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राफेल विवाद का सच ?-राफेल पर हंगामा करने से पहले सच तो जानिए

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राफेल पर हंगामा करने से पहले सच तो जानिए

अवधेश कुमार

 

 

इस तरह के हंगामे और न्यायालय में याचिकाओं को देखकर संदेह होता है कि कहीं विवाद पैदा करने के पीछे कुछ निहित स्वार्थी तत्व तो नहीं है। हो सकता है रक्षा सौदों के बिचौलिए छद्म वेश में जानबूझकर गलतफहमियां पैदा कर रहे हों। यह भी संभव है कि विमान बनाने वाली दूसरी कंपनियों की आपसी लड़ाई का शिकार हमारा देश हो रहा हो। या जो देश हमें रक्षा क्षेत्र में कमजोर बनाए रखना चाहते हैं वो इसके पीछे हों।  यह अत्यंत ही खतरनाक स्थिति है। चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों के बीच हमारी वायुसेना 33 वर्षों से उन्नत युद्धक विमानों के लिए तरस रही है और जब कोई सौदा सरकार ने साहस करके किया तो उसे इस तरह प्रश्नों के आग में झुलसा देने का आत्मघाती उपक्रम हो रहा है।  यह देश के लिए अपरिहार्य अपनी आवश्यकता के अनुसार किया गया अनुकूल सौदा है। यह दो सरकारों के बीच का सौदा है इसलिए इसमें दलाली की कोई संभावना हो ही नहीं सकती। 

राफेल सौदा पर खड़ा किया गया बावेला अपने चरम पर पहुंच रहा है। उच्चतम न्यायालय ने 14 नवंबर को इस पर सबसे बड़ी करीब 5 घंटे की सुनवाई की। इसमें पहली बार वायुसेना के तीन उच्चाधिकारियों का बयान भी हुआ। किसी भी रक्षा सौदा विवाद का यह पहला अवसर था जब न्यायालय ने इस तरह कहा हो कि सैन्य अधिकारियों का भी पक्ष वे जानना चाहते हैं। वायुसेना के अधिकारियों ने पूरी दृढ़ता से अपनी बातें रखीं। उन्होंने साफ कहा कि राफेल जैसे 4 प्लस या 5 वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों को बेड़े में शामिल किए जाने की जरूरत है। बिल्कुल संक्षिप्त नोटिस पर वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी- एयर वाइस मार्शल जे. चलपति, एयर मार्शल अनिल खोसला और उप वायुसेना प्रमुख एयर मार्शल वीआर चौधरी सुप्रीम न्यायालय पहुंचे। इनकी चर्चा सबसे पहले इसलिए आवश्यक है, क्योंकि इनसे राजनीति से परे वायुयानों की आवश्यकता, उसकी खरीद प्रक्रिया तथा सौदे के प्रावधानांे को राजनीति से परे होकर बोलने की अपेक्षा की जा सकती है। वायुसेना के अधिकारियों ने पीठ को बताया कि सुखोई 30 सेना में शामिल किया गया सबसे नवीनतम विमान है, जो 3.5 पीढ़ी का है। इसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने महाराष्ट्र के नासिक और कर्नाटक के बेंगलुरु में बनाया है। हमारे पास चौथी या पांचवीं पीढ़ी के वायुयान नहीं है। चलपति ने कहा कि देश को पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू यान की जरूरत है, जिसमें शानदार स्टील्थ टेक्नोलॉजी (चकमा देने की तकनीक) और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक युद्धक क्षमता होती है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने चलपति से वायुसेना में 1985 में मिराज विमान के बाद शामिल विमानों के बारे में पूछा। जब अधिकारी ने न में जवाब दिया तो मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इसका मतलब 1985 से 2018 तक कोई विमान शामिल नहीं हुआ। हालांकि इनसे पीठ ने ज्यादा नहीं पूछा और कहा कि वह अधिकारियों से इतना ही जानना चाहते थे और उन्होंने उनसे अपने दफ्तर जाने को कहा। इस दौरन राफेल सौदे में संप्रभु गारंटी की भी बात उठी। सरकार की ओर से पेश महाधिवक्ता ने कहा कि फ्रांस ने लेटर ऑफ कंफर्ट दिया है। वस्तुतः 25 सितंबर, 2015 को दिए लेटर ऑफ कंफर्ट में कहा गया है कि यदि किसी तरह की कोई मजबूरी आती है, तो फ्रांस सरकार उसका समाधान करेगा। न्यायालय ने यह जानकारी क्यों चाही यह अभी समझना मुश्किल हैं। तो देखते हैं न्यायालय इस पर क्या फैसला देता है? याचिकाकर्ताओं ने इसकी सीबीआई जांच की मांग की हुई है।

रिलायंस को ही ऑफसेट साझेदार चुनने के बारे में दस्साल्ट के सीईओ ने कहा कि इसमें निवेश किया गया पैसा सीधे तौर पर रिलायंस को नहीं जाएगा, बल्कि यह एक संयुक्त उद्यम को जाएगा। सरकार के बनाए गए नियमों के मुताबिक इस सौदे में रिलायंस 51 प्रतिशत पैसा लगाएगा और दसॉ को 49 प्रतिशत पैसा लगाना है। दोनों को एक साथ 800 करोड़ रुपये 50-50 प्रतिशत के अनुपात में लगाने हैं। इसके अनुसार दस्सॉल्ट ने अभ तक केवल 40 करोड़ रुपया लगाया है। 800 करोड़ की साझेदारी का मतलब है कि दस्सॉल्ट अगले सात वर्षों में करीब 400 करोड़ रुपया लगाएगा। राहुल गांधी कहते हैं कि मोदी ने 30 हजार करोड़ा रुपया अनिल अंबानी की जेब में डाल दिया। यह निहायत ही झूठ और गैर जिम्मेदाराना वक्तव्य है। 30 हजार करोड़ रुपया का तो कुल ऑफसेट नहीं है।

उच्चतम न्यायालय ने पहले सरकार से केवल खरीद प्रक्रिया की जानकारी बंद लिफाफे में मांगी थी। सरकार ने निर्धारित समय से पहले इसे जमा करा दिया। अगली सुनवाई में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इस जानकारी को सार्वजनिक किया जा सकता है। इसके साथ विमान की कीमत की जानकारी मांग ली। जब सरकार की ओर से महाधिवक्ता ने कहा कि यह इतनी गोपनीय जानकारी है कि संसद को भी नहीं दिया जा सका। इस पर न्यायालय ने कहा तो फिर आप इस बात का शपथपत्र दीजिए कि यह जानकारी क्यों नहीं दी जा सकती। सरकार ने इसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा सकता इसका शपथ पत्र तो दिया लेकिन कीमत भी न्यायालय को बंद लिफाफे में दे दिया। उसके बाद सरकार ने इस सौदे से जुड़ी खरीद प्रक्रिया की जानकारियां भी सार्वजनिक कर दीं। केंद्र सरकार की ओर से विमान खरीद की प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज याचिककर्ताओं को सौंप दिए गए। इस दस्तावेज की कुछ बातों का उल्लेख यहां आवश्यक है। इसमें कहा गया है कि राफेल की खरीद में सभी प्रकियाओं का पालन किया गया। इस प्रक्रिया के लिए फ्रांस सरकार से करीब एक साल तक बात चली। कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्यॉरिटी (सीसीएस) से अनुमति लेने के बाद समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि ऑफसेट साझेदार चुनने में सरकार की कोई भूमिका नहीं है। नियमों के मुताबिक विदेशी निर्माता किसी भी भारतीय कंपनी को बतौर ऑफसेट साझेदार चुनने के लिए स्वतंत्र है। यूपीए के जमाने से चली आ रही रक्षा उपकरणों की खरीद प्रकिया के लिए रक्षा खरीद प्रक्रिया 2013 का ही पालन किया गया है। इसमें स्पष्ट कहा गया है कि जब भारतीय वार्ताकारों ने 4 अगस्त 2016 को 36 राफेल जेट से जुड़ी रिपोर्ट पेश की, तो इसका वित्त और कानून मंत्रालय ने भी आकलन किया और सीसीएस ने 24 अगस्त 2016 को इसे मंजूरी दी। इसके बाद भारत-फ्रांस के बीच समझौते को 23 सितंबर 2016 को अंजाम दिया गया।

हालांकि ये सारी जानकारियां पहले से बाहर थीं। किंतु इसे औपचारिक तौर पर सरकार ने जारी नहीं किया था। इसलिए अब इसे सरकार का अधिकृत वक्तव्य माना जाना चाहिए। राफेल की राजनीति अपनी जगह है लेकि चूंकि न्यायालय में ये बातें कहीं गईं हैं इसलिए इसे ही सच मानकर चलना होगा। ये तो अपने देश में राफेल विवाद की कानूनी प्रक्रिया की बात हुई। इस बीच राफेल बनाने वाली कंपनी दस्सॉल्ट एविएशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एरिक ट्रैपियर का दोबारा विस्तृत बयान आया है। एक भारतीय मीडिया एजेंसी से बातचीत करते हुए उन्होंने एक-एक आरोप का जवाब दिया है। साथ ही कुछ और जानकारियां भी दी हैं। इसके पहले भी फ्रांस की एक वेबसाईट मीडिया मार्ट के द्वारा इसमें भ्रष्टाचार के सुबूत होने के दावे के बीच भी ट्रैपियर ने विन्दूवार जवाब दिया था। इन दोनों को मिलाकर देखने तथा अपने नजरिए से उसका मूल्यांकन कर सच तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। ट्रैपियर ने कहा कि मैं झूठ नहीं बोलता। मैंने पहले जो भी कहा और अब कह रहा हूं वह सच और सही है। ट्रैपियर के पूर्व के बयान पर  राहुल गांधी ने 2 नवंबर को झूठ करार दिया था। राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि दस्सॉल्ट ने अनिल अंबानी की कंपनी को 284 करोड़ रुपये दिए और अंबानी ने उसी पैसे से जमीन खरीदी। ट्रैपियर ने इसका जवाब देते हुए कहा कि मेरी छवि झूठ बोलने वाले व्यक्ति की नहीं है। मेरी पॉजिशन पर आकर आप झूठ बोलने का जोखिम नहीं ले सकते। ट्रैपियर ने तो यह भी कहा कहा उनका कांग्रेस पार्टी की सरकारों के साथ भी सौदा करने का पुराना अनुभव है। कांग्रेस अध्यक्ष की टिप्पणी से मैं दुखी हूं। यह सच है दस्सॉल्ट कंपनी के साथ आजाद भारत में पहला सौदा 1953 में हुआ था जब प. नेहरु प्रधानमंत्री थे। तबसे यह कंपनी भारत के साथ काम कर रही है। असल में वे यह कह रहे थे हमारी कंपनी किसी सरकार के लिए काम नहीं करती। वह भारत को रक्षा सामग्रिया देतीं हैं और उसमें अगर वह किसी तरह का धोखा करती तो पहले ही संबंध खराब हो गए होते।

विरोधी यह कहकर ट्रैपियर के वक्तव्य को खारिज कर सकते हैं कि रक्षा व्यापार करने वाली कंपनी अपने झूठ को छिपाने के लिए इस तरह के तर्क गढ़ रही है। किंतु उन्होंने अपने दोनों वक्तव्यों में जो कुछ कहा वे तथ्य जबतक गलत साबित न हो जाएं तब तक आप उन्हें झूठा नहीं कह सकते। मसलन, रिलायंस को ही ऑफसेट साझेदार चुनने के बारे में उन्होंने कहा कि इसमें निवेश किया गया पैसा सीधे तौर पर रिलायंस को नहीं जाएगा, बल्कि यह एक संयुक्त उद्यम को जाएगा। जहां तक इस सौदे की बात है तो मेरे पास इंजिनियर्स और कर्मचारी हैं, जो इसे लेकर काफी आगे हैं। दूसरी तरफ, हमारे पास रिलायंस जैसी भारतीय कंपनी है, जो इस संयुक्त उद्यम में पैसा लगा रही है।कंपनी यह भी जान सकेगी कि लड़ाकू विमान कैसे बनाए जाते हैं। सरकार के बनाए गए नियमों के मुताबिक इस सौदे में रिलायंस 51 प्रतिशत पैसा लगाएगा और दसॉ को 49 प्रतिशत पैसा लगाना है। दोनों को एक साथ 800 करोड़ रुपये 50-50 प्रतिशत के अनुपात में लगाने हैं। इसके अनुसार दस्सॉल्ट ने अभ तक केवल 40 करोड़ रुपया लगाया है। 800 करोड़ की साझेदारी का मतलब है कि दस्सॉल्ट अगले सात वर्षों में करीब 400 करोड़ रुपया लगाएगा। राहुल गांधी कहते हैं कि मोदी ने 30 हजार करोड़ा रुपया अनिल अंबानी की जेब में डाल दिया। यह निहायत ही झूठ और गैर जिम्मेदाराना वक्तव्य है। 30 हजार करोड़ रुपया का तो कुल ऑफसेट नहीं है। ट्रैपियर की यह बात भी सही है कि दस्सॉल्ट के पास 7 वर्ष हैं निवेश के लिए। वस्तुतः दस्सॉल्ट ने 30 कंपनियों के साथ साझेदारी किया है। रक्षा सौदे के अनुसार यह 40-40 प्रतिशत ऑफसेट हिस्सा है। इसमें रिलायंस का हिस्सा 10 प्रतिशत है। बाकी का 30 प्रतिशत दस्सॉल्ट एवं अन्य कंपनियों के बीच है। ऑफसेट साझेदारी की यह सच्चाई जिसकी हमारे यहां चर्चा ही नहीं होती। पता नहीं विरोधी अन्य कंपनियों की चर्चा क्यों नहीं करते हैं? केवल रिलायंस की चर्चा का क्या कारण हो सकता है?

 कीमत का उच्चतम न्यायालय के पास पूरा विवरण है। ट्रैपियर कह रहे हैं कि हमें पहले की तुलना मे 9 प्रतिशत सस्ता बेचना पड़ा है। उनके कथन हैं- जब आप 18 फ्लाइवे की कीमत से तुलना करते हैं तो 36 का दाम भी वही है। 36, 18 का दोगुना है। इसलिए यह रकम भी दोगुनी होनी चाहिए थी। चूंकि यह जीटूजी यानी दो सरकारों के बीच का समझौता हैै, इसलिए कीमत पर मोल-भाव हुआ। मुझे इसकी कीमत 9 प्रतिशत कम करनी पड़ी।’ रक्षा विशेषज्ञ भी यही मानते हैं कि वाकई पूर्व की तुलना में सौदा सस्ता है। इनको नकारकर हम राहुल या विरोधियों की बातें मान लें यह कैसे संभव है?

 

यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि इस सौदे से रिलायंस को लाभ पहुंचाने के लिए एचएएल को अलग कर दिया गया। हालांकि जब यूपीए के काल में सौदा हुआ ही नही ंतो यह दावा करना गलत है कि पहले एचएएल सौदे में था। आपने सौदा किया क्यों नहीं? सात वर्ष तक आप चर्चा ही करते रहे और वायुसेना के सामने आपात स्थिति आ गई। ध्यान रखिए, राफेल के साथ आपात खरीद के तहत सौदा हुआ है।  ट्रैपियर ने इसके बारे भी स्पष्टीकरण दिया है। उनके अनुसर यदि पूर्व की 126 विमान सौदा होता तो उन्हें एचएएल और रिलायंस के साथ काम करने में भी कोई परेशानी नहीं होती। किंतु 126 यानों का सौदा सहजता से नहीं हुआ और भारत सरकार को फ्रांस से तुरंत 36 यानों का सौदा करना पड़ा, इसलिए हमने रिलांयस के साथ काम जारी रखने का फैसला किया। इसका अर्थ है कि उस समय के सौदे की बातचीत मे भी रिलायंस था। वैसे कांग्रेस या विरोधी जो कहें एचएएल ने भी कुछ दिन पहले कहा था कि वे इस ऑफसेट का हिस्सा होने में रूचि नहीं रखते हैं। एचएएल के प्रमुख ने पुनः यही कहा है। राहुल कहते हैं कि रिलायंस को कोई अनुभव नहीं है,  ट्रैपियर का कहना है कि हम लोगों ने रिलायंस के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया क्योंकि उनके पास कई बड़े इंजिनियरिंग प्रॉजेक्ट को पूरा करने का अनुभव है।

अब आइए कीमत पर। उच्चतम न्यायालय के पास पूरा विवरण है। किंतु ट्रैपियर कह रहे हैं कि हमें पहले की तुलना मंे 9 प्रतिशत सस्ता बेचना पड़ा है। उनके कथन हैं- जब आप 18 फ्लाइवे की कीमत से तुलना करते हैं तो 36 का दाम भी वही है। 36, 18 का दोगुना है। इसलिए यह रकम भी दोगुनी होनी चाहिए थी। चूंकि यह जीटूजी यानी दो सरकारों के बीच का समझौता हैै, इसलिए कीमत पर मोल-भाव हुआ। मुझे इसकी कीमत 9 प्रतिशत कम करनी पड़ी।’ इस दावे की भी जांच हो जाएगी। कितु रक्षा विशेषज्ञ भी यही मानते हैं कि वाकई पूर्व की तुलना में सौदा सस्ता है। इन सारे तथ्यों को नकारकर हम राहुल या विरोधियों की बातें मान लें यह कैसे संभव है?

वैसे फ्रांस की वेबसाइट मीडिया मार्ट ने दावा किया था कि उनके पास दस्सॉल्ट के पूर्व मैनेजर का कंपनी के प्रबंधन के बीच दिया गया वक्तव्य है जिससे साबित होता है कि रिलायंए डिफेंस को साझेदार के रुप में स्वीकारने के अलावा कंपनी के पास कोई विकल्प ही नहीं था। इसने कहा कि  रिलायंस के साथ साझेदारी बाध्यकारी था। उसके बाद कितना हंगामा मचा यह हमारे सामने है। इसके पूर्व इसी वेबसाइट ने पूर्व राष्ट्रपति फ्रांसुआ ओलांद के एक वक्तव्य को इसी तरह प्रकाशित किया था जिसमें वे रिलायंस डिफेंस का नाम भारत की ओर से देने की बात कर रहे थे। हालांकि उसके बाद एएफपी ने ओलांद से बातचीत की तो उन्होंने कहा कि इसके बारे में दस्सॉल्ट ही बता सकता है। आज भी ओलांद के पहले बयान को ही राहुल गांधी उद्धृत करते हुए कहते हैं कि फ्रांस के पूर्व राष्टृरपति ने कहा कि भारत का प्रधानमंत्री चोर है। उस बार भी दस्सॉल्ट ने बयान जारी कर इसका खंडन किया था। मीडिया  पार्ट के आरोप के बाद एरिक ट्रेप्पियर ने विस्तृत बयान दिया जिसे प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी एएफपी ने जारी किया। उसमें भी उन्होंने यही कहा कि रिलायंएस और दसाल्ट एविएशन का संयुक्त उपक्रम राफेल लड़ाकू विमान सौदे के तहत लगभग दस फीसद ऑफसेट निवेश(बराबर रकम) का है। 30 साझेदारों में उन्होंने बीटीएसएल, डेफ्सिज, काइनेटिक, महिंद्रा, मैनी, सैम्टैल, लार्सन एंड टुब्रो, गोदरेज, टाटा जैसी कंपनियों का नाम लिया था। दरअसल, दस्सॉल्ट कंपनी के कर्मचारी संगठन और दूसरे ऐसे संगठनों ने आरोप लगाया है कि एक सौदे के लिए फ्रांस के हजारों रोजगार और विदेश व्यापार के अवसर छीने गए हैं। जो उत्पादन यहां होना चाहिए उसे कानून को ताक पर रखकर भारत स्थानांतरित किया जा रहा है। हमारे यहां इसे राफेल सौदे में सरकार पर लगाए जा रहे आरोपों की पुष्टि के रुप में लिया गया। उस बयान में ट्रैपियर को कहना पड़ा कि इस प्रक्रिया में फ्रंासीसी नियमों का भी पूरा पालन हुआ है। उस बयान में उन्होंने स्पष्टीकरण दिया था कि भारतीय नियमों (रक्षा खरीद प्रक्रिया) के अनुपालन के लिए उसे 50 प्रतिशत का ऑफसेट अनुबंध करना था। यानी हम यह नहीं करते तो सौदा ही नहीं होता। अपने देश को उन्होंने समझायाकि दस्सॉल्ट ने इसके लिए एक संयुक्त उद्यम के गठन का फैसला किया और स्वतंत्र रूप से इसके लिए रिलायंस का चुनाव किया। 10 फरवरी 2017 को संयुक्त उद्यम दस्सॉल्ट रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड का गठन किया गया। 2012 में भी कंपनी ने ही रिलायंस को साझेदार के रुप में चुना था। जिस कागजात की बात मीडिया मार्ट ने की वह दरअसल,दस्सॉल्ट द्वारा अपने कर्मचारी संघ की चिंता का दिया गया लिखित जवाब है। मीडिया मार्ट ने उसी का हवाला देकर कहा कि उनके पास इसके दस्तावेज मौजूद हैं कि रिलायंस को साझेदार बनाने के लिए मजबूर थी कंपनी। कंपनी के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर या सीओओ लोइक सेगलन के हस्ताक्षर से यह बयान था। साफ है कि इसे संदर्भों से अलग करके प्रचारित किया गया है। ऑफसेट नियमों के तहत 50 प्रतिशत निवेश के संदर्भ में कहा गया था कि हमारे पास संयुक्त उद्यम के अलावा कोई विकल्प नहीं था। उसे लेकर हमारे देश में हंगामा खड़ा कर दिया गया।  राहुल गांधी कहने लगे अब तो राफेल के सीनियर एग्जिक्युटिव रहे एक शख्स ने भी बोल दिया है कि हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री ने अनिल अंबानी को 30,000 करोड़ रुपये की कम्पेंसेशन यानी क्षतिपूर्ति दी है। दरअसल, उस कागजात में अंग्रेजी का कम्पेंसेशन शब्द है। उसी को स्पष्ट करते हुए एरिक ट्रेप्पियर ने कहा कि भारत के ऑफसेट को हम फ्रांसीसी में सामान्य तौर पर कम्पेंसेशन के रुप में अनुदित करते हैं। यह तो सोचने वाली बात है कि कोई कंपनी अपने सौदे का आधा हिस्सा किसी भी कंपनी को कम्पेंसेशन के रुप में कैसे दे देगी? किंतु हमारे यहां राजनीति तथ्य, तर्क और नैतिकता से अलग हो गया है। ट्रेप्पियर ने स्पष्ट किया कि उनकी कंपनी भारत में लंबे समय की साझेदारी के लक्ष्य से काम कर रही है। इसलिए हमने भारतीय प्रबंधकों तथा अन्य कर्मियांें को यहां प्रशिक्षण दिया। उन कंपनियों मेें सीइओ तो उनका होगा लेकिन सीओओ हमारा। इस तरह उन उत्पाद कंपनियों का तकनीकी तथा औद्योगिक नियंत्रण दस्सॉल्ट का होगा। ये सारी बातें फ्रांस के लोगों और विशेषकर कर्मचारी संगठन को समझाने के लिए कहा गया था। कोई भी कंपनी अपना निवेश लाभ के लिए ही करती है और ऐसा भी नहीं होता कि कुछ समय तक आपने उत्पादन किया और फिर वापस हो गए। कोई कारखाना एक बार लग गया तो फिर जब तक मूल कंपनी संकटग्रस्त न हो जाए मांग के अनुरुप उत्पादन जारी रहता है। इसलिए दस्सॉल्ट जितने संयुक्त उद्यम यहां लगाएगा वह भारतीय विनिर्माण क्षेत्र को मजबूती देनेवाला होगी। मेक इन इंडिया का लक्ष्य यही तो है। चीन में विदेशी कंपनियां आज भी व्यापक पैमाने पर उत्पादन कर रही है। इस तरह यदि अनावश्यक विरोध होगा तो हम चीन जैसे देश से प्रतिद्वंद्विता में नहीं टिक पाएंगे।

वैसे इस संबंध में पिछले महीने ही वायुसेना प्रमुख बीएस धनोआ का भी विस्तृत बयान आया। उन्होंने इसे एक बेहतर विमान सौदा करार दिया। उन्होंने कहा कि सरकार ने 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीद कर बड़ा फैसला लिया है। धनोआ ने कहा कि हमारे पास तीन विकल्प थे। पहले कि हम अभी कुछ और इंतजार करते, राफेल लड़ाकू विमान को वापस करते या फिर आपातकालीन खरीद करते। और हमने आपातकालीन खरीददारी की। दोनों ही राफेल और एस-400 वायुसेना की मारक क्षमता को धार देने के लिए एक बेहतर सौदा है। वायुसेना प्रमुख ने कहा कि पहले से एचएएल के साथ हुए करार में डिलिवरी को लेकर काफी देरी हो रही है। सुखोई-30 की डिलिवरी तीन साल की देरी, जगुआर की डिलिवरी में 6 साल देरी, लाइट कम्बैट एयरक्राफ्ट की डिलिवरी में 5 साल की देरी और मिराज 2000 अपग्रेड की डिलिवरी में 2 साल की देरी है। यह सौदा अच्छा पैकेज है और विमान उपमहाद्वीप के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा। उन्होंने यह भी कह दिया कि दसॉल्ट एविएशन ने ऑफसेट साझेदार को चुना और सरकार तथा भारतीय वायुसेना की इसमें कोई भूमिका नहीं थी। हमें अच्छा पैकेज मिला, हमें राफेल सौदे में कई फायदे मिले। राफेल डील हमारे लिए बूस्टर के समान है। धनोआ से पूछा गया कि क्या भारतीय वायुसेना को इस बात की सूचना दी गई थी कि राफेल सौदे में खरीदे जाने वाले विमानों की संख्या 126 से घटाकर 36 की जा रही है। धनोआ ने कहा कि उचित स्तर पर भारतीय वायुसेना से परामर्श किया गया था। सरकारों के बीच हुए सौदे के रूप में दो स्क्वाड्रन खरीदने का फैसला किया गया, ताकि आपातकालीन आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके।

क्या वायुसेना प्रमुख को भी हम झूठा करार दे देंगे? वे तो सौदे से लेकर ऑफसेट तक पर खुलकर बोल रहे हैं। कम से कम उनकी बात तो मान ली जाए। इतना स्पष्टीकरण आने के बावजूद इस तरह के हंगामे और न्यायालय में याचिकाओं को देखकर संदेह होता है कि कहीं विवाद पैदा करने के पीछे कुछ निहित स्वार्थी तत्व तो नहीं है। हो सकता है रक्षा सौदों के बिचौलिए छद्म वेश में जानबूझकर गलतफहमियां पैदा कर रहे हों। यह भी संभव है कि विमान बनाने वाली दूसरी कंपनियों की आपसी लड़ाई का शिकार हमारा देश हो रहा हो। या जो देश हमें रक्षा क्षेत्र में कमजोर बनाए रखना चाहते हैं वो इसके पीछे हों। मीडिया मार्ट जिस तरह तथ्य की गलत व्याख्या कर रही है उससे कई प्रकार के संदेह पैदा होते हैं। कौन उसे इस तरह की सुचनायें दे रहा है? वह अकेले राफेल सौदे को इतना संदेहास्पद क्यों बना रहा है? अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा और प्रशांत भूषण की न्यायालय तक जाने या उसके पूर्व सीबीआई के पास मामला पहुंचाने की भूमिका समझ में आती है। दो नेताओं का नरेन्द्र मोदी से अपनी खुन्नस है तो प्रशांत भूषण को इससे पुनः तथाकथित भ्रष्टाचार के नाम पर झंडाबरदार बनने का मौका मिल गया है। यूपीए के शासनकाल में अरविन्द केजरीवाल के साथ वे यही कर रहे थे। उसका परिणाम देश ने देख लिया। यह अत्यंत ही खतरनाक स्थिति है। चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियांें के बीच हमारी वायुसेना 33 वर्षों से उन्नत युद्धक विमानों के लिए तरस रही है और जब कोई सौदा सरकार ने साहस करके किया तो उसे इस तरह प्रश्नों के आग में झुलसा देने का आत्मघाती उपक्रम हो रहा है। इस तरह का उदाहरण दूसरे देश में शायद ही कहीं मिलेगा। किंतु देश के लोगों को विरोधियों के आरोपों से परे जो सच हमने रखा है उसके अनुसार ही राफेल सौदे को देखना चाहिए। यह देश के लिए अपरिहार्य अपनी आवश्यकता के अनुसार किया गया अनुकूल सौदा है। यह दो सरकारों के बीच का सौदा है इसलिए इसमें दलाली की कोई संभावना हो ही नहीं सकती। दलाली की संभावना वहां  होती है जहां कंपनी के साथ सौदा होता है और उसे कराने वाला बीच का कोई एजेंट हो।

 

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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