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सोनभद्र संहार

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सोनभद्र खूनी संहार के खलनायक कौन 

अवधेश कुमार

पूरे प्रकरण को गहराई से देखने से साफ हो जाता है कि इसे केवल ग्राम प्रधान और उसके लोगों का अपराध नहीं माना जा सकता। इसमें पिछले साढ़े छः दशकों की सरकारें, प्रशासन सब शामिल हैं। आखिर उस जमीन की मिल्कियत का फैसला पहले ही हो जाना चाहिए था। अनपढ़, कानूनों से अज्ञात गरीबों के साथ सामान्यतः प्रशासन जैसा अपराध करता था वही यहा भी हुआ। इस अविध में ज्यादा समय तक कांग्रेस का शासन था, इसलिए अगर वर्तमान सरकार उसे कठघरे में खड़ा कर रही है तो वह गलत नहीं है। किंतु 1989 के बाद जो हुआ और 2017 तथा 2019 में जो हुआ उसके लिए किसे जिम्मेवार माना जाएगा? यह कानून को ठेंगा दिखाने वाले हमारे भ्रष्ट तंत्र का शर्मनाक प्रसंग है।

 

सामान्यतः यह कल्पना करना मुश्किल है कि किसी जमीन विवाद को लेकर अचानक एक पक्ष कब्जा करने के लिए हथियारों के साथ बड़े समूह के साथ आए तथा विरोध करने वालों पर गोलियों की बौछाड़ कर दे। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के घोरावल इलाके के उम्भा गांव में यही हुआ। किसी एक छोटे गांव में दस लोगों को मार दिया जाए तथा दो दर्जन के आसपास घायल हों तो वहां क्या स्थिति होगी इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। जमीन विवाद भारत के हर गांव और शहर में है। किसी कानून के राज में चाहे जमीन का जितना बड़ा विवाद हो इस तरह सरेआम हिंसा का दुस्साहस करने का उदाहरण अत्यंत कम मिलेगा। अंडरवर्ल्ड और अपराधी गिरोह एक समय शहरों में जमीन हथियाने के लिए अवश्य कभी-कभी ऐसा करते थे। किंतु वह भी बीते दिनों की बात हो गई। इतने बड़े कांड के बाद पुलिस प्रशासन को सक्रिय होना ही था। 78 लोगों के खिलाफ हत्या, हत्या की कोशिश, हथियारों के साथ दंगे करने समेत दूसरे अपराधों में मामला दर्ज किया गया है। काफी संख्या में लोग गिरफ्तार किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घोरावल के उप जिलाधिकारी, सीओ, कोतवाल व क्षेत्र के दरोगा सहित 4 सिपाहियों निलंबित किया है। हमले में इस्तेमाल 26 ट्रैक्टर और दो बंदूकें भी जब्त की गईं हैं। जो मार डाले गए वो लौटकर नहीं आ सकते, पर उम्मीद करनी चाहिए कि इस भयावह मामले में न्याय होगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गांव जाकर स्वयं कुछ वायदे किए हैं। किंतु यह सवाल पूरे देश में उठ रहा है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ?

जमीन को लेकर विवाद काफी पुराना है। ग्राम प्रधान का कहना था कि उसने जमीन खरीदी है तथा प्रशासन ने भी उस पर मुहर लगा दी है लेकिन स्थानीय लोग उसे कब्जाए बैठे हैं। ग्राम प्रधान अचानक भारी संख्या में ट्रैक्टर, और लोगों को लेकर खेतों को जुताई कराने लगा। स्थानीय निवासियों ने, जो आदिवासी हैं, विरोध किया तो उन पर हमला किया गया। उनने भी प्रति हमला किया। दोनों तरफ से ईंट, पत्थर, ढेले,लाठी, गड़ासा आदि से लड़ाई हुई किंतु ग्रामप्रधान की ओर से अचानक गोलियां चलने लगीं एवं फिर लोग ढेर होते चले गए। पहली नजर में देखने पर मामला स्थानीय प्रशासन और प्रभावी लोगों की मिलीभगत का दिखता है जिन्होंने आदिवासियों द्वारा लंबे से जोते जा रहे जमीनों को उनके नाम करने की जगह उसे खाली दिखाया। मुख्यमंत्री ने एक समिति बना दी है जो पूरी स्थिति की रपोर्ट 10 दिनों में देगी। आदिवासी बहुल सोनभद्र जिले में जगह-जगह भूमिहीन सरकारी जमीनें जोतकर वर्षों से गुजर-बसर कर रहे हैं। उन्हें जमीन का मालिकाना हक कभी नहीं दिया गया। जितने सर्वे हुए उनमें यह सच तो दिखा होगा कि वे जमीन जोत रहे हैं। लेकिन रिकॉर्ड में उन्हें भूमिहीन बताया जाता रहा। जिस गांव में यह खूनी संहार हुआ है वहां गोंड़ बिरादरी के लोग कई पुश्तों से खेती करते आए हैं। अब जितनी जानकारी सामने आई है गोंड जनजाति के लोग प्रशासन से लगातार गुहार लगाते रहे लेकिन उन्हें जमीन पर अधिकार नहीं दिया गया।

खूनी जमीन की पूरी कथा विचित्र है। 1955 में कांग्रेस के जुड़े एक प्रभावी व्यक्ति ने आदर्श कोऑपरेटिव सोसायटी का निबंधन कराया। इस जमीन में से तहसीलदार द्वारा 90 बिघा जमीन को उस आदर्श सोसायटी के नाम कर दिया गया। कहा जाता है कि सोसायटी का निर्माण स्थानीय निवासियों के विकास के उद्देश्य से किया गया था। यह तो छानबीन का विषय है उस समय से सोसायटी ने वाकई विकास के लिए काम किया या नहीं। 1955 से 1989 तक यह जमीन आदर्श सोसायटी के नाम पर थी। इस जमीन को बाद में 1989 में एक आईएएस के नाम पर कर दिया गया। यह कैसे हुआ? आईएएस अधिकारी ने ऐसा करने के पहले उस जमीन के कागजात अवश्य देखे होंगेे।

 

खूनी जमीन की पूरी कथा विचित्र है। 1955 में कांग्रेस के जुड़े एक प्रभावी व्यक्ति ने आदर्श कोऑपरेटिव सोसायटी का निबंधन कराया। इस जमीन में से तहसीलदार द्वारा 90 बिघा जमीन को उस आदर्श सोसायटी के नाम कर दिया गया। कहा जाता है कि सोसायटी का निर्माण स्थानीय निवासियों के विकास के उद्देश्य से किया गया था। यह तो छानबीन का विषय है उस समय से सोसायटी ने वाकई विकास के लिए काम किया या नहीं। 1955 से 1989 तक यह जमीन आदर्श सोसायटी के नाम पर थी। इस जमीन को बाद में 1989 में एक आईएएस के नाम पर कर दिया गया। यह कैसे हुआ? आईएएस अधिकारी ने ऐसा करने के पहले उस जमीन के कागजात अवश्य देखे होंगेे। आईएएस ने बाद मंें 6 सितंबर 1989 को अपनी पत्नी और बेटी के नाम कर दिया। यह सब कानून की आंखों के नीचे तथा बाजाब्ता राजस्व अदा करते हुए निर्धारित नियमों के तहत हुआ। कहा जा रहा है कि उस जमीन पर वो हर्बल की खेती करना चाहते थे। उसके लिए बाजाब्ता प्रोजेक्ट बना, जिसे प्रशासन की मंजूरी भी मिली। ंिकंतु जमीन पर काम करना संभव ही नहीं हुआ। आदिवासियों के कब्जे से वे जमीन खाली नहीं करा पाए। इसका मतलब हुआ कि इस जमीन को लेकर लड़ाई चल रही थी। उन्होंने इसे ग्राम प्रधान यज्ञदत्त भूरिया को बेच दिया। कानून के जानकार इसे लेकर एकमत नहीं हैं कि उस जमीन का निबंधन आदर्श सोसायटी के नाम होना चाहिए था या नहीं। कुछ का कहना है कि हो सकता है कुछ कहते हैं कि नहीं हो सकता। उसी तरह सोसायटी की जमीन किसी व्यक्ति के नाम निबंधित हो सकता है या नहीं इस पर भी दो राय है। किंतु एक बात सच है। वह जमीन किन्हीं कारणों से गोंड लोगों की जोत मेें है जो अपना कब्जा नहीं छोड़ना चाहते थे। यज्ञदत्त भूरिया ने जमीन खरीदने के साथ ही कब्जे का प्रयास आरंभ कर दिया था। वह न्यायालय भी गया और अपने पक्ष में फैसला भी ले आया।

इस भयावह घटना के बाद जानकारी मिली है कि पूर्व जिलाधिकारी ने सहायक अभिलेख अधिकारी को मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन कर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। उस आदेश पर अमल हो उससे पहले ही जिलाधिकारी का तबादला हो गया। उसके बाद 6 फरवरी 2019 को सहायक अभिलेख अधिकारी जमीन जोतने वालों को बेदखली का आदेश दे दिया। उसने आदेश किस आधार पर दिया यह बड़ा प्रश्न है। भौतिक सत्यापन और यथास्थिति के आदेश का अर्थ होता है वहां जाकर संबंधित अधिकारी देखे कि अभी जमीन किसके कब्जे में है तथा जब तक अंतिम फैसला न हो जाए यथास्थिति बनाए रखे। यह आदेश इसके विपरीत था। बेदखली के आदेश के साथ ही वहां तनाव आरंभ हो गया। जोतने वाले जमीन छोड़ने को तैयार नहीं जबकि ग्राम प्रधान हर हाल में उसे अपने कब्जे में लेना चाहता था। सामान्य तरीकों से सफल न होने के बाद उसके पास जितनी ताकत थी उन सबके साथ पहुंचा और जो हुआ हमारे सामने हैं। जानकारी के अनुसार उसने चार करोड़ रुपया देकर जमीन खरीदा था। इतना धन लगाने के बाद कोई भी उस संपत्ति को अपने नियंत्रण में लेना चाहेगा।

 

इस पूरे प्रकरण को गहराई से देखने से साफ हो जाता है कि इसे केवल ग्राम प्रधान और उसके लोगों का अपराध नहीं माना जा सकता। इसमें पिछले साढ़े छः दशकों की सरकारें, प्रशासन सब शामिल हैं। आखिर उस जमीन की मिल्कियत का फैसला पहले ही हो जाना चाहिए था। अनपढ़, कानूनों से अज्ञात गरीबों के साथ सामान्यतः प्रशासन जैसा अपराध करता था वही यहा भी हुआ। इस अविध में ज्यादा समय तक कांग्रेस का शासन था, इसलिए अगर वर्तमान सरकार उसे कठघरे में खड़ा कर रही है तो वह गलत नहीं है। किंतु 1989 के बाद जो हुआ और 2017 तथा 2019 में जो हुआ उसके लिए किसे जिम्मेवार माना जाएगा? यह कानून को ठंेंगा दिखाने वाले हमारे भ्रष्ट तंत्र का शर्मनाक प्रसंग है। जो वर्षों से जोत रहे हैं उनके नाम जमीन है नहीं। जमीन साढ़े छः दशक पहले एक सोसायटी के नाम हो गया। सोसायटी ने एक व्यक्ति के नाम कर दिया क्यांेकि वह उनके परिवार द्वारा संचालित है। परिवार ने उसे बेच दिया। जिसने खरीदा उसे प्रशासन से कब्जा लेने का आदेश मिल गया। कहीं प्रशासन का कोई सार्थक कानूनी हस्तक्षेप नहीं। क्या अंधेर नगरी है। कल्पना करिए उस क्षेत्र में जमीन को लेकर न जाने कहां-कहां कितनी अंधेरगर्दी होगी। कुछ तो आंखों दिख रहा है। भ्रष्टाचारी अधिकारियों,नेताओं, माफियाओं आदि ने परिवार वालों के नाम जमीनें खरीदकर फार्म हाउस, होटल-मोटल से लेकर खेती तक के परियोजनायें डाली हुईं हैं। राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से वहां सब कुछ हो रहा है। कहीं कोई रोक नहीं। साफ है कि वर्तमान घटना में विवादित जमीन का सच सामने आ जाएगा। किसका कानूनी हक है वह भी साफ हो जाएगा। दोषी भी चिन्हित होंगे। उसके बाद न्याय भी होगा। किंतु यह एक गांव की समस्या नहीं है। वास्तव में उस पूरे क्षेत्र के भूमिविवादों की सूची मंगाकर सबकी व्यापक और समग्र जांच कराई जानी चाहिए। मुख्यमंत्री ने पूरे जिले के लिए सक समिति बनाने तथी सर्वे करके अभियान जलाकर आवास से लेकर बिजली, शौचालय आदि सारी योजनाएं पहुंचाने की घोषणा की है। हालांकि इन सबसे अलग किसी भी अवस्था में कोई व्यक्ति इस तरह सरेआम हिंसा कैसे कर सकता है यह प्रश्न हमारे समाने मुंह बाए खड़ा है। अगर प्रशासन की शह नहीं हो तो सरेआम इस तरह का अपराध करने का दुस्साहस ग्राम प्रधान नहीं कर सकता है।

 

 

 

 

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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