंटे सक्रिय रहतीं हैं। ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सएप, यूट्यूब, अमेजॉन, टेलीग्राम आदि पर ये टीमें अपने अनुसार सामग्रियां झोंकतेे रहते हैं । पश्चिम बंगाल चुनाव में हमने भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच सोशल मीडिया और टूलकिट का राजनीतिक युद्ध देखा। कई बड़े नेताओं के पास सोशल मीडिया की इतनी बड़ी टीम है कि वे चाहे तो टूलकिट बनाकर कभी भी कुछ समय के लिए ही सही बड़े-बड़े झूठों को सच बनाकर पेश कर सकते हैं और उससे तत्काल लोग प्रभावित भी होते हैं।
कृषि कानूनों के विरुद्ध जारी आंदोलन को हिंसक बनाने में टूलकिट की भूमिका देश देख चुका था। अब इस दूसरे टूलकिट ने कराती मानवता के बीच जिस ढंग का अपराध किया उसके वर्णन के लिए शब्द छोटे पड़ रहे हैं। टूलकिट पर काम करने वालों का मानना है कि यूपीए सरकार के दौरान शशि थरूर जैसे नेताओं ने राजनीति में इसके उपयोग की शुरुआत की। उसके बाद इंडिया अगेंस्ट करप्शन ,अन्ना अभियान में इसका व्यापक उपयोग हुआ तथा टूलकिट ने आम आदमी पार्टी के सत्ता में आने में प्रमुख भूमिका निभाई। तो यह सबके लिए हथियार बन गया। मोदी का राजनीतिक स्तर पर जनता के बीच सीधे मुकाबला करने में कमजोर पड़ रहे लोगों और समूहों ने सोशल मीडिया और टूलकिट को लंबे समय से अपना हथियार बनाया हुआ है। सामान्य आरोपों आदि में ऐसा करने में समस्या नहीं होनी चाहिए, पर किसान आंदोलन के बाद कोरोना महाआपदा को मोदी सरकार के विरुद्ध दुष्प्रचार, प्रधानमंत्री मोदी की छवि विकृत करने तथा जनता के अंदर औरअसंतोष पैदा करने के उद्देश्य से टूलकिट का दुरुपयोग हम सबके लिए चेतावनी होनी चाहिए। विचार करना होगा कि भविष्य में केबल टूलकिट नहीं पूरे सोशल मीडिया में ऐसे दुरुपयोगों को किस तरह रोका जाए? ये तो देश में हर तरह की अशांति और उथल-पुथल पैदा कर सकते हैं। आज मोदी सरकार है कल कोई और सरकार होगी और अभियान उसके विरुद्ध भी चल सकता है। किसी संवैधानिक संस्था के विरुद्ध ऐसे अभियान चलाए जा सकते हैं। अगर कुछ षड्यंत्रकारियोें को सजा मिलती है तो इसका असर होगा लेकिन इसके लिए उनको सामने लगाकर साबित करना होगा कि वाकई ये ही इसके पीछे थे। यह अत्यंत कठिन है। वास्तव में नए सिरे से मंथन करना होगा कि ऐसे टूलकिटों की पुनरावृति रोकने तथा सोशल मीडिया कंपनियों को नियंत्रण में लाने के लिए भारत के अंदर के कानूनी ढांचे तथा राजनीतिक स्तर पर क्या-क्या किया जा सकता है। समस्या यह है कि बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों पर भारत का कोई कानून लागू ही नहीं होता। केन्द्र एवं राज्य की सभी सरकारों, दलों, जन समूहों आदि को इस पर आगे बढ़ना होगा। समस्या यह है कि जो दल एवं समूह इनके दुरुपयोग को ही अपनी सफलता मानते हैं वे इसमें सहभागी नहीं हो सकते और इनकी संख्या बहुत बड़ी है।

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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