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हिन्दी दिवस

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 हिंदी हमारी और राष्ट्र की आत्मा का प्रश्न है

 अवधेश कुमार

भाषा केवल लिखने बोलने के लिए नहीं होती। वह देश की, हमारी आपकी पीढ़ियों की आत्मा होती है। अगर उसके लिए जीने-मरने ,सब कुछ न्योछावर करने का भाव नहीं है तो वह समाज नष्ट हो जाता है। उस समाज को राजनीतिक ,सांस्कृतिक,  सभ्यतागत,  धार्मिक गुलाम बनाना आसान होता है। अगर राजनीतिक गुलामी नहीं भी हुई तो अलग प्रकार की गुलामी में वह समाज फंसता है।  वह  भाषागत, व्यवस्थागत, शैक्षणिक, आर्थिक, व्यापारिक,  रोजगार संबंधित  किसी प्रकार की गुलामी हो सकती है। जिसे अपनी भाषा पर गर्व नहीं है, उसकी समझ नहीं है उसे यह भी पता नहीं चलता कि वाकई वह कितने मामलों में गुलाम हो चुका है। हम भारतीय इसी त्रासदी के दौर से गुजर रहे हैं।

आरंभ डॉ रघुवीर द्वारा लिखित एक प्रसंग से करना उचित होगा। सब जानते हैं कि डॉ या आचार्य रघुवीर प्रख्यात भाषाविद, नेता ,भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा के उद्भट विद्वान थे। वे फ्रांस की यात्रा हमेशा करते थे और वहां  राजवंश के ही एक परिवार में ठहरते थे। वे सब उनका अत्यंत सम्मान करते थे। एक बार उनका एक पत्र वहां पहुंचा और परिवार की एक बच्ची जो उनसे काफी प्रेम करती थी ,उनके साथ घुली मिली थी उसने उस लिफाफा को खोलकर यह देखना चाहा कि आखिर भारतीयों की लिपि कैसी होती है। जब उसने लिफाफा खोला तो पत्र अंग्रेजी में था और उसका चेहरा तो उतरा ही ,पूरा व्यवहार बदल गया। उसने पूछा कि अंकल, आपके देश की अपनी कोई भाषा , कोई लिपि नहीं है? उसने अपनी मां को यह बताया। उसके बाद पूरे परिवार का व्यवहार अचानक बदल गया। उसकी मां ने उनको खाना खिलाने के बाद कहा कि डॉ रघुवीर, अब आइंदा से कहीं और ठहरेंगे हमारे यहां नहीं। हम फ्रांसीसी लोग संसार में सबसे अधिक गौरव अपनी भाषा को देते हैं क्योंकि हमारे लिए राष्ट्रप्रेम और भाषा प्रेम में कोई अंतर नहीं है । उसने यह भी कहा कि जिसकी कोई अपनी भाषा नहीं होती उसे हम फ्रांसीसी बर्बर  कहते हैं। उनसे हम कोई संबंध नहीं रखते। कल्पना करिए कि फ्रांसीसी महिला और बच्ची की जगह कोई भारतीय होता तो क्या हुआ ऐसा व्यवहार करता?  

बिल्कुल नहीं। जब भी हम हिंदी दिवस मनाते हैं तो वही विलाप शुरू हो जाता है कि सरकारों ने ये नहीं किया, इसमें ये समस्याएं हैं, पूर्व की सरकारों ने गलतियां की, अब तोअंग्रेजी स्थापित हो रही है ,सूचना तकनीक संचार की भाषा अंग्रेजी हो रही है ……इस कारण हिंदी मर रही है  आदि आदि। ये सारी बातें सच है। किंतु प्रश्न हमें अपने आप से करना चाहिए कि क्या हम अपनी भाषा हिंदी ,जो आज भी इस देश के अधिकांश लोगों की बोलियाो, भाषा है या फिर उनकी बोलियां या भाषाएं हिंदी से जुड़ी हुई हैं वे सब इसे लेकर वही गौरव ,सम्मान और उत्कट भाव रखते हैं जो फ्रांस के राजपरिवार की उस महिला ने दिखाया? वस्तुतः भाषा केवल लिखने बोलने के लिए नहीं होती। वह देश की, हमारी आपकी पीढ़ियों की आत्मा होती है। अगर उसके लिए जीने-मरने ,सब कुछ न्योछावर करने का भाव नहीं है तो वह समाज नष्ट हो जाता है। उस समाज को राजनीतिक ,सांस्कृतिक,  सभ्यतागत,  धार्मिक गुलाम बनाना आसान होता है। अगर राजनीतिक गुलामी नहीं भी हुई तो अलग प्रकार की गुलामी में वह समाज फंसता है।  वह  भाषागत, व्यवस्थागत, शैक्षणिक, आर्थिक, व्यापारिक,  रोजगार संबंधित  किसी प्रकार की गुलामी हो सकती है। जिसे अपनी भाषा पर गर्व नहीं है, उसकी समझ नहीं है उसे यह भी पता नहीं चलता कि वाकई वह कितने मामलों में गुलाम हो चुका है। हम भारतीय इसी त्रासदी के दौर से गुजर रहे हैं। और इसका कारण केवल इतना ही है कि हमने अपनी आत्मा यानी हिंदी को उसके समस्त आयामों में समझा ही नहीं अपनाने की बात तो दूर।

भारत का दुर्भाग्य रहा है कि यद्यपि एक समय अहिंदी भाषी क्षेत्र के मनीषियों ने भारत की राजनीतिक एकता अखंडता के साथ सांस्कृतिक, धार्मिक, जातीय,  नस्ली आदि की परस्पर पूरकता को बनाए रखने और उसे सशक्त करने के लिए हिंदी को भारत की भाषा बनाने की हर संभव कोशिश की लेकिन फिर इसे पटक दिया। बाद में नीच स्तर की सत्ता राजनीति ने इस भाव को पलट दिया और दुर्भाग्य देखिए कि जिस अंग्रेजी भाषा ने हमें हर स्तर पर गुलाम बनाया वह तो उनके लिए प्रिय हो गया लेकिन जो हिंदी स्वतंत्रता संग्राम की मूल भाषा थी वह उनके लिए शत्रु हो गई। कोई ऐसा नेता हिंदी का या राजनीतिक , धार्मिक,  या फिर भाषा के क्षेत्र का ही ऐसा व्यक्तित्व सामने नहीं आया जो संगठित स्तर पर लोगों की भावनाओं को बदलने के लिए प्राणपण से काम करे। इसका मुख्य कारण यही है कि हम  मनुष्य के संपूर्ण जीवन पहलुओं के अस्तित्व को जीवित रखने के रूप में भाषा की महत्ता कभी समझ ही नहीं सके। दूसरा संकट हमारे सामने यह रहा कि मेरठ, मुजफ्फरनगर और आसपास की खड़ी बोली को ही हिंदी मान लिया गया। यह बात सही है कि संपूर्ण देश में या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी का मानक रूप क्या हो यह तय करना अत्यावश्यक था और उसमें खड़ी बोली से हमारा आपका मतभेद नहीं हो सकता। लेकिन केवल खड़ी बोली ही हिंदी नहीं है। हजारों ऐसी बोलियां,  उप भाषाएं उस हिंदी से जुड़ी हैं। 

क्या हमने कभी सोचा है कि हमारे जीवन से जुड़े हर पहलू के लिए लोकोक्तियां , मुहावरे , कहानियां ,ज्ञान सब कुछ हमारी अपनी बोलियों में विकसित हुई? लाखो वर्ष की सभ्यता वाले इस देश में हमारे पूर्वजों ने अपनी स्थानीय बोलियों में साधना, अध्ययन ,अनुभव से प्राप्त ज्ञान तथा उसकी व्यावहारिकता को सबकी समझ में आने लायक भाषा और बोलियों में रचा तथा श्रुति परंपरा के अनुसार और बाद मेें लिपिबद्ध करके उसे जीवित और सशक्त रखने की नींव डाली। पहले खड़ी बोली ने इस पर चोट किया। आज शिक्षित कहे जाने वाले परिवारों के अंदर अपनी बोली अपनी भाषाओं में बात करने वाले लोग नहीं मिलते। जिनकी अपनी बोलियां बज्जिका है, मगही है, ब्रज है, भोजपुरी है ,…..वे भी अपने घरों में खड़ी बोली में ही बात करते हैं। उनके बच्चों को अपनी बोली अपनी उस भाषा आती ही नहीं। अनेक खासकर मध्यम वर्गीय परिवारों में तो अब खड़ी बोली हिंदी बोलने वाले भी नई पीढ़ी में नहीं मिलते। वह केवल अंग्रेजी बोलते हैं। अंग्रेजी के अंक आदि ही उन्हें समझ आते हैं। इस कारण वे जीवन से जुड़े हुए सारे व्यवहारिक ज्ञान से वंचित हो रहे हैं जो व्यावहारिक ज्ञान हमको बिना किसी खर्च के अपने माता-पिता दादा-दादी और अन्य वरिष्ठ संबंधियों से प्राप्त हो जाते थे उनके लिए अंग्रेजी या दूसरी भाषाओं की पुस्तकें पढ़नी पड़ रही है। अंग्रेजी के आक्रमण  और लिप्सा ने तो बचे खुचे ज्ञान की विरासत, लोकोक्तियों,  मुहावरों,  कहानियों आदि से मिलने वाले ज्ञान और विरासत को मटियामेट करने के आधारभूमि ठोस रूप में तैयार कर दी है। त्रासदी देखिए कि उन सबमें भी व ज्ञान नहीं है जो वाकई हमको जीवन में व्यवहारिकता के लिए अपने स्तर पर चाहिए । इससे पूरी पीढ़ी व्यवहारिक ज्ञान के मामले में विकलांग हो रही है। अपने ज्ञान, अपनी थाती के बारे में अज्ञानता के कारण  हमें उसे ही सर्वस्व मानने लगे हैं। और अपने बारे में हीनभावना से पीड़ित।  जिस समाज और देश में  अपने ज्ञान और व्यावहारिक शिक्षा की सशक्त और परीक्षित थाती ही लुप्त प्राय हो जाए वह आधुनिक विज्ञान के रूप में जीवित अवश्य रहेगा लेकिन वास्तव में वह मृतक समाज ही होगा। 

इस दृष्टि से अगर हम अपनी भाषा को देखते हैं तो फिर सरकारी , प्रशासनिक, व्यापारिक,  शैक्षणिक स्तरों पर उसे अंगीकार करने के लिए किसी प्रकार के आंदोलन,  अलग से कानून , न्यायपालिका के फैसले आदि की आवश्यकता नहीं होगी। स्वयमेव सब कुछ हो जाएगा। भारत की सभी भाषायें औरबगोलियां एक दूसरे को सशक्त करने वाली हैं, क्योकि वो इसी मिट्टी से पैदा हुईं हैं। हिंदी उन सबका को जोड़ने वाली है।  संसकडत तो सबकी जननी ही है। यह भाव तभी पैदा होगा जब अपनी-अपनी बोलियों , भाषाओं को राष्ट्र के संदर्भ में देखते हुए व्यवहार किया जाए। मोदी सरकार की नई शिक्षा नीति में स्थानीय भाषाओं में शिक्षा के प्रावधान से निश्चित तौर पर आशा पैदा होती है।  इसे आगे ले जाने के लिए भाषा को राष्ट्र की एकता- अखंडता अपनी अंतरात्मा के अस्तित्व तथा संपूर्ण समाज की वास्तविक स्वतंत्रता के उत्कट भाव से जोड़े जाने के लिए अनेक स्तरों पर कार्य किए जाने की जरूरत है। अगर हमारे आपके बीच से ऐसे लोग  वास्तविक स्वतंत्रता के साथ संस्कृति, सभ्यता, ज्ञान की विरासत तथा जो कुछ हम हैं उस अस्तित्व को  हर हाल में बचाने और बनाए रखने के भाव से अगर  हिंदी भाषा की स्वीकृति के लिए उसी प्रकार उठकर खड़े होते हैं, जिस तरह अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संघर्ष में भारत माता की मुक्ति के लिए खड़े हुए तभी मनुष्य के रूप में, भारतीय के तौर पर हमारी, इस राष्ट्र की स्थानीय समाजों की विविधता पूर्ण संस्कृति और सभ्यता की आत्मा जीवित रह सकती है। यह आत्मा के जीवित रहने का विषय है।

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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