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ये विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ( RSS ) को समय के परिप्रेक्ष्य ज्यादा प्रासंगिक बनाएंगे – www.theaajkal.com

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अधेश कुमार

हमारे देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक ऐसा संगठन या संगठन परिवार है जिसके बारे में शायद सबसे ज्यादा लिखा और बयान दिया गया है। यह आगे बंद हो जाएगा इसकी भी संभावना नहीं है। हालांकि संघ ने जितनी व्यापक तैयारी से तीन दिन का राष्ट््रीय समागम आयोजित कर अपने से जुड़े जितने विषय है, जिन-जिन मुद्दों पर आलोचना होती है सब पर विस्तार से अपनी बात रखी, देश के समाने उपस्थित मुद्दों पर भी संघ का मत रखा और अगर कुछ कमी रह गई तो उसे प्रश्नांे के द्वारा पूरा किया उसके बाद दुराग्रहरहित व्यक्तियों का मन साफ हो जाना चाहिए। यह भारत में किसी संगठन द्वारा अपनी विचारधारा और मत को इतने व्यापक पैमाने पर और विस्तार से रखने पहला कार्यक्रम था।

किसी संगठन या राजनीतिक दल ने आज तक ऐसा नहीं किया था। संघ ने अपने विरोधी राजनीतिक दलों और कुछ बुद्धिजीवियों को भी निमंत्रण दिया था। संघ द्वारा विरोधियों के साथ संवाद करने की एक लोकतांत्रिक पहल थी जिसे ठुकराना किसी दृष्टि से उचित नहीं था। संवाद लोकतंत्र का प्राणतत्व है। आपको उनकी बात सुनने और अपनी बात रखने, अपना सवाल पूछने में क्या समस्या थी? यह अत्यंत ही गैर लोकतांत्रिक आचरण था। आप देश के सबसे बड़े संगठन परिवार के मातृसंगठन को अछूत बनाकर कब तक रख सकते हैं? आप आतंकवादी संगठनो तक से बात करने को तैयार हैं, लेकिन संघ के साथ नहीं।


यह प्रश्न उठता है कि आखिर संघ को आज इसकी आवश्यकता महसूस क्यों हुई? जिस ढंग से संघ पर अनेक प्रकार के आरोप लगाए जाते है, उसके विचारों की मनमानी व्याख्या की जाती है, हर बात में राजनीतिक दल तथा बुद्धिजीवियों का एक वर्ग संघ को घसीटता है, उसके सारे कार्यो केवल सत्ता पाकर अपना विचार लादने के लक्ष्य के रुप में वर्णित किया जाता है, बहुत सारे लोग संघ या उसके दूसरे संगठनों के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं उनमें मन में भी भ्रांतियां पैदा हो जातीं हैं….तो इन सब पर एक बार समागम करके विस्तार से अपना पक्ष रख दिया जाए। साथ ही पिछले कुछ वर्षों में हिन्दुत्व के नाम पर जगह-जगह उच्छृंखल तत्व जिस तरह का व्यवहार कर रहे हैं, सोशल मीडिया पर हिन्दुत्व के नाम पर जैसी अनर्गल बातें की जा रहीं हैं….उनको भी संदेश देना जरुरी था कि संघ का हिन्दुत्व दर्शन क्या है और हमारा आचरण क्या होना चाहिए। संघ परिवार के भीतर भी ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो अपनी विचारधारा के बारे में भ्रमित रहते हैं।

संघ हमेशा देश में तलवार की धार पर खड़ा रहता है। किसी से एक भूल हुई या एक बयान ऐसा दिया जो अस्वीकार्य हो तो फिर पूरे देश में तूफान खड़ा हो जाता है। इसीलिए संघ ने मुख्यधारा की मीडिया के अलावा उसे सोशल मीडिया पर भी लाइव प्रसारित किया था ताकि देश विदेश में जहां भी लोग चाहें वे सुन सकते हैं।


इसके बाद यह प्रश्न उठता है कि मोहन भागवत द्वारा इतनी विस्तृत व्याख्या और स्पष्टीकरण के बाद क्या वाकई संघ का नया चेहरा आएगा या यह वही रहेगा? हालांकि संघ की दृष्टि से विचार करें तो यह प्रश्न प्रासंगिक नहीं है। कारण, मोहन भागवत ने ही संघ की स्थापना से बात आरंभ की और बताया कि कैसे इसके संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार पहले क्रांतिकारी आंदोलन में थे, फिर विदर्भ प्रांत के कांग्रेस के बड़े नेता बने, आजादी के आंदोलन में जेल गए और धीरे-धीरे उनको लगा कि इस देश को अगर फिर से इसके पुराने वैभव पर लाना है तो हिन्दू संगठन खड़ा करना होगा। उसके बाद संघ की स्थापना और उसकी कार्यप्रणाली के विकसित होने का पूरा इतिहास उन्होंने बता दिया। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि डॉ. हेडगेवार ने जो कुछ सूत्र रुप में दिया संघ उसी को आगे विस्तृत कर रहा है।

यहां ध्यान रखिए, 1942-43 तक संघ के प्रति ऐसा विद्वेष और नफरत का भाव नहीं था जो आज है। कांग्रेसी, क्रांतिकारी, आर्य समाजी, हिन्दूमहासभाई सब मिलते थे। सुभाषचन्द्र बोस ने भी हेडगेवार से जब वे अंतिम समय में बीमर थे, मुलाकात की।

संघ ने सीधीे किसी आंदोलन मंें भाग न लेकर सिर्फ देशभक्त, निर्भीक और संमर्पित स्वयंसेवकों के निर्माण का दायित्व अपने उपर लिया था। वह स्वयंसेवक किसी आंदोलन में भाग ले सकता था, किसी संगठन का सदस्य भी बन सकता था। यह स्थिति आज भी है। मैंने स्वयं कई विचारधाराओं के संगठनों के साथ काम किया है और सबको समझने की कोशिश की है। संघ को निकट से समझने का पूरा प्रयास किया है। निष्कर्ष यही है कि स्वयंसेवकों को अपने अनुसार काम करने की आजादी है। आज संघ के ज्यादातर अनुषांगिक संगठन स्वयंसेवकांें ने ही समय-समय पर खड़े किए। संघ ने उनको बाद में अपने परिवार का भाग स्वीकार किया। भागवत ने यहां तक कह दिया कि स्वयंसेवक चाहे तो किसी राजनीतिक दल का भी सदस्य बन सकता है।

किंतु यह मान लेना कि संघ वही पुरानी सोच पर ही टिका हुआ है उसने बदलाव नहीं किया है गलत होगा। पहले कु. सी. सुदर्शन तथा अब भागवत ने अपने नेतृत्व विचार और व्यवहार के स्तर पर संघ को काफी बदला है। विरोधी आज भी 1966 की बंच ऑफ थॉट या विचार नवनीत को गलत उद्धृत करके संघ को कठघरे में खड़ा करते है। 52 वर्ष में बहुत कुछ बदला है। भागवत की बातों से स्पष्ट है कि हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र की मूल अवधारणा पर तो कायम है, क्योंकि वही उनकी प्रेरणा के तत्व हैं, किंतु इसकी व्याख्या धीरे-धीरे पहले से ज्यादा स्पष्ट और व्यावहारिक हुई है। किसी भी संगठन का क्रमिक विकास होता है। स्वामी दयानंद ने जो आर्य समाज स्थापित किया वह आज उस रुप में नहीं है। स्वामी विवेकानंद का रामकृष्ण मिशन काफी बदल चुका है। हालांकि संघ और इन दोनों संगठनों में अंतर यह है कि ये आज सिमटते हुए संप्रदाय जैसे रह गए हैं, जबकि यह न संप्रदाय बना न सिमटा, इसका सतत विस्तार हुआ है। यह बताता है कि देश, काल, परिस्थिति के अनुसार मूल हिन्दुत्व पर टिके हुए ही उसकी व्याख्या को धीरे-धीरे ज्यादा स्पष्ट किया है। अन्य अनेक तात्कालिक और दूरगामी मामलों पर अपनी सोच नए सिरे से बनाया है। संघ की सबसे ज्यादा आलोचना हिन्दुत्व को लेकर ही होती है। हिन्दुत्व को लेकर भ्रांति पश्चिमी सोच से पढ़े लिखे तथा राजनीति मंे मुस्लिम मतों के लालची ज्यादा पैदा करते हैं। हिन्दुत्व कोई मजहब, कोई पूजा की पद्धति नहीं है। यह तो समुद्र है जिसमें अनेक पंथ, संप्रदाय, विचार, जिनमें परस्पर विरोधी विचार भी शामिल हैं…..की छोटी -बड़ी नदियां आकर मिलती है। यह जीवन दर्शन है जो विविधाताओं से परिपूर्ण है। इसकी संकीर्ण व्याख्या करने वाले इसे समझते ही नहीं। भागवत ने ठीक ही कहा कि हिन्दुत्व ऐसा नहीं है जिसमंें दूसरे मजहब न समा सकें। यदि मुसलमान इसमें नहीं आ सकते तो यह हिन्दुत्व होगा ही नहीं। यह उन लोगों के लिए संदेश है जो हिन्दुत्व के नाम विकृत तरीके की सोच और व्यवहार के शिकार हैं।

हिन्दुत्व पर आधुनिक युग में स्वामी विवेकानंद, दयानदं, महर्षि अरविन्द्र, महात्मा गांधी, मदनमोहन मालवीय आदि ने काफी विस्तार से विचार दिया है।

इसके पूर्व वेद, उपनिषद से लेकर पुराणों में विशद वर्णन है। संघ के साहित्य को पढ़ने, स्वयंसेवकों का आचरण देखने तथा मोहन भागवत के भाषण का निष्कर्ष यही है उसने इन सारे का अध्ययन कर उसे एक समुच्चय रुप दिया है। उसे देश, काल और परिस्थति के अनरुप बनाया है। भागवत ने कहा कि विविधता हिन्दू संस्कृति की शक्ति है, इसे कमजोरी के रुप में नहीं देखा जा सकता। उन्होेंने आज हिन्दुत्व के नाम पर हो रहे गलत व्यवहारों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि विश्व में हिंदुत्व की स्वीकार्यता बढ़ रही है। पर भारत में पिछले ढेड़ से दो हजार सालों में धर्म के नाम पर अधर्म बढ़ा, रूढ़ियां बढ़ीं इसलिए भारत में हिंदुत्व के नाम पर रोष होता है। धर्म के नाम बहुत अधर्म का काम हुआ है। इसलिए अपने व्यवहार को ठीक करके हिंदुत्व के सच्चे विचार पर चलना चाहिए। सबसे पहले हिन्दू को सच्चा और अच्छा हिन्दू बनना पड़ेगा। उनसे पूछा गया कि हिंदुत्व, हिंदुनेस और हिंदुइज्म क्या तीनों एक ही है?
क्या जनजातीय समाज भी हिंदू है? उन्हांेने उत्तर दिया–नहीं, इज्म यानी वाद एक बंद चीज मानी जाती है, उसमें विकास के लिए खुली राह नहीं होती है। जबकि हिंदुत्व एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है। महात्मा गांधी ने कहा कि सत्य की अनवरत खोज का नाम हिंदू है। इसीलिए हिंदुत्व में कोई इज्म नहीं है। हिंदुत्व अन्य मतावलंबियों के साथ तालमेल कर चल सकने वाली एकमात्र विचारधारा है। यह प्राकृतिक विविधता को लेकर चलती है। विविधता में भेद नहीं करती है। हिंदुत्व ही सबका आधार बन सकता है। जनजातीय समाज भी हिंदू है। हमारे अनुसार भारत में रहने वाले सभी हिंदू ही हैं। पहचान की दृष्टि से राष्ट्रीयता की दृष्टि से। भारत में रहने वाले सभी अपने हैं। यहां कोई पराया नहीं है।
मेरी दृष्टि में हिन्दुत्व की इससे बढ़िया व्याख्या नहीं हो सकती। कहा गया है- यस्तु सर्वाणि भूतानि, सर्वभूतेषु च आत्मनः। यानी सभी में एक ही तत्व है। सब मुझमे हैं और मैं सबमे हूं। इसमें किसी के प्रति भेदभाव की गुंजाइश कहां है। एक उदाहरण अथर्ववेद के ‘पृथिवी सुक्त’ का दिया जा सकता है। इसमें ऋषि से श्ष्यि प्रश्न करते हैं। ‘‘ऋषिवर! हमारी इस धरती के निवासियों का सृजनात्मक स्वरूप क्या हैं?’’ऋषि उत्तर देते हैं-
‘‘नाना जातिः नाना धर्माः नाना वर्णाः,नाना वर्चस यथोकसम्’’। अर्थात् हमारी इस धरती पर विविध जातियों, विविध धर्मों, विविध वर्णों और विविध भाषा-भाषियों का निवास है। शिष्य कौतुहल से भरकर फिर प्रश्न करते हैं-‘‘यदि हमारी इस भूमि के निवासियों में इतनी विविधता है,तब यहां एकता कैसे संभव होगी?’’ऋषि उत्तर देते हैं-‘‘ यदि इस एक सिद्धान्त पर लोग आचरण करें कि ‘ माताः भूमिः पुत्रोअहम् पृथ्व्यिा’ अर्थात् यह भूमि माता-पिता की, इस पृथिवी की हम संतान हैं, तो सहजभाव से सब परस्पर भाई-भाई बन जाते हैं और तब सरलता से ‘विविधता में एकता’ हो सकती है।’’शिष्य फिर पूछते हैं-‘‘ क्या एकता के लिए इतना यथेष्ट है?’’ऋषि उत्तर देते हैं-‘‘ नहीं, उन्हें एक बात और करनी होगी, और वह यह कि -‘वाचः मधु’- अर्थात् जब परस्पर बात करें, वाणी में मिठास हो, कटुता या हिंसा न हो।’’ इसके दो श्लोक यहां उद्धृत करना आवश्यक है। ये पुरशे ब्रह्मे विदुः परमेश्ठिम्।(अथर्व 10,7,17)। ‘तस्माद् वे विद्वान पुुरशमिद’ ब्रह्मेति मन्यते।(अथर्व 11,8,32)

इन मंत्रों का भावार्थ है कि मानवता जो है वह विभिन्नता से भरे हुए व्यापक विश्व का सांस्कृतिक रूप है। उसे ठीक-ठाक जानने का अर्थ है- ब्रह्म के सर्वोत्कृष्ट स्वरूप को जानना।

मोहन भागवत ने हिन्दुत्व के इसी व्यापक स्वरुप को संघ का सिद्धांत बताया है। इसी को विस्तारित करते हुए अन्य बातें स्पष्ट की कि हिन्दू राष्ट्र का यह अर्थ नहीं कि हम संविधान नहीं मानते और जबरन परिवर्तन कर अन्य मजहबों के अधिकार छीन लेंगे। यह हिन्दुत्व नहीं हो सकता और नहीं हो सकता तो संघ का विचार नहीं हो सकता। दूसरे, इसे हम हिन्दू राष्ट्र मानते हैं,बनाने की आवश्यकता ही नही। हिन्दू का अर्थ व्यापक है जिसकी व्याख्या उपर की गई। उन्होंने गोरक्षा से लेकर जनसंख्या नीति, भाषा, शिक्षा नीति, जातिभेद और छुआछूत, अंतर्जातीय एवं अंतधर्मीय विवाह, महिलाओं के सशक्तीकरण, यहां तक की समलैंगिकता पर भी विचार प्रकट किए और सबमें बिल्कुल एक प्रगतिशील और उदार विचार। गोरक्षा के नाम पर हिंसा की उन्हांेंने तीखी आलोचना की। किसी भी विषय पर हिंसा उचित नहीं है। पर गाय का महत्व कुछ दूसरा भी है। संविधान के नीति निर्देशक तत्व में भी यह शामिल है। लेकिन उसके साथ ही यह भी जरूरी है गोरक्षा करने वाले गाय को घर पर रखें, अगर उसे खुला छोड़ेंगे तो फिर आस्था पर सवाल उठेगा। इसलिए गो संवर्धन पर विचार होना चाहिए।और मैं कह सकता हूं कि अच्छी गौशाला चलाने वाले कई मुसलमान भी हैं। देश की अर्थव्यवस्था से भी जुड़ी है। हमें तो जागरुकता लानी होगी। जो उपद्रवी तत्व से उसे इससे नहीं जोड़ना चाहिए। गाय के नाम पर किसी की हत्या गलत है। कानून हाथ में लेने वालों पर हो कार्रवाई होनी चाहिए।

भाषा के बारे में उन्होंने कहा कि अंग्रेजी का प्रभुत्व तो हमारे घर में है। जो भारतीय भाषाओं में बोल सकते हैं, मिलते हैं, तो अंग्रेजी में बात करते हैं। हम अपनी मातृभाषाओं को सम्मान देना शुरू करें। भाषाओं का रहना मनुष्य जाति के विकास के लिए अनिवार्य बात है। अपनी भाषा का पूरा ध्यान रखो। किसी भाषा से शत्रुता करने की जरूरत नहीं है। अंग्रेजी का हौवा जो हमारे मन में है उसको निकालना चाहिए। फ्रांस, इजराइल, रूस, चीन, जापान सब अपनी-अपनी भाषाओं में काम करते हैं। उन्होंने प्रयासपूर्वक यह किया है। हमें भी इसका प्रयास करने पड़ेंगे। सबसे समृद्ध भाषा हमारे पास है। हम कर सकते हैं। हम किसी भाषा से शत्रुता नहीं करते हैं, लेकिन देश का काम अपनी भाषा में हो इसकी आवश्यता है। फिर देश में कई भाषाओं का सवाल आता है।

किसी एक भारतीय भाषा को हम सीखें इसका मानस हमको बनाना पड़ेगा। हिंदी की बात पुराने समय से चली है अधिक लोग इसे बोलते हैं इसीलिए चली है। लेकिन इसका मन बनाना पड़ेगा, कानून बनाने से काम नहीं चलेगा। थोपने से नहीं चलेगा।

आखिर एक भाषा की बात हम क्यों कर रहे हैं। इसीलिए कि हमको देश को जोड़ना है। एक भाषा बना देने से यदि देश में विरोध खड़ा होता है, कटुता बढ़ती है, तो हमको सोचना पड़ेगा। भारत की सभी भाषाएं हमारी अपनी है। काम के कारण दूसरे प्रांतों के लोग हिंदी सीख रहे हैं। लेकिन हिंदी प्रांत वालों का हिंदी में काम चल जाता है इसीलिए दूसरी भाषा को नहीं सीख रहे हैं। उन्हें सीखना चाहिए। संस्कृत के विद्यालय घट रहे हैं और उसे कोई महत्व कौन नहीं देता है। हमारा आग्रह रहे कि हमारी परंपरा का सारा साहित्य संस्कृत में है और बच्चे उसे पढ़ें। तो बच्चे सीखेंगे और उन्हें सिखाने वाले विद्यालय भी खुलेंगे। इस दिशा में लगे है हमारे स्वयंसेवक। इसी तरह उन्होंने जाति व्यवस्था को जाति अव्यवस्था कहा, अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहित करने की बात की। आरक्षण को अभी आवश्यक बताया लेकिन कहा कि समस्या आरक्षण की राजनीति है।

इस प्रकार देखें तो संघ ने अपने को पूरी तरह खोलकर देश के सामने रख दिया है। दुराग्रही, कुंठाग्रस्त, मानसिक ग्रंथि के शिकार बुद्धिजीवी, सक्रियतावादी, विधिवेत्ता तथा राजनीतिक दल कुछ भी कहें संघ ने व्यापक पैमाने पर संदेश दिया है और चूंकि यह सबके समझने लायक है, सकारात्मक है इसलिए इसका मनोवैज्ञानिक असर होगा। नए समर्थक पैदा होंगे। हां, इससे यह भी साफ हो गया कि हिन्दुत्व के नाम पर दूसरे मजहब से नफरत करने वाले, उन पर वैचारिक हमला करने वाले निराश और क्षुब्ध होंगे। किंतु काम करने वालों को बिल्कुल स्पष्ट दिशा मिल गई है कि संघ क्या है, क्या चाहता है और कैसे काम करना चाहता है। यह समय की मांग थी और योजनापूर्वक व व्यवस्थित तरीके से बात रखकर भागवत ने नए दौर की शुरुआत की है।

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