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Gandhi freeadom and Bharat

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गांधी जी की कल्पना की न आजादी मिली न  भारत बना

अवधेश कुमार

कांग्रेस ने आजादी प्राप्त होने के अंतिम वर्षों में गांधीजी की जगह-जगह अनदेखी की, लेकिन घोषित रूप से कांग्रेस नेतृत्व के लिए ऐसा करना संभव नहीं रहा था। अंग्रेज भी जानते थे कि भारत को स्वतंत्रता देने संबंधी बातचीत और व्यवस्था में मुख्य भूमिका कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ही होगी लेकिन गांधीजी को उन्हें भी महत्व देना ही पड़ता था। हालांकि अंतिम समय गांधी जी की हालत यह हो गई थी कि एक ओर जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल  जैसे शीर्ष नेता पूरी तरह उनकी बात नहीं मानते थे तो दूसरी ओर अलग-अलग संगठन भी उनके विरुद्ध ही झंडा उठा रहे थे। कांग्रेस के अंदर ही समाजवादी धड़ा उनके खिलाफ मुखर था। कम्युनिस्ट पार्टी तो उनका उपहास ही उड़ाती थी। हिंदू महासभा उनकी मुखर विरोधी थी।  आर एस एस में कुछ लोग यद्यपि उनके सत्याग्रह में शामिल होते थे लेकिन एक व्यापक समूह उनका कट्टर विरोधी था। नोआखाली में गांधी जी ने एक पेड़ से गिरी हुई पत्ती उठाकर कहा था कि मेरी स्थिति ऐसी ही हो गई है।

हम स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं और दो वर्ष पहले हमने महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मनाई। अंग्रेजों से स्वतंत्रता के विरुद्ध संघर्ष और उसमें सफलता पर जब भी विमर्श होता है गांधीजी को लेकर दो प्रकार के मत हमेशा आते हैं। एक पक्ष आंख मूंदकर अंग्रेजों के भारत से जाने का पूरा श्रेय गांधीजी को देता है तो दूसरा पक्ष इसके विरुद्ध तर्क देता है कि जितने क्रांतिकारी भारत में हुए, जिन्होंने अपना बलिदान दिया, जगह-जगह जो छोटे-छोटे लोगों ने हिंसक विद्रोह किए, अनेक जगह पर भले कुछ समय के लिए ही सही अंग्रेजों की सत्ता उखाड़ कर स्थानीय सरकार कायम किया गया, जिन्होंने विदेशों में रहकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाइयां लड़ी, उन सबका योगदान क्या गांधी जी से कम था? खासकर सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज की लड़ाई विश्व के अलग-अलग देशों में हुए स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में एक अप्रतिम और अद्वितीय अध्याय जोड़ने वाला था। यह भी सच है कि 26 हजार से ज्यादा आजाद हिंद फौज के सिपाहियों ने अपना बलिदान दिया। तो क्या उन्हें हम व्यर्थ मान  लें? ये सारी बातें सही हैं लेकिन आम लोगों को अंग्रेजों के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष में जोड़ने की गांधी जी की अद्भुत क्षमता और उनके योगदान को किसी भी दृष्टिकोण से नकारा नहीं जा सकता।  भारत को गुलामी से मुक्ति देने संबंधी ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन में जो बहस हुई तथा अन्य जो दस्तावेज हैं उनके आधार पर हमें मानना होगा कि गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस  के संघर्ष ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 गांधी स्वतंत्रता संघर्ष में एकमात्र शीर्ष पुरुष के रूप में उभरे जिनके विरोधी भी उनकी आभा स्वीकार करते थे।  उनके न चाहने वालों के लिए भी उनकी अनदेखी करना असंभव था। इसके पीछे गांधी जी की स्वयं की साधना, उनके विचार, उनकी तपस्या, उनका त्याग, गुलामी के कारणों को लेकर उनका बिल्कुल सटीक विश्लेषण,,  आम लोगों को प्रेरित करने की उनकी समझ, अंग्रेजों से मुक्ति के बाद राष्ट्र के रूप में भारत के पुनर्निर्माण संबंधी  व्यापक चिंतन आदि ने उन्हें निस्संदेह महापुरुष की भूमिका में स्थापित कर दिया था। यद्यपि कांग्रेस ने आजादी प्राप्त होने के अंतिम वर्षों में गांधीजी की जगह-जगह अनदेखी की, लेकिन घोषित रूप से कांग्रेस नेतृत्व के लिए ऐसा करना संभव नहीं रहा था। अंग्रेज भी जानते थे कि भारत को स्वतंत्रता देने संबंधी बातचीत और व्यवस्था में मुख्य भूमिका कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ही होगी लेकिन गांधीजी को उन्हें भी महत्व देना ही पड़ता था। हालांकि अंतिम समय गांधी जी की हालत यह हो गई थी कि एक ओर जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल  जैसे शीर्ष नेता पूरी तरह उनकी बात नहीं मानते थे तो दूसरी ओर अलग-अलग संगठन भी उनके विरुद्ध ही झंडा उठा रहे थे। कांग्रेस के अंदर ही समाजवादी धड़ा उनके खिलाफ मुखर था। कम्युनिस्ट पार्टी तो उनका उपहास ही उड़ाती थी। हिंदू महासभा उनकी मुखर विरोधी थी।  आर एस एस में कुछ लोग यद्यपि उनके सत्याग्रह में शामिल होते थे लेकिन एक व्यापक समूह उनका कट्टर विरोधी था। नोआखाली में गांधी जी ने एक पेड़ से गिरी हुई पत्ती उठाकर कहा था कि मेरी स्थिति ऐसी ही हो गई है। गांधी जी की आलोचना करने वाले ज्यादातर लोगों को यह पता भी नहीं होगा कि उनके द्वारा स्थापित पत्रिका हरिजन ने नोआखाली से भेजे गए उनके ही लेख और रिपोर्ट को छापने से इंकार कर दिया। गांधीजी ने पत्र लिखा कि इसके एक-एक शब्द की जिम्मेवारी मैं लेता हूं, फिर भी प्रबंधन ने उनके लेखन को जगह नहीं दिया। वास्तव में गांधीजी मानते ही नहीं थे कि जो आजादी हमको मिली है ,हमने उसी के लिए संघर्ष किया था। जब उन्हें साबरमती आश्रम लौटने का आग्रह किया गया कि बाबू अब तो आजादी मिल गई है, उन्होंने कहा कि क्या इसी आजादी के लिए हमने संघर्ष किया था? वे साबरमती नहीं लौटे,क्योंकि वहां से निकलते समय आश्रम की एक महिला ने उन्हें कहा था कि बापू अब स्वराज लेकर ही लौटना और उसे एक संकल्प के रूप में उन्होंने धारण किया था।

 जब हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं तो हमें इन सारे तथ्यों का ध्यान रखना पड़ेगा तभी अंग्रेजों से प्राप्त आजादी का सच हम समझ पाएंगे तथा भारत के भविष्य को लेकर भी  हमारी भूमिका सही हो सकती है। गांधीजी  को भारत में पहली सफलता चंपारण सत्याग्रह के दौरान मिली और उनके नेतृत्व क्षमता की धाक वहीं से जमी। उन्होंने जीवन के सामान्य उपयोग की वस्तु नमक को प्रतीक बनाकर अंग्रेजों के विरुद्ध पूरे भारत को खड़ा कर दिया। किसी को कल्पना नहीं थी कि नमक सत्याग्रह इतना बड़ा स्वरूप लेगा। उनके आह्वान पर जगह-जगह नमक बनाने का अभियान शुरू हुआ। अंग्रेजों की पुलिस लाठियां बरसाती, नमक बनाते खौलते हुए पानी में पड़ते लोगों के शरीर में छाले पड़ते, वे जेलों में डाले जाते लेकिन इस आंदोलन ने जोर पकड़ लिया और अंग्रेजों की समझ में आ गया कि भारत बदल रहा है। आप ध्यान देंगे तो यस साफ दिखाई पड़ेगा कि गांधी जी नेअंग्रेजों से अनवरत लड़ाई का  व्यवहार न किया न  वे देश  को ऐसी स्थिति में झोंके रखना चाहते थे। उनको मालूम था कि कोई भी देश दिन-रात लड़ाई नहीं लड़ सकता। साथ ही केवल विरोध और लड़ाई ही स्वतंत्रता प्राप्ति और उसको बनाए रखने का आधार नहीं हो सकता। लोगों के अंदर बलिदान, त्याग व तपस्या के साथ-साथ गुलामी के कारणों की समझ, अपने धर्म, देश, सभ्यता ,संस्कृति के बारे में गर्व का भाव जिसमें दूसरे के प्रति किसी तरह की उपेक्षा या निंदा की दृष्टि न हो तथा भविष्य के पुनर्निर्माण की भावना सुदृढ़ करना आवश्यक है। गांधीजी यही करते रहे। उनके भारत की कल्पना क्या थी? आश्रमों की स्थापना, उनमें रहने के नियम, विधान, प्रार्थना, भोजन, सत्याग्रही के लिए बनाए नियम आदि का गहराई से विश्लेषण करिए आपको उनमें भारत की ऋषि परंपरा का दर्शन होगा। आज तो सेक्यूलरवाद की विकृत धारणा ने ऐसा दूषित वातावरण उत्पन्न किया है कि गांधीजी के स्वतंत्रता संघर्ष और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत संबंधी उनके सपनों की ही धज्जियां उड़ गई है। ऐसा करने वाले वही लोग है जो स्वयं को गांधी का अनुयाई या उनका अनुसरणकर्ता बताते हैं। 

गांधी जी ने भले इसे अभिव्यक्त नहीं किया लेकिन हिंदू मुस्लिम दंगे तथा विभाजन को लेकर  उनकी पीड़ा को कोई नकार नहीं सकता।  गांधीजी जिन कई मामलों में विफल हुए उनमें सबसे  मारक हिंदू मुस्लिम एकता  संबंधी उनके प्रयास थे। खलीफा के साम्राज्य की स्थापना के लिए तुर्की से आरंभ खिलाफत आंदोलन को उन्होंने यह सोचकर समर्थन दिया कि इससे भारत के मुसलमान अपने देश के प्रति निष्ठावान होंगे तथा आजादी के आंदोलन में हिंदुओं के साथ मिलकर एकजुटता दिखाएंगे। उनकी यह कल्पना गलत साबित हुई। न असहयोग आंदोलन कोई प्रभाव डाल सका और न ही भारत के विरुद्ध नफरत से भरे हुए मुस्लिम नेता ही उनकी बात मानने को तैयार थे। अपने जीवन में इसके लिए वे लगातार प्रयासरत रहे और अंतिम समय तक उनकी कोशिश थी कि भारत में हिंदू मुस्लिम एकता कायम हो लेकिन नहीं हो पाया। जरा ध्यान दीजिए, गांधी जी के आश्रम में मुसलमानों की संख्या कितनी थी? उनके प्रखर विरोध के बावजूद मुस्लिम लीग और अन्य मुस्लिम संगठनों ने  ऐसी स्थिति पैदा कर दी जिसमें विभाजन अवश्यंभावी हो गया। मोहम्मद इकबाल से लेकर मोहम्मद अली जिन्ना तक कोई गांधी जी  को नेता मानना तो छोड़िए, उनकी भूमिका तक को अपने हित में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। यहां तक कि दलित नेता बाबा साहब भीमराव अंबेडकर भी कांग्रेस और गांधी जी पर सबसे ज्यादा हमला करते थे। उन्होंने पुस्तक ही लिख दी कि गांधी और कांग्रेस ने अछूतों के लिए क्या किया। जिन्हें हमने राष्ट्रपिता का दर्जा दिया उनकी स्थिति अपने ही देश में अपने ही नेताओं के के बीच कैसी हो गई थी इसकी आसानी से कल्पना की जा सकती थी। आजादी के समय कभी वह कांग्रेस के नेताओं से बात करते, कभी लॉर्ड माउंटबेटन के पास जाते और उनकी छटपटाहट देखी जा सकती थी। मौलाना अबुल कलाम आजाद को उन्होंने जो वचन दिया कि विभाजन मेरे शव पर होगा उसको लगातार उनके विरोधी उद्धृत करते हैं । जरा उस व्यक्ति की दशा देखिए।  विभाजन के विरुद्ध भी सत्याग्रह कर सकते थे लेकिन उसके बाद देश में जारी भीषण दंगों और मारकाट की तस्वीर कैसी भयावह होती और उसमें भारत कहां होता उसकी कल्पना से ही सिहरन पैदा होती है। 

उन्होंने मन मार कर सब स्वीकार किया किंतु उनका जो अंतिम दस्तावेज 19 जनवरी 1948 को लिखा गया था उसमें उन्होंने साफ कहा था कि धारा सभा के नाते कांग्रेस की भूमिका खत्म हो गई है। उसे अपने को भंग कर देना चाहिए। आजादी के संघर्ष में शामिल कांग्रेस को चुनावी राजनीति में नहीं पड़ना चाहिए। कांग्रेस के कार्यकर्ता- नेता सात लाख गांवों में जाकर काम करें।  उन्होंने राजनीतिक आजादी के बाद आर्थिक, सांस्कृतिक सामाजिक आजादी के लिए संघर्ष और निर्माण की एक व्यापक कल्पना रखी थी। दुर्भाग्य से एक उन्मादी के हाथों उनकी हत्या हो गई। गांधीजी जिंदा होते तो मेरा मानना है कि देश में एक दूसरी आजादी का संघर्ष शुरू होता। उन्होंने पूंजीपति घनश्याम दास बिरला से कहा भी था कि अब तुम लोगों के साथ हमें मीठा संघर्ष करना होगा। गांधी को मानने वाले लोग इस अमृत महोत्सव में  संकल्प करें कि उनका जो अधूरा सपना था- अखंड भारत का, भारत को एक धर्माधिष्ठित नैतिक राज्य बनाने का, परस्पर सहकार और सहयोग पर आधारित दुनिया के लिए आदर्श और प्रेरक  स्वावलंबी भारत बनाने का उस दिशा में काम किया जाए। 

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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