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विधानसभा चुनाव परिणामों को ऐसे समझिए

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क्यों हारी भाजपा

अवधेश कुमार

 

कांग्रेस ने मंदिर पर केवल यह कोशिश की कि वह इसका विरोधी न दिखे। यह तो नहीं माना जा सकता कि मतदाताओं ने राहुल गांधी को मोदी से बड़ा हिन्दुत्व का समर्थक मान लिया, पर भाजपा के मुखर न होने से उसको निराशा अवश्य हुई। चुनाव का सामान्य सूत्र है कि यदि आपके मूल समर्थक और कार्यकर्ता उत्साहित नहीं हों तो मतदान केन्द्रों तक मतदाताओं के आने के लिए प्रेरित करने वाली मूल शक्ति कमजोर हो जाती है। यह कारक चुनाव परिणामों का निर्धारक रहा है।

देश में जैसा राजनीतिक वातावरण निर्मित हो चुका है उसमें हर चुनाव को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता का पैमाना तथा 2019 के लोकसभा चुनाव की दृष्टि से विश्लेषित किया जाता है। विधानसभा चुनाव में मतदान कई कारकों पर निर्भर करता है जिसमें शीर्ष नेता एक कारक हो सकता है, सम्पूर्ण नहीं। वैसे भी मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जहां भाजपा और कांग्रेस के बीच ज्यादातर सीटों पर सीधा मुकाबला था वहां मुख्यमंत्री पहले से मौजूद थे। इसलिए यह केवल एक नेता की लोकप्रियता का सर्वे़क्षण नहीं था। बावजूद इसके यह भी नहीं माना जा सकता कि इन चुनावों से मोदी सरकार और भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व के लिए संदेश नहीं है। यह कहना आसान है कि जब आप केन्द्र और प्रदेश दोनों की सत्ता में हैं तो सत्ता विरोधी रुझान स्वाभाविक होता है। किंतु क्यों होता है? जब आप अच्छा शासन देंगे, जनता के हितों का ध्यान रखेंगे, कानून और व्यवस्था कायम रखेंगे, अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं का विश्वास बनाए रखेंगे तो सत्ता विरोधी रुझान हो ही नहीं सकता। यही बात राजस्थान पर लागू होता है। यह कहकर कि राजस्थान में हर बार सरकारें बदल जाती हैं इनके कारणों की अनदेखी नहीं की जा सकती। जाहिर है, यदि परिणाम भाजपा के अनुकूल नहीं हैं तो इन सारे पहलुओं में किसी की या कुछ की अनदेखी हुई है।

चुनाव परिणामों का विश्लेषण करते समय हम बड़ी बातों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, पर कई बार सामान्य बातें भी मतदाताओं के निर्णय को प्रभावित करतीं हैं। कुछ बातें पहले से साफ थीं। मसलन, अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून में उच्चतम न्यायालय द्वारा किए गए संशोधन को संसद में पलटने के निर्णय से सवर्ण वर्गों के अंदर असंतोष था। हालांकि इसके पीछे सभी पार्टियों की भूमिका थी लेकिन शासन में होने के कारण मुख्य निशाने पर भाजपा थी। कांग्रेस ने रणनीति के तहत संसद में विधेयक पारित होने के पहले तो आक्रामकता दिखाई पर जब लगा कि इससे बड़े वर्ग में नाराजगी पैदा हो रही है तो उसने इस विषय पर बोलना ही बंद कर दिया। भाजपा ने नाराजगी को ठीक से समझकर इसे दूर करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। यह भाजपा का मुख्य जनाधार रहा है। इसमें लोग गुस्से में मतदान न करें, नोटा का बटन दबा दें या विपक्ष को दे दें तो परिणाम पक्ष में आ नहीं सकता। हालांकि मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह ने कहा कि बिना जांच किसी की गिरफ्तारी नहीं होगी, दूसरे राज्यों में यह भी नहीं हुआ। मध्यप्रदेश में सपाक्स नाम से पार्टी भी बन गई जिसने चुनाव में अच्छा प्रदर्शन भले नहीं किया पर जितने को प्रभावित किया उनमें ज्यादातर भाजपा के ही मतदाता होंगे। यह भाजपा के लिए ऐसा संकेत है जिससे बचने का रास्ता उसे निकालना होगा।

यह प्रश्न आरंभ से ही इस चुनाव में सबके जेहन में उठता रहा कि कांग्रेस ने भाजपा के हिन्दुत्व की काट के लिए जिस तरह रणनीतियां बनाईं उसका उसे लाभ मिलेगा या नहीं? रामपथगमन से लेकर साधु-संतों को प्रसन्न करने़, गोसरंक्षण, वेद पर शोध आदि घोषणाएं भाजपा के समानांतर स्वयं को हिन्दुत्व के प्रति ज्यादा निष्ठावान साबित करने के लिए ही था। इसी चुनाव में पुष्कर के ब्रह्मामंदिर पूजन से राहुल गांधी का गोत्र सामने आया। कांग्रस के हिन्दुत्व तेवर का सामना करने के लिए योगी आदित्यनाथ उतरे। इसका असर अवश्य हुआ होगा। रामजन्मूभूमि का मुद्दा सामने था। योगी आदित्यनाथ के लिए कोई आश्वासन देना संभव नहीं था। इस पर कोई बात प्रधानमंत्री ही कह सकते थे। उन्होंने राजस्थान में बोला भी तो केवल इतना कि कांग्रेस बाधा बन रही है। वह उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को महाभियोग का भय दिखाकर डराती है तथा उसके वकील न्यायालय से मामला टालने का अनुरोध करते हैं। इससे मंदिर या हिन्दुत्व के आधार पर उससे जुड़ने वाले मतदाता संतुष्ट नहीं हो सकते थे। कांग्रेस के नेता सीपी जोशी ने कह दिया कि राममंदिर का निर्माण तो कोई कांग्रेसी प्रधानमंत्री ही करेगा। कांग्रेस के नेतृत्व ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। कांग्रेस ने मंदिर पर केवल यह कोशिश की कि वह इसका विरोधी न दिखे। यह तो नहीं माना जा सकता कि मतदाताओं ने राहुल गांधी को मोदी से बड़ा हिन्दुत्व का समर्थक मान लिया, पर भाजपा के मुखर न होने से उसको निराशा अवश्य हुई। चुनाव का सामान्य सूत्र है कि यदि आपके मूल समर्थक और कार्यकर्ता उत्साहित नहीं हों तो मतदान केन्द्रों तक मतदाताओं के आने के लिए प्रेरित करने वाली मूल शक्ति कमजोर हो जाती है। यह कारक चुनाव परिणामों का निर्धारक रहा है। आदित्यनाथ यदि हुंकार नहीं भरते तो राजस्थान में भाजपा की दुर्गति ज्यादा होती। कांग्रेस किसी तरह अपने पुराने ब्राह्मण मतदाताओं को भाजपा से तोड़ना चाहती थी। इसलिए राहुल गांधी का पूजा एवं गोत्र दांव चला जिसका कुछ असर हुआ है।

चुनाव परिणामों का विश्लेषण करते समय हम बड़ी बातों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, पर कई बार सामान्य बातें भी मतदाताओं के निर्णय को प्रभावित करतीं हैं। कुछ बातें पहले से साफ थीं। मसलन, अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून में उच्चतम न्यायालय द्वारा किए गए संशोधन को संसद में पलटने के निर्णय से सवर्ण वर्गों के अंदर असंतोष था। हालांकि इसके पीछे सभी पार्टियों की भूमिका थी लेकिन शासन में होने के कारण मुख्य निशाने पर भाजपा थी। कांग्रेस ने रणनीति के तहत संसद में विधेयक पारित होने के पहले तो आक्रामकता दिखाई पर जब लगा कि इससे बड़े वर्ग में नाराजगी पैदा हो रही है तो उसने इस विषय पर बोलना ही बंद कर दिया। भाजपा ने नाराजगी को ठीक से समझकर इसे दूर करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। यह भाजपा का मुख्य जनाधार रहा है। इसमें लोग गुस्से में मतदान न करें, नोटा का बटन दबा दें या विपक्ष को दे दें तो परिणाम पक्ष में आ नहीं सकता।

कांग्रेस ने किसानों के नाम पर हुए आंदोलन को ध्यान में रखते हुए कर्जमाफी का वायदा किया। राहुल गांधी हर सभा में इसका वायदा करते थे। छत्तीसगढ़ में तो गंगाजल लेकर कांग्रेस नेताओं ने कसम खाई कि किसानो का कर्ज अवश्य माफ करेंगे। छत्तीसगढ़ं एवं मध्यप्रदेश से यह खबर आने लगी थी कि किसान अपना धान बेचने सहकारी केन्द्रों पर नहीं आ रहे और न कोई बैंक की किश्त दे रहा है। इसे कांग्रेस की कर्ज माफी वायदे के प्रभाव के साथ जोड़ना बिल्कुल गलत नहीं था। मध्यप्रदेश में 230 में से 170 सीटें ग्रामीण क्षेत्र से आतीं हैं जहां भारी मतदान हुआ। हालांकि भाजपा ने सब जगह उज्जवला योजना के तहत दिए गए गैस कनेक्शन, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मिले घरों, शौचालयों एवं बिजली कनेक्शनों पर भरोसा किया। इनने भाजपा की प्रतिष्ठा बचाई लेकिन इतना ज्यादा प्रभावी नहीं हो पाया कि हर जगह 2013 के परिणामों की पुनरावृत्ति कर दे।

ऐसा नहीं है कि भाजपा को विरोधी रुझानों और रणनीतियों का आभास बिल्कुल नहीं था। अमित शाह ने महीनों पहले से काम करना आरंभ किया था। सभी राज्यों में सर्वेक्षण कराए गए, विधायकों एवं मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड खंगाला गया। पन्ना प्रमुखों से लेकर उपर तक के कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें चलतीं रहीं। निर्ममता से विधायकों के टिकट भी काटे गए। राजस्थान में छः मंत्रियों सहित 56 तो मध्यप्रदेश में पांच मंत्रियों सहित 53 विधायकों की जगह नये उम्मीदवार उतारे गए। इसका  कई जगह स्वागत हुआ तो बागी कूद पड़े और भीतरघात भी हुआ। राजस्थान में बागियों और भीतरघात का असर साफ दिखा है। वैसे राजस्थान में वसुंधरा राजे के खिलाफ पार्टी के अंदर असंतोष था। वसुंधरा की जगह प्रदेश अध्यक्ष को बदला गया। सरकार की डोर मुख्यमंत्री के हाथों होतीं हैं अध्यक्ष के हाथों नहीं। घनश्याम तिवाड़ी जैसे बड़े नेता को विद्रोह करके अलग पार्टी बनानी पड़ी। उन्होंने ब्राह्मण मतदाताओं का प्रभावित किया। किरोड़ीमल मीणा को पार्टी में लाकर इसकी भरपाई करने की कोशिश हुई। राजपूत राजस्थान में भाजपा के परंपरागत मतदाता रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में वसुंधरा ने जसवंत सिंह को उम्मीदवार नहीं बनने दिया तथा उनकी जगह कांग्रेस से आए एक नेता को खड़ा किया। जसवंत सिंह को हराने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। आनंदपाल सिंह का एनकांउटर तथा राजपूत समाज के कार्यालयों पर छापे का विपरीत असर हुआ। 26 राजपूतों को टिकट दिया गया। बावजूद इसके इस समाज के बड़े वर्ग ने भाजपा से मुंह मोड़ लिया था। सचिन पायलट ने पिछले चार वर्षो में राजस्थान में जिस तरह सरकार विरोधी वातावरण बनाया उसे जितनी बड़ी चुनौती के रुप में भाजपा को लेना चाहिए था शायद नहीं लिया। अमजमेर और अलवर लोकसभा उपचुनाव की हार बदलते वातावरण का संकेत था। वसुंधरा ने किसानों के 50 हजार तक की कर्ज माफी से इसकी भरपाई की कोशिश की। परिणाम बताते हैं यह पर्याप्त नहीं था। ऐसा नहीं है कि राजस्थान में वसुंधरा ने काम नहीं किए। काफी काम किए लेकिन पार्टी और समर्थकों को साथ बनाए रखने में वे पूरी तरह सफल नहीं रहीं। आखिर पिछले विधानसभा चुनाव में 12 प्रतिशत मतों के बड़े अंतर से भाजपा जीती थी। लोकसभा चुनाव में यह अंतर 20 प्रतिशत तक चला गया। इतने बड़े अंतर को पाटने का अर्थ है कि वसुंधरा एवं सरकार के प्रति असंतोष व्यापक था। छत्तीसगढ़ में पिछला चुनाव भाजपा ने केवल .75 प्रतिशत के अंतर से जीता था। इतना महीन अंतर कभी भी पाटा जा सकता था। 2003 से 2013 तक हार का अंतर घटता रहा। रमण सिंह इस खतरे को दूर करने में जितना सफल हो सकते थे नहीं हुए।

 

 

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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