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लौटते, बिलखते, कुचलते श्रमिकों के गुनहगार कौन

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कौन हैं इनके अपराधी
अवधेश कुमार

लॉकडाउन आरंभ होने के समय लगता था कि ज्यादातर नासमझी कर रहे हैं। जब केन्द्र एवं राज्य सरकारें श्रमिकों के खाने-पीने से लेकर रहने तक की व्यवस्थाएं कर रहीं हैं तो इन्हें लॉकडाउन तोड़ने की जरुरत नहीं है। एक अंश के लिए यह सोच सही भी थी। किंतु अब उनको दोष दिए जाने का कोई कारण नहीं है। उनकी आपबीती सुनकर यह भयावह सच आईने की तरह साफ हो रहा है कि ज्यादातर के पास संकट की घड़ी में कोई पीठ पर हाथ रखने नहीं पहुंचा है। अगर उनको राशन नहीं मिलेगा, भोजन भी मिलेगा नहीं, नियोक्ता उनके हाल पर छोड़ देंगे, कहेंगे कि अब हमारा काम नहीं चल रहा तुम लोग चले जाओ, मकान मालिक किराये के लिए दबाव डालेगा, सरकार और प्रशासन उनकी ओर से मुंह फेरे रहेगा…..तो फिर विकल्प क्या बचता है?

सड़कों पर अपने गांवों-कस्बों-शहरों की ओर पैदल लौटते कामगारों के दृश्य किसी को भी विचलित कर सकते हैं। यह आसानी से गले उतरने वाली स्थिति नहीं है कि झूंड के झूंड लोग 1000-2000 कि. मी. पैदल चलने को विवश हो जाएं। अपने सामानों को सिर पर उठाए, या किसी अन्य तरीके से ढोते, बच्चों को गोद में लिए महिलाएं, छोटे-छोटे बच्चे भी अपने माता-पिता के साथ पैदल चले जा रहे हैं। एक अंतहीन स्थिति सी है। यह बात समझ से परे है कि एक समय जब लौकडाउन में किसी भी सवारी की व्यवस्था नहीं थी तो लोगों के सामने पैदल चलने का ही विकल्प था। लेकिन अब तो केन्द्रीय गृह मंत्रालय की गाइडलाइन है, उनके लिए बसें तो छोड़िए राज्यों की मांगों पर स्वयं केन्द्र श्रमिक रेलें चला रहा हैं। कैसे उनको वर्तमान स्थान से अपने मूल निवास तक ले जाना है इसके लिए राष्ट्रीय स्तर की रुपरेखा निर्धारित है। इसमें पैदल चलते हुए एक भी व्यक्ति नहीं दिखना चाहिए। तो इसके लिए किसे जिम्मेवार माना जाए? इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर जरुरी हो जाता है, क्योंकि सब कुछ सामने दिखते हुए भी रोकने का सफल प्रयास नहीं दिख रहा। यहां तक कि ये दुर्भाग्यशाली सड़कों पर कुचलकर, गाड़ियों के टक्कर से या फिर रेल लाइन पर कटकर जान भी गवां रहे हैं, पर लगता ही नहीं कि किसी की पेशानी पर बल पड़ा हो।
जब महाराष्ट्र के औरंगाबाद में 16 श्रमिक रेल पटरी पर मालगाड़ी से कटकर मर गए और देश भर में हाहाकार मचा तो लगा कि यह इस कड़ी की अंतिम त्रासद घटना साबित होगी। किंतु, अब तो यह क्रम सा बन गया है। आए दिन लोग जान गवां रहे हैं। केवल 15 मई को सड़कों पर पैदल वापस जा रहे 31 श्रमिक मारे गएं और करीब 36 लोग बुरी तरह घायल हंए। उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में एक ट्रक के दूसरे ट्रक से टकराने की दुर्घटना में वापस घर लौट रहे 24 मजदूरों की मौत हो गई है। मृतक इसी ट्रक में सवार थे। ये सभी राजस्थान से बिहार-झारखंड और पश्चिम बंगाल जा रहे थे। अयोध्या हाईवे पर भी वाहनों ने 11 श्रमिकों को रौंद दिया। इसमें पांच लोगों की मौत हो गई। ये बहराइच, गोरखपुर और देवरिया जिलों के थे। उधर मध्य प्देश के गुना जिले में हुई सड़क दुर्घटना में भी तीन की मौत हो गई और14 लोग बुरी तरह से जख्मी भी हो गए हैं। ये महाराष्ट्र से उत्तर प्रदेश जा रहे थे। इसके दो दिनों पहले पंजाब से बिहार की ओर पैदल चल रहे आठ कामगारों को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में राज्य परिवहन निगम की एक बस ने कुचल दिया जिसमें छः मारे गए एवं दो अस्पताल में भर्ती हैं। महाराष्ट्र से मध्यप्रदेश पहुंच चुके कंटेनर में बैठे श्रमिकों के लिए गुना में एक बस से टक्कर आफत बन गई। इसमें आठ कामगार मारे गए एवं 20 से ज्यादा घायल हो गए। यदि आप लौकडाउन के समय से गणना करेंगे तो यह संख्या 200 से उपर पहुंच जाती है। लॉकडाउन आरंभ होने के समय लगता था कि ज्यादातर नासमझी कर रहे हैं। जब केन्द्र एवं राज्य सरकारें श्रमिकों के खाने-पीने से लेकर रहने तक की व्यवस्थाएं कर रहीं हैं तो इन्हें लॉकडाउन तोड़ने की जरुरत नहीं है। एक अंश के लिए यह सोच सही भी थी। किंतु अब उनको दोष दिए जाने का कोई कारण नहीं है। उनकी आपबीती सुनकर यह भयावह सच आईने की तरह साफ हो रहा है कि ज्यादातर के पास संकट की घड़ी में कोई पीठ पर हाथ रखने नहीं पहुंचा है। अगर उनको राशन नहीं मिलेगा, भोजन भी मिलेगा नहीं, नियोक्ता उनके हाल पर छोड़ देंगे, कहेंगे कि अब हमारा काम नहीं चल रहा तुम लोग चले जाओ, मकान मालिक किराये के लिए दबाव डालेगा, सरकार और प्रशासन उनकी ओर से मुंह फेरे रहेगा…..तो फिर विकल्प क्या बचता है?
साफ है कि यह राज्य सरकारों की आपराधिक विफलता है। वे ही इसके लिए जिम्मेवार हैं। लगता ही नहीं कि इनकी कोई जिम्मेवारी है। प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक में दुख प्रकट करते हुए कहा कि कुछ राज्यों ने जिम्मेवारी का ठीक से निर्वहन नहीं किया और उन्हें लॉकडाउन में जो जहां है वहीं ठहर जाए की नीति बदलने को मजबूर होना पड़ा। बड़ी संख्या में ऐसे हैं जिनको पता ही नहीं कि उनके लिए विशेष रेलें चलाई जा रहीं हैं। सूचना मिलती है वह भी गलत। दिल्ली गाजियाबाद सीमा पर जुटे लोग कहते हैं कि उनको बताया गया कि गाजियाबाद से रेल मिलेगी। वे जो बयान देते हैं उनसे वस्तुस्थिति का पता चलता है। जैसे एक नवजवान कामगार टीवी कैमरे पर कह रहा था कि किराया नहीं देने से मकान मालिक ने सारा सामान रख लिया और निकाल दिया। वह फफक कर रोने लगता है। एक व्यक्ति सात महीने के बच्चे को गोद लिए करोलबाग से पैदल आया है और कह रहा है कि बच्चे को उसकी मां से मिलवाना है, क्योंकि दोनों अलग हो गए। क्या दिल्ली सरकार को यह सब दिख नहीं रहा? अरविन्द केजरीवाल कामगारों से न जाने की पत्रकार वार्ता में अपील करते हैं लेकिन जाते हुए कामगारों को रोकने और उनके खाने-पीने की व्यवस्था के लिए न स्वयं आगे आते हैं न उनकी सरकार के अन्य लोगा। यह एक उदाहरण समझने के लिए पर्याप्त है कि राज्य सरकारें कैसा व्यवहार कर रहीं हैं।
उपाय बिल्कुल सरल है। रेलों की व्यवस्था होने के साथ राज्यों को रजिस्ट्रेशन केन्द्र बनाने हैं। सरकारी महकमा उन लोगों को लाकर रजिस्ट्रेशन कराए, उनकी मेडिकल जांच करे तथा संबंधित रेल पर बिठा दे। जिनके पास पूरी सही जानकारी नहीं उनको रास्ता दिखाने की जिम्मेवारी किसकी है? रेलों के किराए का 85 प्रतिशत भाग केन्द्र वहन कर रही है और 15 प्रतिशत राज्यों को करना है। ऐसा लगता है कि कुछ राज्य अपने हिस्से का 15 प्रतिशत ये देना ही नहीं चाहते इसलिए श्रमिकों को उनके हवाले छोड़ रहे हैं। अगर प्रशासन चाह ले तो ये पैदल जा ही नहीं सकते। इनको रोककर प्रक्रिया पूरी कराकर रेलों पर बिठाया जा सकता है। रेल मंत्री कह रहे हैं कि उनके पास 1200 और रेलें पड़ी हैं लेकिन राज्य सरकारें ले ही नहीं रही। पश्चिम बंगाल, राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य रुचि नहीं दिखा रहे। उत्तर प्रदेश के लिए 487 रेलें चलीं हैं तो बिहार के लिए 254 एवं मध्यप्रदेश के लिए 79। शेष राज्यों में काफी हो हल्ला के बाद राजस्थान से 22 रेलें चलीं हैं। पश्चिम बंगाल के लिए 105 रेलंें स्वीकृत हैं। उनमें से पहले केवल दो गईं। जब गृहमंत्री ने मुख्यमंत्री से बात की तो पांच रेलें और गईं। अगर 15 जून तक इनको लगातार चलाया जाए तब भी दो लाख से ज्यादा लोग नहीं जा सकते, जबकि करीब 40 लाख इनके कामगार दूसरे प्रदेशों में हैं। तो ये पैदल चलेंगे। वास्तव में आरंभ से ही कई राज्यों का रवैया शर्मनाक रहा है। केन्द्र ने तीन महीने का राशन दिया, दूसरे राज्यों के कामगारों के लिए राशि निर्गत की, इतने सामाजिक-धार्मिक संस्थाएं सेवा के लिए आगे आईं….लेकिन ये समन्वय बिठाकर काम करने की जगह अनदेखी करते रहे ताकि इनके सिर से भार हटे और मजबूर होकर लोग पलायन को विवश हो जाए। उत्तर प्रदेश और हरियाणा को छोड़कर ज्यादातर सरकारों का व्यवहार अमानवीय रहा है। तेलांगना, आंध्र और कर्नाटक ने थोड़ी देर से प्रयास किया। किंतु जिस तरह इनके पास प्रशासन को पहुंचकर काम करना चाहिए था नहीं किया गया। इस तरह का अपराध करने वाले राज्य सरकारों को कायदे से सत्ता में बने रहने का अधिकार नहीं है। केन्द्र को सख्ती से पेश आना चाहिए था। संविधान इसकी इजाजत नहीं देता अन्यथा ऐसे सरकारों को बरखास्त करके राष्ट्रपति शासन के तहत समुचित व्यवस्था की कोशिश होनी चाहिए। आखिर महाराष्ट्र में इतनी बड़ी दुर्घटना के बावजूद लोग कैसे चल रहे हैं?
दो अन्य बड़ी चुनौतियां और प्रश्न भी खड़े हुए हैं। धीरे-धीरे आर्थिक गतिविधियां आरंभ होने के कदम उठाए जा रहे हैं। अगर कामगार सारे चले ही जाएंगे तो फिर काम कौन करेगा? यह बात राज्यों को समझ तो आ रही है लेकिन वे अपनी कुटिलता, संवेदनहीनता में गलती करते जा रहे हैं। दूसरी समस्या उन राज्यों के लिए है जहां ये जा रहे हैं। आखिर इनका समायोजन कैसे होगा? कोई न कोई जीविकोपार्जन का साधन तो चाहिए। यह किसी राज्य के वश में नहीं है। नियोजन तो संसाधन के अनुसार ही हो सकता है। केन्द्र ने आर्थिक पैकेज में मनरेगा का विस्तार करके बिना कार्डधारी को काम देने तथा मानसून में भी काम कराने का मार्गनिर्देश दिया है। दूसरे राज्यों में रह रहे श्रमिकों के लिए भी मनरेगा में काम देने का निर्देश दिया गया है। बिना राशन कार्ड के राशन देने की व्यवस्था की गई है और यह खर्च केन्द्र अपने उपर वहन कर रहा है। किंतु अमल में तो राज्यों को ही लाना है। उनकी प्रवृत्ति देखते हुए विश्वास करना कठिन है वे वाकई अब पूरी जिम्मेवारी से काम करेेंगे। ऐसे ज्यादातर कामगार उनके मतदाता भी नहीं है कि वे डरें।

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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