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स्वतंत्र चिंतन के व्यक्ति थे सोमनाथ चटर्जी

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अवधेश कुमार
सोमनाथ चटर्जी हमारे बीच नहीं रहे। एक उम्र के बाद हम सभी को जाना है। हम चलते-फिरते जाएं
या बीमार होकर। सोमनाथ दा बीमार होकर गए। किंतु उनके जाने के साथ भारतीय राजनीति में करीब
चार दशक की उनकी सक्रिय भूमिका तथा योगदान भी साथ नहीं चला गया। ऐसा व्यक्ति, जो 10
बार सांसद,

15 वर्षों तक लोकसभा में अपनी पार्टी का नेता तथा एक बार लोकसभा अध्यक्ष रहा
हो……उसका राजनीति और समाज में योगदान तो होगा ही। ज्यादातर लोगों ने सोमनाथ दा का सबसे
सक्रिय रुप 2004 से 2009 के बीच लोकसभा अध्यक्ष के तौर पर देखा। लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका
हमारे संसदीय लोकतंत्र के लिए कितना महत्वपूर्ण है यह बताने की आवश्यकता नहीं।

हालांकि उस
समय के उनके कई निर्णयों पर तत्कालीन विपक्षी दल भाजपा ने प्रश्न उठाया, उन पर कई बार
पक्षपात का भी आरोप लगाया, किंतु उनकी ईमानदारी पर उंगली कभी नहीं उठी। दूसरे, वे बिना किसी
राजनीति दबाव के स्वतंत्र रुप से विचार कर फैसला करते हैं इससे भी सभी सहमत रहे। यानी गलत
हो या सही जो भी फैसला होता है वह उनका अपना होता है।

उनका यही स्वतंत्र चरित्र जुलाई 2008 में सामने आया। अमेरिका के साथ नाभिकीय सहयोग
समझौता के विरुद्ध यूपीए से समर्थन वापस लेने के बाद माकपा ने सोमनाथ दा से कहा कि वो
लोकसभा अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दें। माकपा का कहना था कि जब संसद में विश्वास मत पर
मतदान हो रहा है तो उनके एक-एक सांसद उसमें सरकार के खिलाफ मत डालेंगे। सोमनाथ दा ने यह
कहते हए त्यागपत्र देने से इन्कार कर दिया कि लोकसभा अध्यक्ष बनने के बाद वे पार्टी के सदस्य
नहीं रहे। उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया। माकपा ने उनको पार्टी से बाहर कर दिया पर वे माने नहीं।
उसके बाद उनका राजनीतिक कैरियर खत्म हो गया। उनको इसका भान अवश्य रहा होगा, पर उनकी
जो समझ थी उस पर वे कायम रहे। यह उनके व्यक्तित्व की विशेषता थी। हालांकि 2009 में कांग्रेस
ने उन्हें फिर से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया, पर वे तैयार नहीं हुए। उनका अंतिम समय राजनीतिक
निष्क्रियता में बिता।

यह निश्चय ही दुखद है कि एक जुझारु और ज्ञानवान व्यक्ति की सेवा से देश की राजनीति वंचित
हो गई। यह हमारे वर्तमान दलीय राजनीति की विडम्बना है। सोमनाथ दा अंतिम समय राजनीतिक
विचारधारा के अंग होते हुए भी स्वतंत्र रुप से सोचकर फैसला करने के चरित्र तथा अपने जीवन मूल्यों
के कारण इसके शिकार हुए। एक सांसद के रुप में सोमनाथ दा संसदीय परंपरा और गरिमा का पालन
करने वाले नेता के रुप में ही नहीं, सहज, सरल जीवन जीने के लिए भी याद किए जाएंगे। वे हर
किसी के लिए उपलब्ध रहते थे। लोकसभा अध्यक्ष बनने के पहले राजधानी दिल्ली के अशोक मार्ग पर
उनके घर के दरवाजे सदा खुले रहते थे। पत्रकारांे का वे बहुत सम्मान करते थे। छोटा-बड़ा कोई
पत्रकार उनसे आसानी से बात कर सकता था। कार्यकर्ताआंें का भी उनके यहां प्रवेश मंे कभी कोई
समस्या नहीं रही।

एक धार्मिक बंगाली ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने तथा घोर हिन्दुत्व धारा की राजनीति करने वाले
पिता के पुत्र होते हुए भी उनका मार्क्सवादी हो जाना उनकी स्वतंत्र चिंतन प्रवृत्ति का ही तो प्रमाण है।
उनके पिता निर्मल चंद्र चटर्जी अखिल भारतीय हिंदू महासभा के संस्थापकों में से एक थे। जाहिर है,

सोमनाथ दा का आरंभिक जीवन इन्हीं विचारों को सुनने-पढ़ने में बीता होगा। साफ है कि इससे वे
अप्रभावित रहे। हालांकि पिता की तरह वे भी कोलकाता उच्च न्यायालय के नामी वकील बन गए,
किंतु राजनीतिक धारा उनकी बिल्कुल अलग थी। वे माकपा में उस समय शामिल हुए जब भारतीय
कम्युनिस्ट पार्टी का तुरत विभाजन हुआ था। मुख्यधारा की राजनीति करने वाले कम्युनिस्टों की दो
धारा बन चुकी थी। उस समय माकपा पश्चिम बंगाल से कांग्रेस पार्टी की सत्ता को उखाड़ने के लिए
जबरदस्द संघर्ष कर रही थी। यही बंगाल में नक्सलवाद का भी समय था। उस समय की सोमनाथ दा
की भूमिका ने ही उन्हें यहां तक लाया कि 1971 में वे लोकसभा पहुुंच गए। 1975 में आपातकाल का
भाकपा ने समर्थन किया लेकिन माकपा ने विरोध। कहा जाता है कि पार्टी की इस नीति मेें सोमनाथ
दा जैसे नेताओं की भी भूमिका थी। 1977 मेें माकपा के नेतृत्व में एक बार पश्चिम बंगाल में सरकार
बनी वह साढ़े तीन दशक तक कायम रहने का रिकॉर्ड बनाने में सफल रही। ज्योति बसु से वे बहुत ही
प्रभावित थे। कहा जा सकता है कि सोमनाथ चटर्जी माकपा के सत्ता राजनीति का स्वर्णिम काल के
सहभागी रहे। 2009 से उनके राजनीति से दूर रहने के दौरान ही माकपा का पतनकाल आरंभ हुआ
और वह पश्चिम बंगाल सत्ता से ही बाहर नहीं हुई, आज इतनी कमजोर हो चुकी है उसका फिर से
उभरने पर भी प्रश्न चिन्ह खड़ा है। शायद इस बीच माकपा ने सोमनाथ चटर्जी का सहयोग लिया होता
तो संभव था नई परिस्थितियों के अनुरुप वैचारिक, सांगठनिक एवं संघर्षात्मक कलेवर देने की दिशा मेें
वे कुछ मार्गदर्शन करते।

सोमनाथ चटर्जी के व्यक्तित्व का एक पहलू निर्णय करना और उस पर अड़ना था। दिसंबर 2005 में
जब एक टीवी चैनल ने स्टिंग करके यह साबित करने की चेष्टा की कि हमारे माननीय सांसद संसद
में प्रश्न करने के लिए भी घूस लेते हैं तो सोमनाथ चटर्जी बतौर लोकसभा अध्यक्ष इससे नाखुश हुए।

उन्होंने पहले सांसदों के सदन में आने पर रोक लगाई। इथिक्स समिति को मामला सौंपा और
लोकसभा के दस सांसदों को बर्खास्त कर दिया। यह भारत के संसदीय इतिहास की पहली घटना थी
जब एक साथ इतने सांसदों की बर्खास्तगी का कदम लोकसभा अध्यक्ष ने उठाया। इसमें ज्यादातर
सदस्य भाजपा के थे। भाजपा ने इसके विरोध में सदन से बहिर्गमन किया। वह इसे विशेषाधिकार
समिति को सौंपने की मांग कर रही थी। सोमनाथ चटर्जी ने इसे स्वीकार नहीं किया। जब मामला
न्यायालय में गया तो सोमनाथ चटर्जी ने फिर कड़ा स्टैंड लिया। उन्होंने कहा कि संसद की अपनी
शक्ति है। न्यायालय हमारे मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। अगर न्यायालय नोटिस भेजेगा तो
हम उसका जवाब नहीं देंगे। मामला खत्म हो गया।

हालांकि सांसदों की बर्खास्तगी के निर्णय को गलत मानने वालों की संख्या कम न थी। तर्क यह था
कि जब प्रश्न पूछा ही नहीं गया तो फिर उन्हें दोषी क्यों माना जाए?

किंतुु सोमनाथ चटर्जी अपने
व्यक्तित्व के अनुरुप इस पर डटे रहे और न्यायालय तक को चेतावनी दे दी। यहां तक कि फिर से
उन सांसदों की पुनर्बहाली की कोशिशें भी हुईं। उस समय संसदीय कार्यमंत्री प्रियरंजन दास मुंशी ने
बयान दे दिया कि हमारे पास प्रस्ताव आएगा तो हम विचार करेंगे। पर सोमनाथ चटर्जी को मनाया न
जा सका। हम इन बातों के पक्ष और विपक्ष में हो सकते हैं, पर इतना बड़ा फैसला करने तथा उस पर
डटे रहने का साहस करने के लिए अंदर से निर्भीक एवं मजबूत होना जरुरी है। यही खासियत उनको
अन्य अनेक नेताओं से काफी अलग साबित करती है। आखिर जब उन्होंने लोकसभा के लिए अलग

टीवी चैनल का विचार सार्वजनिक किया तो उसका काफी विरोध हुआ। बावजूद उन्होंने इस पर
पुनर्विचार नहीं किया। लोकसभा टीवी आज उनकी एक प्रमुख देन के रुप में हमारे सामने है। ऐसे नेता
को हम कैसे विस्मृत कर सकते हैं।
अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408,
9811027208

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