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Kashmir killing Hindu Sikh non kashmiri

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समय का चक्र पीछे नहीं मोड़ सकते आतंकवादी

 अवधेश कुमार

जम्मू कश्मीर में आतंकवाद ने जो वीभत्स रूप दिखाया है उसमें कुछ पहलू साफ नजर आते हैं। एक, गैर मुस्लिमों यानी हिंदुओं और सिखों को इस तरह निशाना बनाना ताकि जम्मू कश्मीर के अंदर और बाहर रह रहे लोगों के अंदर भय पैदा हो जाए। दूसरे, भारत, देश, राष्ट्रभक्ति आदि की बात करने और उस दृष्टि से भूमिका निभाने वाले  पर हमला करना। इसमें गैर मुस्लिम और मुस्लिम दोनों शामिल हैं। तीसरा,   भाजपा व संघ के नेताओं – कार्यकर्ताओं या समर्थकों पर हमला करना।  चार,दूसरे राज्यों से वहां रोजगार व्यवसाय या अन्य कार्य करने वालों पर हमला करना। इसके द्वारा वे यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि जम्मू कश्मीर  के मुसलमानों का रोजगार व्यवसाय दूसरा न छीन ले इसके लिए वे लड़ रहे हैं।  पांच, सुरक्षाबलों  पर हमला।  सुरक्षाबलों को निशाना बनाने की रणनीति आतंकवाद की लंबे समय से है। इन सारे पहलुओं को देखने के बाद यह बताने की आवश्यकता नहीं कि कश्मीर में वे क्या चाहते हैं?

 आतंकवादी जम्मू कश्मीर में 1990 के दशक की स्थिति पैदा करना चाहते हैं। इसका कुछ तात्कालिक असर भी हुआ है। प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज के तहत 3841 कश्मीरी  हिंदुओं को घाटी में रोजगार दिया गया। श्रीनगर में हिंदू शिक्षक तथा प्रिंसिपल की आई कार्ड देख कर तथा मुसलमान शिक्षकों से अलग कर की गई हत्या के बाद  ज्यादातर भाग रहे हैं या निकल भागने की कोशिश में है। श्रीनगर के दवा व्यवसायी मक्खनलाल बिंदरू की हत्या के साथ ही  इनके अंदर 1990 का भय पैदा होने लगा था। 19 जनवरी, 1990 को सबसे बड़ा पलायन हुआ था जब 60 हजार कश्मीरी पंडित निकल गए। मस्जिदों से नारे लगते थे कि’ हमें क्या चाहिए? निजाम ए मुस्तफा’, ‘ रलीव, गलीव, चलीव’ यानी निकल जाओ, नहीं तो मरो या धर्म बदल लो। कितने कश्मीरी हिंदू- सिख मारे गए, कितनी महिलाओं के बलात्कार हुए, कितने का धर्म बदला इसके अलग-अलग आंकड़े हैं।  हजारों वर्षों की विरासत तथा सब कुछ छोड़कर कश्मीरी हिंदुओं को पलायन करना पड़ा । दूसरे, कश्मीर में पर्यटकों का जाना बंद हो गया। तीसरे, बाहर के व्यवसायी मान बैठे कि कश्मीर में जाने का कोई अर्थ नहीं।  1991 से आर्थिक सुधार की प्रक्रिया से कश्मीर वंचित रहा क्योंकि कोई निवेशक जाता नहीं था। नौकरशाह जम्मू कश्मीर में नियुक्ति से बचते थे। हिंदुओं ने कश्मीर स्थित अपने तीर्थ स्थलों से मुंह मोड़ लिया। भारत के आम मुसलमान भी कश्मीर में रिश्ते करने या जाने से बचते रहे।  प्रश्न है कि क्या आतंकवादी पुनः वैसी भयावह स्थिति कायम कर देंगे? क्या समय का चक्र घूम कर फिर उस अवस्था में पहुंच जाएगा?

आतंकवादियों और उनके समर्थकों के सोशल मीडिया चैट से अफगानिस्तान में  तालिबान की सत्ता वापसी को कश्मीर में जेहाद के लिए अनुकूल समय तथा उनसे सहायता मिलने की बातें हैं। तालिबान के हाथों सत्ता आने के बाद जब विश्व भर के जिहादी आतंकवादी मानते हैं कि हमने सोवियत संघ और अब अमेरिका जैसे महाशक्ति को परास्त कर दिया तो भारत नहीं टिकेगा। अनस हक्कानी का महमूद गजनबी की मजार पर जाकर सोमनाथ हमले का ट्वीट करना अनायास नहीं हो सकता। उसने जो संदेश दिया है उसे उसी रूप में समझने की आवश्यकता है। केंद्र सरकार, जम्मू कश्मीर प्रशासन, खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा बलों को भी इसका एहसास है कि अफगानिस्तान का परिवर्तन कश्मीर सहित भारत में आतंकवाद को वैचारिक और संसाधनिक खुराक प्रदान कर रहा है। पाकिस्तान में माहौल बन गया था कि हम कश्मीर की लड़ाई हार रहे हैं । वह इस अवसर का हरसंभव लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है। आईएसआई प्रमुख के रूप में लेफ्टिनेंट जनरल नदीम अंजुम की नियुक्ति इस दिशा में भी कदम है । लश्कर-ए-तैयबा,  जैश ए मोहम्मद जैसे अनेक आतंकवादी संगठन, जिन्होंने तालिबान के साथ अफगानिस्तान में लड़ाई लड़ी और पाकिस्तानी सत्ता का जिनको समर्थन है उनका मुख्य फोकस जम्मू कश्मीर है।  

इस तरह हमारी चुनौतियां बढ़ी हैं। बावजूद नहीं माना जा सकता है कि आतंकवादी पाकिस्तान और तालिबान के समर्थन के बावजूद समय का चक्र घुमाकर पुरानी स्थिति में ले आएंगे। साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल ने आतंकवादी घटनाओं की गणना करते हुए बताया है कि धारा 370 हटाने के बाद दो वर्ष में घाटी में 237 आतंकवादी घटनाएं हुई, जिसमें 65 नागरिक, 80 सुरक्षा बलों ने जानें गंवाईं लेकिन  मारे गए आतंकवादियों की संख्या 365 थी। 5 अगस्त, 2019 से 5 अगस्त, 2020 तक 237 हिंसक वारदातें हुईं जिनमें 36 नागरिक, 38 सुरक्षा बल तथा 181 आतंकवादी खेत रहे।  5 अगस्त, 2020 से 5 अगस्त ,2021 तक 29 नागरिक, 42 सुरक्षा बल तथा 184 आतंकवादी हिंसा की भेंट चढ़े।। कहने का तात्पर्य कि आतंकवादी पिछले दो वर्षों में भारी संख्या में मारे गए हैं। इस वर्ष आतंकवाद आरंभ होने से लेकर अभी तक सबसे कम घटनाएं हुईं। छह – सात महीनों का विश्लेषण साफ करता है कि आतंकवादियों को पहले की तरह सीमा पार से बड़े हथियार प्राप्त नहीं हो रहे हैं। पहले की तरह लंबी -लंबी दूरी तक बारूदी सुरंगे बिछाकर भयानक विस्फोट करना  संभव नहीं रहा है। इसीलिए छोटे हथियारों जैसे पिस्तौल के द्वारा हिंसा कर रहे हैं। ड्रोन से ऐसे हथियार आ रहे हैं। ड्रोन चुनौती  है लेकिन पकड़े जा रहे हैं। वस्त्र के अंदर छिपे पिस्तौल को पहचानना कठिन है और यह सुरक्षाबलों के लिए चुनौती है लेकिन बड़े हथियारों के अभाव में ये पहले की तरह शक्तिशाली नहीं है। तीसरे, सीमा पर पूरी तरह पहले की तरह खुली जगह नहीं है। काफी हद तक बार लगाए जा चुके हैं। इस कारण आतंकवादियों की घुसपैठ भी कठिन हुई है। चौथे, व्यवसायियों और निवेशकों ने कश्मीर में रुचि दिखाना शुरू कर दिया है। निवेश के न केवल एमओयू हस्ताक्षरित हुए हैं बल्कि जमीन पर उतर रहे हैं। नए तरीकों के बाजार और मॉल के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो रही है। मोदी सरकार ने व्यवसायियों निवेशकों के अंदर राष्ट्रवादी और भारत की एकता के भाव से  काम करने के लिए पहल किया है और छोटे समूह पर ही सही इसका असर है। पांच, वहां के भूमि कानून और अधिवास कानून में बदलाव का भी असर है। कश्मीर से बाहर के लोगों से लेकर 15 वर्षों तक रहने वालों को वहां अधिवास अधिकार मिल गया है।  बाहर से औसत 10 से 12 लाख लोग प्रति महीना वहां आ रहे हैं। इनमें ज्यादातर संख्या पर्यटकों की है। इन हमलों के बावजूद संख्या में बहुत ज्यादा कमी की संभावना अभी तक नहीं दिखती है। सात, पिछले ढाई वर्षो में हुर्रियत नेताओं व दूसरे अलगाववादियों आदि के खिलाफ हुई कार्रवाइयों का भी व्यापक असर है। अब पहले की तरह सड़कों पर निकल कर भारत विरोधी नारे लगाना, पत्थरबाजी करना ,आतंकवादियों के जनाजे में भारी संख्या में शामिल होकर सुरक्षा बलों और भारत के विरुद्ध माहौल बनाना तथा सुरक्षा बलों के ऑपरेशन में बाधा डालने आदि की स्थिति लगभग नहीं है। हालांकि महबूबा मुफ्ती जैसे नेता हैं जो कह रहे हैं कि आतंकवादी मारे तो गलत और सुरक्षाबल मारे तो सही कैसे हो सकता है? हिंदुओं और सिख की हत्या के बाद एनआईए द्वारा गिरफ्तार तथा सुरक्षा बलों द्वारा भारी संख्या में हिरासत में लिए गए लोगों के पक्ष में उनका बयान जरूर आ रहा है किंतु इसका असर नहीं है।  सैफुद्दीन सोज जैसे कांग्रेसी नेता पहले की भाषा अवश्य बोल रहे हैं कि मारना ठीक नहीं है लेकिन उन बच्चों की भी कुछ शिकायतें हैं जो सुनी जानी चाहिए । कांग्रेस की स्थानीय इकाई को कहना पड़ रहा है कि यह उनका निजी विचार है पार्टी का नहीं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के अब्दुल्ला पिता और पुत्र खुलकर बोलने का साहस नहीं कर पा रहे हैं। जैसा हम जानते हैं श्रीनगर से लेकर बारामुला, अनंतनाग, कुपवाड़ा आदि जगहों पर पलायन कर गए कश्मीरी हिंदुओं को बसाने के लिए क्लस्टर कॉलोनियों का निर्माण आगे बढ़ा हुआ है। उनका पुनर्वास पैकेज भी जमीन पर उतरा है। इन सबके अलावा मोदी सरकार ने पहले शासन गांव तक कार्यक्रमों के तहत अधिकारियों का गांव का दौरा कराया ,समस्याएं सुनकर वहीं समाधान कराने की पहल की। पंचायतों को विकास के पैसे सीधे पहुंचे। पंचायत की त्रिस्तरीय चुनाव आयोजित होने के बाद लोगों को लोकतंत्र के सुख और लाभ का साकार अनुभव हुआ है। नई पीढ़ी को पढ़ने, खेलने, प्रतियोगिता में शामिल होने,सांस्कृतिक गतिविधियां करने आदि की स्वतंत्रता हासिल हुई है। सारे लोग तो इसे गंवाना नहीं चाहेंगे। यानी कश्मीरी मुसलमानों को भी पहले की तरह भारत को अन्यायी साबित कर भड़काना कठिन हो गया है। श्रीनगर के लाल चौक तक 15 अगस्त का कार्यक्रम संभव हुआ। गांव- गांव के स्कूलों में स्वतंत्रता दिवस मनाए गए। हिंदू मंदिरों में लंबे समय बाद घंटियां बजीं, अनेक पारंपरिक त्यौहार मने। इसलिए आतंकवादी चाहे जो कर लें, पाकिस्तान जितनी ताकत लगा ले, घड़ी की सुई को पीछे नहीं ले जा सकता। जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने वायदा किया है कि अगले कुछ दिनों में आपको बदला हुआ कश्मीर देंगे। वास्तव में देश का संकल्प है कि कश्मीर भारत का सामान्य राज बनेगा इस संकल्प को आतंकवादी ऐसे हमलों से नहीं तोड़ सकते हैं।

 

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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