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याद करिए सुरक्षा परिषद की बैठक को

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भारत की कूटनीति से चीन पड़ा अकेला, पाकिस्तान ने मुंह की खाई

अवधेश कुमार

 

भारत की शांत कूटनीति चीन-पाक चाल को विफल करने में सक्रिय थी। चीन की एक न चली। भारत वहां अपनी बात पहुंचाने में सफल रहा कि जम्मू-कश्मीर में किया गया संवैधानिक बदलाव भारत का आंतरिक मामला है और इसका अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कोई सरोकार नहीं है। पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन वहां आतंकवाद फैलाते हैं। भारत की छवि विश्व में एक जिम्मेवार और संयत राष्ट्र की है। परिषद के ज्यादातर सदस्य देशों से हमारे गहरे संबंध हैं तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कई से व्यक्तिगत रिश्ते भी। इन सबका असर हुआ और चीन ने भले वहां मानवाधिकारों के हनन की आवाज उठाई, अन्य देशों ने इसे स्वीकार नहीं किया। 

 

 

पाकिस्तान कह रहा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जम्मू-कश्मीर मसले पर चर्चा उस्की कूटनीतिक विजय है वस्तुतः यह खबर जैसे ही आई कि सुरक्षा परिषद जम्मू कश्मीर पर अनौपचारिक चर्चा के लिए तैयार हो गया पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने अपनी कूटनीति के लिए इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बता दिया। उनका कहना था कि सुरक्षा परिषद कश्मीर मुद्दे पर 40 साल बाद चर्चा करने को राजी हुआ है। इसके पहले कश्मीर पर अनौपचारिक चर्चा 1971 में हई थी। इसलिए बैठक के बाद उसके द्वारा बार-बार अपनी राजनय की जीत बताना अस्वाभाविक नहीं है। किोंतु प्रश्न है कि इससे हुआ क्या? क्या जम्मू कश्मीर को लेकर भारत की स्थिति में कोई बदलाव आ गया? क्या किसी देश ने बैठक के बाद कहा कि भारत ने जम्मू कश्मीर में बदलाव करके गलत किया है और उसे अपना कदम वापस लेना चाहिए? क्या सुरक्षा परिषद ने कोई बयान भारत के खिलाफ दिया? भारत ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने तथा उसे केन्द्रशासित प्रदेश में बदलने का जो निर्णय किया वह यथावत है और रहेगा। पाकिस्तान की समस्या है कि प्रधानमंत्री इमरान खान को अपने देश में ही जम्मू कश्मीर को लेकर भारी दबाव का सामना करना पड़ रहा है। इस घटना को अपने अनुकूल प्रचारित करने से उनको आंतरिक मोर्चे पर थोड़ी राहत मिली है अन्यथा व्यवहार में तो पाकिस्तान के मात खानी पड़ी है।

बैठक को हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने महत्व नहीं दिया। इसका एक मुख्य कारण तो यही है कि हाल के वर्षों में इस तरह की अनौपचारिक चर्चा बार-बार होने लगी है। इसमें सुरक्षा परिषद के सदस्य बंद कमरे में बातचीत करते हैं और इनकी जानकारी बाहर नहीं आती है। न इसमें मीडिया को प्रवेश मिलता है और न रिकॉर्ड रखा जाता है। इसका मकसद सिर्फ मुद्दे पर सदस्यों को अनौपचारिक बात करने के लिए प्रोत्साहित करना होता है। तो भारत का राजनीतिक नेतृत्व इसे महत्व क्यों देता। वैसे भी सुरक्षा परिषद का एक स्थायी सदस्य रुस खुलकर भारत के साथ आ गया था।

 

पाकिस्तान ने सुरक्षा परिषद का आपातकालीन सत्र बुलाने की मांग की थी। चीन ने उसका पूरा साथ दिया। चीन सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है जिसकी मांग का असर तो होना है। किंतु सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष पोलैंड के जोना रॉनेका ने इसकी जगह बंद कमरे की अनौपचारिक मंत्रणा की स्वीकृति दी। दूसरे, पाकिस्तान ने अर्जी दी कि मामला उससे जुड़ा है इसलिए उसके प्रतिनिधि को बात रखने की इजाजत  दी जाए और चीन ने इसका खुलकर समर्थन किया। यह भी स्वीकार नहीं किया गया। इसके लिए उसे 15 सदस्य देशों में से नौ का समर्थन चाहिए था। चीन के अलावा कोई देश उसके साथ नहीं आया। तीसरे, चीन ने सलाह दी थी कि बैठक के बाद घटनाक्रम के बारे में अनौपचारिक घोषणा परिषद के अध्यक्ष जोएना रोनिका करें। चीन को इस मसले पर किसी दूसरे देश का समर्थन नहीं मिला। इसलिए पाकिस्तान के विदेश मंत्री का यह दावा हास्यापद है कि हमें कश्मीर मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण करने में सफलता मिल गई। वस्तुतः भारत की शांत कूटनीति चीन-पाक चाल को विफल करने में सक्रिय थी। चीन की एक न चली। भारत वहां अपनी बात पहुंचाने में सफल रहा कि जम्मू-कश्मीर में किया गया संवैधानिक बदलाव भारत का आंतरिक मामला है और इसका अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कोई सरोकार नहीं है। पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन वहां आतंकवाद फैलाते हैं जिसे देखते हुए वहां अभी सुरक्षा सख्ती है लेकिन धीरे-धीरे ढील दी जा रही है। भारत की छवि विश्व में एक जिम्मेवार और संयत राष्ट्र की है। परिषद के ज्यादातर सदस्य देशों से हमारे गहरे संबंध हैं तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कई से व्यक्तिगत रिश्ते भी। इन सबका असर हुआ और चीन ने भले वहां मानवाधिकारों के हनन की आवाज उठाई, अन्य देशों ने इसे स्वीकार नहीं किया। तो यह है यह पूरा परिणाम।

वैसे भारत की कूटनीति सक्रिय थी लेकिन बैठक को हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने महत्व नहीं दिया। इसका एक मुख्य कारण तो यही है कि हाल के वर्षों में इस तरह की अनौपचारिक चर्चा बार-बार होने लगी है। इसमें सुरक्षा परिषद के सदस्य बंद कमरे में बातचीत करते हैं और इनकी जानकारी बाहर नहीं आती है। न इसमें मीडिया को प्रवेश मिलता है और न रिकॉर्ड रखा जाता है। इसका मकसद सिर्फ मुद्दे पर सदस्यों को अनौपचारिक बात करने के लिए प्रोत्साहित करना होता है। तो भारत का राजनीतिक नेतृत्व इसे महत्व क्यों देता। वैसे भी सुरक्षा परिषद का एक स्थायी सदस्य रुस खुलकर भारत के साथ आ गया था। उसने बयान दिया था कि सारे पहलुओं का अध्ययन करने के बाद हमारा मत है कि भारत ने अपनी संविधानिक प्रक्रियाओं के तहत यह फैसला किया है जो उसका आंतरिक मामला है। इस पर द्विपक्षीय बातचीत तो होगी लेकिन संयुक्त राष्ट्रसंघ के हस्तक्षेप की इसमें कोई गुंजाइश नहीं है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने रुस के विदेश मंत्री से 14 अगस्त को संपर्क किया था। इस पर आधिकारिक बयान में रूस ने कहा कि पाकिस्तान और भारत के बीच मतभेद सुलझाने का कोई विकल्प नहीं है, सिवाय द्विपक्षीय बातचीत के। संयुक्त राष्ट्रसंघ में रूस के प्रतिनिधियों की यह अटल सोच है। फ्रांस ने ऐसी घोषणा तो नहीं की लेकिन यह साफ हो गया था कि वह भारत का साथ देगा। यूरोपीय संघ के दूसरे सदस्यों ने भी भारत के खिलाफ नहीं जाने का संकेत दिया। संयुक्त राष्ट्र भी दिलचस्पी नहीं दिखा रहा था। स्वयं इमरान खान का डोनाल्ड ट्रंप से बातचीत करने के बावजूद अमेरिका रुचि लेने को तैयार नहीं हुआ। सच कहा जाए तो चीन इस मामले में अकेला पड़ गया था। अंततः पाकिस्तान की इज्जत बचाने के लिए वह अनौपचारिक बैठक पर राजी हो गया। ट्रंप प्रशासन अफगानिस्तान से वापस निकलने के लिए पाकिस्तान का साथ चाहता है क्योंकि तालिबान के साथ वार्ता का वही मध्यस्थ है। पाकिस्तान ने इसी का ध्यान रखते हुए बयान दिया कि भारत के साथ तनाव बढ़ने पर उसे अपनी फौज अफगानिस्तान से हटाकर भारतीय सीमा पर तैनात करनी पड़ेगी। किंतु ब्लैकमेलिंग की उसकी परंपरागत रणनीति काम नहीं आई।

तो कुल मिलाकर यह है इस बैठक की पृष्ठभूमि, चरित्र, सदस्य देशों का रुख एवं परिणति। हालांकि बैठक के बाद संयुक्त राष्ट्र में चीन के दूत जियांग जून ने भी मीडिया से बातचीत की और दावा किया कि सुरक्षा परिषद के सदस्यों ने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर श्गंभीर चिंता जताई। चिंता के आगे भी किसी ने कुछ कहा इसकी जानकारी वे न दे सके। यदि कोई सदस्य कुछ बोला होता तो चीन अवश्य इसे सामने रखता, क्योंकि बैठक का सूत्रधार वही था। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने मीडिया के साथ बातचीत में भारत का पक्ष रखा और साबित किया कि पाकिस्तान को किस तरह मुंह की खानी पड़ी है। हालांकि अकबरुद्दीन का स्वर कुछ मामलों में सफाई देने जैसा था। मसलन, जम्मू कश्मीर के हालात और सुरक्षा व्यवस्था को लेकरं। इसकी आवश्यकता नहीं थी। भारत ने जब ऐतिहासिक और साहसी फैसला किया है तो बयानों से भी यह संदेश निकलना चाहिए कि उसे सफल बनाने के लिए वह दृढ़ता और संकल्प के साथ लगा है। यह हमारा सुरक्षा आकलन होगा कि हमें कब स्थिति के सामान्य होने की घोषणा करनी है। अकबरुद्दीन ने कहा भी कि एक देश जेहाद का इस्तेमाल कर रहा है और हिंसा भड़काई जा रही है।

बैठक के बाद संयुक्त राष्ट्र में चीन के दूत जियांग जून ने भी मीडिया से बातचीत की और दावा किया कि सुरक्षा परिषद के सदस्यों ने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर श्गंभीर चिंता जताई। चिंता के आगे भी किसी ने कुछ कहा इसकी जानकारी वे न दे सके। यदि कोई सदस्य कुछ बोला होता तो चीन अवश्य इसे सामने रखता, क्योंकि बैठक का सूत्रधार वही था। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने मीडिया के साथ बातचीत में भारत का पक्ष रखा और साबित किया कि पाकिस्तान को किस तरह मुंह की खानी पड़ी है।

 

बहरहाल, इस घटनाक्रम का दूसरे नजरिए से भी विश्लेषण करना होगा। शाह महमूद कुरैशी चीन के पास मदद की गुहार लगाने गए थे। तब चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कहा था कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों तथा चार्टर के अनुसार इसका निदान हो। वस्तुतः भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर की प्रस्तावित दो दिवसीय यात्रा को देखते हुए उन्होंने ज्यादा बोलना उचित नहीं समझा। हालांकि भारत को इसकी शंका अवश्य रही होगी कि चीन कुछ करेगा। पाक अधिकृत कश्मीर के साथ उसका हित जुड़ा है। पाकिस्तान ने उसका एक हिस्सा उसे दिया हुआ है। वह चीन पाक आर्थिक गलियारा के तहत वहां भारी निवेश कर रहा है। लद्दाख की सीमा को वह विवादित मानता है। उसकी पूरी रणनीति सीमा विवाद बनाए रखने पर है। जयशंकर ने वांग यी के साथ मुलाकात में स्पष्ट किया था कि यह भारत का आंतरिक मामला है और इसका असर भारत की सीमाओं और चीन के साथ लगती वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर नहीं पड़ेगा।

चीन को भान है कि यह बदला हुआ भारत है जो यहीं नहीं रुकेगा। आगे पाक अधिकृत कश्मीर को भी पाने का कदम उठाएगा। इसलिए अभी से उसके विरुद्ध पाकिस्तान के साथ मिलकर घेरेबंदी करनी होगी। कहने का तात्पर्य यह कि चीन आगे भी भारत के सामने समस्यायें पेश करेगा। पाकिस्तान का तो लंबे समय के लिए एकमात्र एजेंडा यही हो गया है।  मानकर चलना चाहिए कि भारत सरकार इसके लिए कमर कस चुकी होगी। हालांकि अंतरराष्ट्रीयकरण से हमें न चिंतित होने की आवश्यकता है, न विचलित होने की। हमें इसके लिए भी तैयार रहना होगा कि पूरी दुनिया अगर खिलाफ हो जाए तब भी जम्मू कश्मीर को लेकर हमारा संकल्प वही रहेगा जो आज है।

 

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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