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साक्षी मिश्रा अजितेश प्रकरण

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साक्षी मिश्रा अजितेश प्रकरण

मीडिया की भूमिका शर्मनाक

आखिर हम कैसा समाज बनाना चाहते हैं

अवधेश कुमार

 

कोई लड़की एक वीडियो जारी कर दे कि हमारे परिवार वाले हमें मारना चाहते हैं, यदि हमारे या हमारे ससुराल वाले के साथ कुछ भी हुआ तो उसका जिम्मेवार हमारा परिवार होगा तो क्या उसे ही एकमात्र सच मान लिया जाए? ऑनर किलिंग हुईं हैं किंतु हजारों प्रेम विवाह हो रहे हैं और लड़के-लड़की पति -पत्नी की तरह रहते हैं। मीडिया की पहली भूमिका यह होती है कि वह सच का पता करे। सुनी-सुनाई बातों को सच मान लेना पत्रकारिता नहीं है। टीवी चैनलों ने शादी करने वाले लड़की-लड़का के पक्ष को ही पूरा सच मानकर दिखाना शुरु किया। लड़के के पिता चैनलों में कहने लगे कि विधायक जी की छवि दबंग की है, पता नहीं इधर बदल गए हों तो नहीं मालूम। किसी ने पूछा तक नहीं कि आप जो आरोप लगा रहे हो उसके पक्ष में कोई प्रमाण है?

 

 

परिवार की इच्छा के विपरीत घर से भागकर लड़कियों के शादी करने की घटनाएं बढ़ रहीं हैं। लेकिन बरेली की एक लड़की साक्षी मिश्रा की अजितेश कुमार से शादी ने जिस तरह की राष्ट्रीय सुर्खियां बटोरीं उसने हमें कई बातों पर गंभीरता से विचार करने को विवश किया है। हमारा कानून एक बालिग को अपनी मर्जी से केवल शादी ही नहीं, कानून और संविधान के दायरे में स्वतंत्रता से कुछ भी करने का अधिकार देता है। वह उसके जीवन के लिए गलत हो या सही, माता-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी…..आदि निकट के रिश्तेदारों, जिन्हें खून का रिश्ता कहा जाता है, उनको भी उसे रोकने का अधिकार नहीं है। कानून ने हम सबको विवश कर दिया है कि जो कुछ हमारे बच्चे-बच्चियां कर लें हम केवल अपने दिल पर पत्थर रखकर देखने या जानने के लिए विवश हैं। यदि लड़की-लड़का कोई आरोप लगा दे तो हमारे पास सफाई देने के भी अवसर बहुत कम उपलब्ध्ध हैं। और मीडिया खासकर इलेक्टृरोनिक मीडिया हमें खलनायक बनाने के लिए छाती ताने खड़ा हैं। साक्षी मिश्रा और अजितेश की कहानी दो सामान्य युवती-युवक की कहानी होनी चाहिए जिनने अपनी मर्जी से भागकर शादी की। दोनों के जीवन की इतनी उपलब्धियां भी नहीं कि उनको सुर्खियां मिलें। किंतु हमारी इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने इसे राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया।

 

जातिभेद देश का कैंसर है। इसे खत्म करने का एक माध्यम अंतर्जातीय विवाह हो सकता है। इस आधार पर साक्षी और अजितेश की शादी का पहली नजर में समर्थन किया जाना अस्वाभाविक नहीं हैं। किंतु मीडिया की भूमिका इनमें क्या हो, कितनी हो और किस तरह की हो यह इस प्रकरण में पुनः सबसे बड़ा प्रश्न बनकर उभरा है। पूरा सोशल मीडिया टीवी चैनलों के खिलाफ आक्रोशपूर्ण, निंदापूर्ण प्रतिक्रियाओं से भरा हुआ है।  आम समाज की प्रतिक्रिया टीवी चैनलों के खिलाफ इतना आक्रामक है जिसकी शायद स्टुडियो में बैठने वालों को कल्पना नहीं होगी। यह सोशल मीडिया पर हो रही प्रतिक्रियाओं का दबाव है कि चैनलों को अब दूसरा पक्ष भी दिखाने को मजबूर होना पड़ा है। कोई लड़की एक वीडियो जारी कर दे कि हमारे परिवार वाले हमें मारना चाहते हैं, यदि हमारे या हमारे ससुराल वाले के साथ कुछ भी हुआ तो उसका जिम्मेवार हमारा परिवार होगा तो क्या उसे ही एकमात्र सच मान लिया जाए? ऑनर किलिंग हुईं हैं किंतु हजारों प्रेम विवाह हो रहे हैं और लड़के-लड़की पति -पत्नी की तरह रहते हैं। मीडिया की पहली भूमिका यह होती है कि वह सच का पता करे। सुनी-सुनाई बातों को सच मान लेना पत्रकारिता नहीं है। टीवी चैनलों ने शादी करने वाले लड़की-लड़का के पक्ष को ही पूरा सच मानकर दिखाना शुरु किया। लड़के के पिता चैनलों में कहने लगे कि विधायक जी की छवि दबंग की है, पता नहीं इधर बदल गए हों तो नहीं मालूम। किसी ने पूछा तक नहीं कि आप जो आरोप लगा रहे हो उसके पक्ष में कोई प्रमाण है?

लड़की को खोजने की कोशिश करना स्वाभाविक है और उसमें दोस्त, रिश्तेदार सब शामिल होते हैं। लड़की और लड़का इसे ऐसे पेश कर रहे थे मानो वे उनकी हत्या करने के लिए ही खोज रहे थे और चैनलों से इसे इसी रुप में प्रस्तुत भी किया। सच कहा जाए तो मीडिया की आरंभिक भूमिका गैर जिम्मेवार ही नहीं, शर्मनाक भी थी। स्टुडियो में लड़की, लड़का, लड़के के बाप को घंटों बिठाकर किसी परिवार की इज्जत को मटियामेट करने का अक्षम्य अपराध किया गया। लड़की अपनी मां, पिता, भाई सबको खलनायक बताती रही और लाइव चलता रहा। कोई काउंटर प्रश्न नहीं।

 

मीडिया को ऐसे मामलों में भारत की परिवार परंपरा को ध्यान रखते हुए मानवीयता तथा संवेदनशीलता का भी परिचय देना चाहिए। चैनलों की भूमिका बिल्कुल इसके विपरीत रही। चूंकि लड़की के पिता भाजपा के विधायक हैं, जाति से ब्राह्मण हैं इसलिए उनको कठघरे में खड़ा करना आसान है। विधायक हैं और वह भी सत्तारुढ़ पार्टी के तो वे जरुर सत्ता की ताकत का इस्तेमाल कर दोनों को धमकी दे रहे होंगे।  लड़के ने वीडियो में स्वयं को दलित बता दिया तब तो यह स्टोरी आसानी से बन जाती है कि इसी कारण वो अपनी बेटी एवं दामाद को खत्म करना चाहते होंगे। इसका रत्ती भर प्रमाण नहीं मिला कि लड़की परिवार की ओर से किसी ने भी धमकी दी हो। विधायक ने मीडिया के सामने आकर बयान दिया कि लड़की बालिग है, उसे अपना निर्णय करने का अधिकार है, वो जहां रहे खुश रहे, हमसे उसको डरने की आवश्यकता नहीं है। जब भी किसी परिवार की लड़की घर से भागती है तो कोहराम मच जाता है। यह हमारे समाज की स्वाभाविक स्थिति है। क्या पत्रकारों को इस सच का पता नहीं? अगर है तो वैसी स्थिति में जब यह साफ हो गया कि लड़की के भागने के दिन से ही उसकी मां की तबियत खराब है, उसके पिता को फोन पर लेकर उससे लगातार असुविधानजनक सवाल दागना किस तरह की मानवीयता, संवेदनशीलता एवं सामाजिक समझ का प्रमाण है? विधायक को कहना पड़ा कि आपलोग ऐसा मत करिए कि हमें आत्महत्या करना पड़े। किसी की दुखी मानसिकता का इससे बड़ी अभिव्यक्ति क्या हो सकती है? बावजूद यदि एंकर उससे लगातार सवाल दागते रहे तो इसे टॉर्चर के अलावा कुछ कहा ही नहीं जा सकता है। स्वनामधन्य बड़े एंकरों को तो उस विधायक से व्यवहार सीखना चाहिए जो विकट परिस्थिति में भी संयम बनाए रखकर इनके मूर्खतापूर्ण प्रश्नों का भी शालीनता और विनम्रता से उत्तर देता रहा।

 

प्रश्न है कि क्या एक पिता को इतना भी अधिकार नहीं कि वह घर से भागी हुई और हत्या करा देने की साजिश रचने का आरोप लगाने वाली लड़की से बात करने से मना कर दें? दूसरे, अगर किसी परिवार से लड़की भाग जाए तो खोजबीन स्वाभाविक है। चैनल वाले पूछ रहे थे कि आपके लोग जिस गेस्ट हाउस में ये ठहरे थे वहां पहुंचे कि नहीं?  जिस व्यक्ति पर आरोप है वह कह रहा है कि मेरे मोबाइल की लोकेशन जांच ली जाए। लड़की उसका उपहास उड़ाती है, लड़का व्यंग्य मुस्काल छोड़ता है। इसका कोई प्रमाण नहीं कि जिस गेस्ट हाउस में ये प्रयागराज में ठहरे थे वहां वाकई इनके लोग पहुंचे। लड़की को लड़का ही बताता है और वह आंख मूंदकर उसकी बात मान लेती है एवं गाड़ी में बैठे रास्ते से वीडियो वायरल कर दिया जाता है। मान लीजिए वे गेस्टहाउस तक पहुंचे भी तो इसमें गलत क्या है? लड़की को खोजने की कोशिश करना स्वाभाविक है और उसमें दोस्त, रिश्तेदार सब शामिल होते हैं। लड़की और लड़का इसे ऐसे पेश कर रहे थे मानो वे उनकी हत्या करने के लिए ही खोज रहे थे और चैनलों से इसे इसी रुप में प्रस्तुत भी किया। सच कहा जाए तो मीडिया की आरंभिक भूमिका गैर जिम्मेवार ही नहीं, शर्मनाक भी थी। स्टुडियो में लड़की, लड़का, लड़के के बाप को घंटों बिठाकर किसी परिवार की इज्जत को मटियामेट करने का अक्षम्य अपराध किया गया। लड़की अपनी मां, पिता, भाई सबको खलनायक बताती रही और लाइव चलता रहा। कोई काउंटर प्रश्न नहीं। मीडिया के समर्थन के कारण लड़के का साहस इतना बढ़ गया कि एक विधायक को सो कॉल्ड विधायक कहने लगा। अब पता चला कि बरेली के जिस मुहल्ले में लड़के का परिवार रहता था वहां लोग उसे ठाकुर जानते थे। सब आश्चर्य व्यक्त कर रहे थे कि वो दलित है यह उसके वीडियो से पता चला। लड़के के बारे में जो सच सामने आया वह उस मासूम तस्वीर से बिल्कुल अलग है जो आरंभ में टीवी चैनलों ने बनाया था। वह एक दबंग, नशेरी और न जाने क्या क्या चरित्र रखता है।

एक पत्रकार के साथ हम भी समाज के अंग हैं। अगर कोई लड़की किसी से प्र्रेम करती है तो यही वातावरण बनाना चाहिए लड़कियां और लड़के दोनों धैर्य का परिचय दें। विद्रोह और घर से भागना अंतिम विकल्प होगा। उसमें भी आजकल लड़कियां क्षण भर में वीडियो जारी कर देतीं हैं कि यदि हमारे यहां ससुराल पक्ष को कुछ हुआ तो उसकी जिम्मेवारी हमारे पिता के परिवार की होगी। साक्षी मिश्रा की घटना के बीच ही एक और ऐसा ही वीडियो वायरल हो रहा हैं। यह प्रवृत्ति भयावह है। मीडिया इसे प्रोत्साहित करके क्या लक्ष्य पाना चाहती है?

 

परिवार परंपरा हमारे समाज की रीढ़ है। वह खत्म हो गया तो समाज में अराजकता पैदा हो जाएगी। हम सबका दायित्व है कि परिवार परंपरा को सुदृढ़ बनाए रखें। कोई लड़की परिवार से विद्रोह करके शादी करती है तो वह प्रताड़ित न हो इसके लिए अवश्य काम किया जाए लेकिन परिवार को खलनायक बनाकर घर से भागकर शादी करने को प्रोत्साहन देना भविष्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। एक पत्रकार के साथ हम भी समाज के अंग हैं। अगर कोई लड़की किसी से प्र्रेम करती है तो यही वातावरण बनाना चाहिए लड़कियां और लड़के दोनों धैर्य का परिचय दें। विद्रोह और घर से भागना अंतिम विकल्प होगा। उसमें भी आजकल लड़कियां क्षण भर में वीडियो जारी कर देतीं हैं कि यदि हमारे यहां ससुराल पक्ष को कुछ हुआ तो उसकी जिम्मेवारी हमारे पिता के परिवार की होगी। साक्षी मिश्रा की घटना के बीच ही एक और ऐसा ही वीडियो वायरल हो रहा हैं। यह प्रवृत्ति भयावह है। मीडिया इसे प्रोत्साहित करके क्या लक्ष्य पाना चाहती है? पिता-माता को दुश्मन बनाकर पेश करना कहां तक उचित है? दूसरे, यह भी विचार करने का प्रश्न है कि माता-पिता का अपने बच्चों पर कोई अधिकार होना चाहिए या नहीं? जब वे नाबालिग हैं तो उनके लिए अलग कानून और बालिग हैं तो अलग। माता-पिता व अन्य रिश्तेदारों का अपने बच्चों के प्रति कोई अधिकार है ही नहीं। उनके केवल दायित्व है। क्या बच्चों का कोई दायित्व नहीं? ये ऐसे प्रश्न हैं जिन पर आज हमें गंभीरता से विचार कर कुछ व्यवस्था करना होगा। पत्रकार के नाते हमारी भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।

 

1 Comment

  1. आप जैसे लोग ही पत्रकारिता की काली कोठरी में दीपक की तरह उजाला फैला रहे है।
    बहुत बहुत धन्यवाद।
    टीवी चैनलो के बड़े बड़े स्वयंभू पत्रकारों ने तो ज़मीर बेच दिया है।

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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