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Kalyan Singh passes away

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कल्याण सिंह जानदार व्यक्तित्व के धनी थे

अवधेश कुमार 

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को कैसे याद करें यह आपके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनको श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि कल्याण सिंह के माता-पिता ने उन्हें जो नाम दिया था उन्होंने उसे सार्थक किया। कल्याण सिंह थे और उन्होंने जनकल्याण ही अपना मंत्र बनाया। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी ,जनसंघ और पूरे परिवार को अपना जीवन समर्पित कर दिया। कल्याण सिंह भारत के कोने-कोने में एक विश्वास का नाम बन गए थे । एक प्रतिबद्ध निर्णयकर्ता का नाम बन गए थे और जीवन के अधिकतर समय जन कल्याण के लिए प्रयासरत रहे । उन्हें जब जो दायित्व मिला चाहे वह विधायक के रुप में या सरकार के रूप में या राज्यपाल के रूप में हमेशा प्रेरणा का केंद्र बने रहे । देश ने एक मूल्यवान शख्सियत सामर्थ्यवान नेता को खोया है । हम उनके आदर्शों को लेकर अधिकतम पुरुषार्थ करें। जाहिर है, भारतीय जनता पार्टी के नेता के रूप में उनको इसी तरह की श्रद्धांजलि दी जा सकती है । किंतु एक पार्टी का नेता होने का मतलब यह नहीं कि अन्य पार्टियों ,अन्य विचारधाराओं के संगठनों या गैर राजनीतिक स्तर पर उनका महत्व नहीं था । वास्तव में अपने दल, विचारधारा तथा विपक्ष के साथ एक संतुलन बनाकर उनका संपूर्ण जीवन चलने वाला रहा है । 

कल्याण सिंह को जानने वाले विरोधी और समर्थक दोनों मानते हैं कि राजनीति में शीर्ष पर रहते हुए भी उनकी सहजता सरलता बनी रही। भ्रष्टाचार का एक भी उदाहरण उनके जीवन में नहीं है। वे अपने वचन के पक्के थे। आपको कोई वचन दे दिया तो उसे हर हाल में पूरा करने की कोशिश करते थे और इसके लिए हर स्तर पर विरोध झेलने को भी तैयार रहते थे। पार्टी के नेता कई बार उन्हें जिद्दी व्यक्ति भी कहकर बुलाते थे लेकिन उनकी जिद्द उनकी आंतरिक निर्मलता और साहस का ही प्रकटीकरण था। विरोधी नेताओं के साथ भी सामान्य संबंध बनाए रखना तथा राजनीति को कभी विरोधियों को कुचलने का हथियार न बनाना उनका सिद्धांत और व्यवहार था। एक समय भाजपा और संघ परिवार में कल्याण सिंह की लोकप्रियता और प्रतिष्ठा शीर्ष पर थी। तब टीवी चैनलों का दौर नहीं आया था । इस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तथा गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की जो लोकप्रियता भाजपा और संघ परिवार में है या थी लगभग उसके समान ही कल्याण सिंह की भी थी । लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा ने उत्तर प्रदेश के ही एक प्रमुख नेता के प्रभाव में आकर कल्याण सिंह के साथ अन्याय किया। मई 1999 में दबाव में आकर उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाया गया। बाद में वे भाजपा छोड़ने को मजबूर हुए। अपनी राष्ट्रीय क्रांति पार्टी बनाई। भाजपा ने उन्हें 2004 में फिर पार्टी में वापस लाया। लेकिन फ़िर उन्हें बाहर जाना पड़ा।

 उनके निकट के लोग बताते थे कि उन दौरान उनके पास जब भाजपा या आरएसएस के पुराने जुड़े हुए नेता कार्यकर्ता जाते थे तो पार्टी नेतृत्व के उनके प्रति व्यवहार को लेकर उनकी आंखों से आंसू छलक जाते थे। देर से पार्टी नेतृत्व को अपनी गलतियों का अहसास हुआ और उन्हें फिर लाया गया लेकिन तब तक उनकी चमक गायब हो चुकी थी। हालांकि फिर उन्हें 2009 में पार्टी छोड़ने को मजबूर होना ही पड़ा। अगर 2014 में अमित शाह उत्तर प्रदेश के प्रभारी नहीं होते तथा नरेंद्र मोदी शीर्ष पर नहीं आते तो कल्याण सिंह शायद ही भाजपा में वापस आते । मोदी और शाह ने उनको पर्याप्त सम्मान दिया । पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया तथा उत्तर प्रदेश के चुनाव संचालन का दायित्व उनके हाथ आया । सच कहे तो पूर्व भाजपा नेतृत्व ने अपने एक शानदार कार्यकर्ता, नेता और जानदार व्यक्तित्व को नष्ट कर दिया । इससे भाजपा को उत्तरप्रदेश में ऐसी संघातक क्षति हुई जिसकी पूर्ति नरेंद्र मोदी के शीर्ष पर आने के पहले संभव ही नहीं हुई। भाजपा अगर 2004 में केंद्र के सत्ता से बाहर हुई तथा कभी संतोषजनक सीटें नहीं प्राप्त कर सकी तो उसका एक बड़ा कारण यही था कि कल्याण सिंह के महत्व को नहीं समझा गया। भाजपा के पुराने लोग बताते हैं कि कल्याण सिंह ने गांव-गांव, खंड-खंड, जिले-जिले का दौरा कर एक-एक कार्यकर्ता को खड़ा किया, स्वयं हाथों से लिख कर पदाधिकारियों की सूची बनाते थे ,रात-रात भर लोगों के साथ मेहनत करते थे। नरेंद्र मोदी और अमित शाह  ने कल्याण सिंह के हश्र से सबक लिया और किसी प्रदेश में उन्होंने ऐसी किसी नेता को श्रीहीन करने का कदम नहीं उठाया। नरेंद्र मोदी अपने मंत्रिमंडल में उनको शामिल निश्चित रूप से करते लेकिन अघोषित 75 वर्ष की आयु सीमा रास्ते में आ गई थी। इसीलिए उन्हें राज्यपाल बनाया गया।

विरोधियों के लिए कल्याण सिंह 6 दिसंबर ,1992 के खलनायक थे ,क्योंकि उन्हीं के मुख्यमंत्री रहते बाबरी ढांचे का विध्वंस हुआ था। यह अलग बात है कि कल्याण सिंह कभी ऐसा नहीं चाहते थे। रामजन्मभूमि आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका थी ,मंदिर हर हाल में बने यह उनका भाव था ,लेकिन बाबरी ढांचा तोड़ दिया जाए इसके पक्ष में नहीं थे । उन्हें विश्वास था कि 6 दिसंबर को कार सेवा कर कारसेवक पहले की तरह लौट जाएंगे और ढांचा सुरक्षित रहेगा। इसी विश्वास के साथ उन्होंने उच्चतम न्यायालय में शपथ पत्र भी दिया था। लेकिन उनकी न चली। सच तो यही है कि भाजपा के किसी शीर्ष नेता की नहीं चली। इस कारण कल्याण सिंह की कुर्सी गई, सरकार भी बर्खास्त हुई। कहा जाता है कि मुख्यमंत्री होते हुए वे चाहते तो बाबरी ढांचा को बचा सकते थे। अपनी ही विचारधारा व पार्टी के कार्यकर्ताओं पर मुख्यमंत्र गोलियां बरसा दे यह तर्क आसानी से गले नहीं उतरता। अयोध्या में जो स्थिति हो गई थी उसमें कई सौ लोग मारे जाते। उन्होंने ऐसा करने की जगह राजभवन में जाकर अपना और मंत्रिमंडल का त्याग पत्र दे दिया तथा पत्रकारों से बिना कुछ बोले हाथ जोड़ कर वापस चले गए।

आप उनके पूरे व्यक्तित्व और राजनीतिक यात्रा को जैसे देखें ,लेकिन राजनीति के लिए उनका जीवन उनकी अपनी ही पार्टी नहीं उत्तर प्रदेश की दूसरी पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए भी प्रेरक रहा है। सभी विवेकशील और जानकार नेता ,कार्यकर्ता उनका सम्मान करते थे। घोर विरोधी होते हुए भी मुलायम सिंह से उनके संबंध हमेशा अच्छे रहे। वर्तमान राजनीति का स्तर इतना गिर गया है जहां कुछ नेता विचारधारा के मतभेद या राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को व्यक्तिगत दुश्मनी मानकर व्यवहार करते हैं । उनकी पूरी अस्वस्था के दौरान तथा मृत्यु के बाद जिस तरह का सम्मान पार्टी और सरकार ने दिया है वह निश्चित रूप से उनके कद के अनुरूप है। हालांकि केंद्र में नरेंद्र मोदी की जगह कोई और भाजपा का प्रधानमंत्री होता और प्रदेश में योगी सरकार नहीं होती तो वे जिस सम्मान के हकदार थे वह नहीं मिलता। अस्वस्थ होने के बाद प्रदेश की योगी सरकार ने उनको बेहतर चिकित्सा उपलब्ध कराने की पूरी व्यवस्था की। स्वयं योगी आदित्यनाथ बार-बार अस्पताल जाते रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह लगातार उनका हालचाल लेते रहे। अमित शाह ने अस्पताल जाकर भी उनका हालचाल लिया। ऐसे व्यक्तियों के साथ किसी भी पार्टी के नेतृत्व को यही भूमिका निभानी चाहिए। इससे नेताओं व कार्यकर्ताओं को संदेश मिलता है कि मुख्यधारा से बाहर होने के बावजूद अगर वे अस्वस्थ हुए तो पार्टी नेतृत्व उन्हें अकेला नहीं छोड़ेगा। वर्तमान राजनीति का यह दुर्भाग्यपूर्ण चरित्र बन गया है कि जो नेता मुख्यधारा में है या निकट भविष्य में मुख्यधारा में रहा है ,जिसका प्रभाव है वैसे लोगों को अस्वस्थ होने पर निश्चित रूप से पूरा साथ और सहयोग मिलता है ,उनकी मृत्यु के उपरांत भी सम्मान मिलता है लेकिन जो भले एक समय प्रभावशाली रहे ,वे अगर मुख्यधारा से लंबे समय से बाहर हैं तो उन्हें उनकी ही सरकार और पार्टी उस तरह का सम्मान नहीं देती जिसके वे हकदार होते हैं । पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के देहांत के बाद हमने देखा कि किस तरह से कांग्रेस नेतृत्व ने उनकी अनदेखी की।

कल्याण सिंह लंबे समय से बोलते थे कि उनकी दो इच्छाएं हैं । एक अयोध्या में श्री राम मंदिर उनके जीवन में बने और वे उनका दर्शन कर पाए । और दूसरा मृत्यु के बाद उन्हें केसरिया और भाजपा के झंडे में लपेट कर विदा किया जाए । उनकी पहली इच्छा भले शत-प्रतिशत पूरी नहीं हुई लेकिन मंदिर निर्माण उनके जीवन में आरंभ हो गया । यह माना जा सकता है कि मृत्यु के समय उनके अंदर आत्म संतोष अवश्य होगा । पार्टी नेताओं का व्यवहार देखकर उन्हें यह भी विश्वास हो गया होगा कि मरणोपरांत निश्चित रूप से पार्टी का झंडा उनके शव का आवरण बनेगा । भाजपा से आप चाहे जितना मतभेद रखें लेकिन अपनी पार्टी नेता के प्रति उसके शीर्ष नेतृत्व के व्यवहार से सभी पार्टियों और नेताओं को सीख लेनी चाहिए । कल्याण सिंह ने जाते-जाते अपने जीवन के अंतिम समय और मृत्यु के बाद जो व्यवहार पाया है वह संपूर्ण राजनीति के लिए एक सीख है । इतिहासकार कल्याण सिंह को कैसे याद करेंगे इस बारे में अनुमान लगाना कठिन है । देखना होगा कि भाजपा का इतिहास लिखने वाले भी उनका मूल्यांकन कैसे करते हैं। मृत्यु के साथ हर तरह का मतभेद खत्म हो जाता है। तथाकथित वैचारिक असहमति का चोला उतार कर सभी दलों और नेताओं को उन्हें सम्मानपूर्वक श्रद्धचाहिए जो नहीं हुआ है। यह व्यवहार मर्माहत करने वाला है।

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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