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व्यापम घोटाले में मौत

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अवधेश कुमार

हमें इन राजनीतिक हंगामों और मीडिया के हल्लाबोल से परे दो विन्दुओं पर विचार करना है। एक, व्यापक घोटाले एवं मौतों का सच क्या है और दो, क्या होना चाहिए?

इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं कि मध्यप्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल यानी व्यापमं परीक्षाएं महाभ्रष्टाचार का अड्डा बन रहीं थीं। अब तक एसटीएफ एवं एसआईटी की जांच के बाद इसे लेकर कोई संदेह की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। इसमें सबसे चिंताजनक पहलू उभर रहा है, घोटाले से किसी तरह जुड़े लोगों की मौत। इसकी ठीक संख्या बताना कठिन है, कारण एनजीओ एवं विपक्ष 45 तक की बात कर रहा है। हालांकि मुकदमा दर्ज होने के बाद ऐसे करीब 25 मौतें हैं जिनके बारे कें कहा जा सकता है कि इनका संबंध किसी न किसी रुप में व्यापम से था। इससे कई प्रकार के संदेह पैदा होते हैं। इसे लेकर विपक्ष एवं मीडिया का हल्लाबोल को भी अस्वाभाविक नहीं माना जा सकता है। आखिर भारत में विपक्ष की भूमिका समस्या के निदान एवं विवेक अविवेक से विरोध का तो है नहीं। अपना राजनीति हित जिसमें सधता हो, विरोधी की छवि जिससे कलंकित होती तो, वह जिस तरीके से दोषी साबित होता हो, उसे अपनाओ। यही कांग्रेस और कुछ दूसरी पार्टियां कर रहीं हैं।
लेकिन हमें इन राजनीतिक हंगामों और मीडिया के हल्लाबोल से परे दो विन्दुओं पर विचार करना है। एक, व्यापक घोटाले एवं मौतों का सच क्या है और दो, क्या होना चाहिए? रिपोर्टिंग के बीच मध्य प्रदेश के झाबुआ में टीवी पत्रकार अक्षय सिंह की मौत ने इधर अक्षय सिंह की मौत ने अचानक आग में घी का काम किया। इसी बीच जबलपुर के मेडिकल कॉलेज के डीन अरुण शर्मा का शव दिल्ली के होटल में पाया गया। उन्होंने विशेष जांच दल को 200 पृष्ठों का दस्तावेज मुहैया कराया था जिसमें फर्जी मेडिकल छात्रों की जानकारी थी। इन दोनों मौत से 4 और 5 दिनों पूर्व इन्दौर जेल से अस्पताल लाए गए नरेन्द्र सिंह तोमर की तथा जमानत पर रिहा हुए राजेन्द्र आर्य की मौत हो गई थी। इस तरह की मौतों से संदेह पैदा होता है कि कहीं इस घोटाले से जुड़े लोग ऐसे लोगों को रास्ते से हटाने का अपराध तो नहीं कर रहे जो उनके लिए सजा दिलवाने का कारण बन सकते हैं?
लेकिन इन दोनों के पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत के ऐसे कारण नहीं मिले हैं जिनसे संदेह हो कि इनको मारा गया है। तो इस सच को नकारकर किसी निष्कर्ष तक पहुंचना उचित नहीं होगा। एक प्र्रशिक्षु उप निरीक्षक अनामिका कुशवाहा की जलाशय में कूदकर जान देने की घटना को भी व्यापम से जोड़ दिया गया, जबकि उसका इससे कोई लेना देना नहीं है। उस लड़की का व्यापम में कहीं नाम ही नहीं था। कहने का अर्थ यह कि हर मौत को व्यापम से जोड़ देना गलत है। इससे केवल सनसनाहट पैदा होती है।

सरकारी नौकरियों में करीब हजार से ज्यादा बहाली तथा मेडिकल में 500 से ज्यादा नामांकन संदेह के घेरे में है। किंतु व्यापक घोटाले की जांच के लिए एसटीएफ का गठन किया गया। जबलपुर उच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति चंद्रेश भूषण के नेतृत्व में विशेष जांच दल का गठन किया। मामले की जांच उच्च न्यायालय की निगरानी में चल रही है। करीब 2000 लोग गिरफ्तार हो चुके हैं जिनमें पूर्व शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा तथा उनके प्रभावी ओएसडी शामिल हैं। 55 से ज्यादा मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। तो यह नहीं कहा जा सकता है कि मामले की जांच में कोई कोताही है।

व्यावसायिक परीक्षा मंडल मध्यप्रदेश में तकनीकी, पेशेवर संस्थानों में नामांकन की परीक्षायें लेता है तथा उन पदों पर नियुक्तियां करता है, जो म.प्र. लोक सेवा आयोग से बाहर हैं। इसमें प्री मेडिकल टेस्ट, प्री इंजीनियरिंग टेस्ट और कई सरकारी नौकरियों की परीक्षाएं होतीं हैं। इसने प्रवेश एवं भर्ती परीक्षा को शर्मसार कर दिया थां कॉन्ट्रैक्ट टीचर्स, ट्रैफिक पुलिस, सब इंस्पेक्टरों की भर्ती परीक्षा के अलावा मेडिकल प्रवेश परीक्षा में ऐसे लोगों को भी सफल घोषित किया गया जिनके पास परीक्षा में बैठने की योग्यता नहीं थी। सरकारी नौकरियों में करीब हजार से ज्यादा बहाली तथा मेडिकल में 500 से ज्यादा नामांकन संदेह के घेरे में है। किंतु व्यापक घोटाले की जांच के लिए एसटीएफ का गठन किया गया। जबलपुर उच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति चंद्रेश भूषण के नेतृत्व में विशेष जांच दल का गठन किया। मामले की जांच उच्च न्यायालय की निगरानी में चल रही है। करीब 2000 लोग गिरफ्तार हो चुके हैं जिनमें पूर्व शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा तथा उनके प्रभावी ओएसडी शामिल हैं। 55 से ज्यादा मुकदमे दर्ज हो चुके हैं।

जो मौतें हो रहीं हैं, वे जांच के दायरे में नहीं हैं। हम नहीं कहते कि हर मौत  जिसे लेकर हल्लाबोल जारी है वह सब हत्या ही है। यदि संदेह पैदा हो गया है तो इसकी समग्र जांच या छानबीन कराने में कोई समस्या नहीं है। जिस तरह का माफिया तंत्र परीक्षा और भर्तियां में कायम हो गया है उसमें कुछ लोग अपने को बचाने के लिए गवाहों को रास्ते से हटाने का अपराध कर सकते हैं। इसलिए इनकी सिट के माध्यम से या फिर केन्द्रीय एजेंसी के द्वारा समग्र जांच कराई जानी चाहिए।

तो यह नहीं कहा जा सकता है कि मामले की जांच में कोई कोताही है। पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्म से लेकर व्यापम के नियंत्रक, सिस्टम एनेलिस्ट सहित बड़े लोगों की गिरफ्तारियां इसके प्रमाण हैं। हालांकि तीन मामले उच्चतम न्यायालय में आ गए हैं। उसे अगर जांच में कोई कोताही नजर आई तो इसके लिए अलग से आदेश दे सकता है। और वह चाहे तो राज्य के बाहर भी इसे स्थानांतरित कर सकता है।shivraj-vyapam-

जो मौतें हो रहीं हैं, वे इस जांच के दायरे में नहीं हैं। हम नहीं कहते कि हर मौत जिसका जिक्र किया जा रहा है या जिसे लेकर हल्लाबोल जारी है वह सब हत्या ही है। बावजूद इसके यदि संदेह पैदा हो गया है तो इसकी समग्र जांच या छानबीन कराने में कोई समस्या नहीं है। वैसे भी जिस तरह का माफिया तंत्र परीक्षा और भर्तियां में कायम हो गया था उसमें कुछ लोग अपने को बचाने के लिए गवाहों को रास्ते से हटाने का अपराध कर सकते हैं। इसलिए इनकी सिट के माध्यम से या फिर केन्द्रीय एजेंसी के द्वारा समग्र जांच कराया जाना चाहिए। अगर मान लिजिए वाकई कुछ हत्यायें हैं तो अपराधी पकड़े जाएंगे और कम से कम आगे किसी की जान नहीं जाएगी। हत्या नहीं है तो फिर हल्लाबोल और हंगामा रुक जाएगा।

तीन मामले उच्चतम न्यायालय में आ गए हैं। उसे अगर जांच में कोई कोताही नजर आई तो इसके लिए अलग से आदेश दे सकता है। और वह चाहे तो राज्य के बाहर भी इसे स्थानांतरित कर सकता है।

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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