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मालदीव के चुनाव परिणाम के पीछे भारतीय रणनीति

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मालदीव के चुनाव परिणाम के पीछे भारतीय रणनीति

जो लोग पिछले करीब पांच सालों से पड़ोसी द्वीपीय देश मालदीव सरकार के भारत विरोधी कदमों को लेकर चिंतित थे उनको वहां के चुनाव परिणामों ने निश्चय ही आशान्वित किया है। चुनाव परिणाम ज्यादातर लोगों के लिए आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता का कारण बने हैं तो इसलिए कि राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन की पराजय की कल्पना इन्हें नहीं थी। लगातार भारत सरकार को आगाह किया जा रहा था कि अगर उसने हस्तक्षेप नहीं किया तो सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस समुद्री देश पर चीन छा जाएगा। यह आशंका निराधार नहीं थी। किंतु मालदिवियन डेमोक्रैटिक पार्टी (एमडीपी) के उम्मीदवार इब्राहिम मोहम्मद सोलिह की राष्टृरपति चुनाव में विजय ने मालदीव की स्थिति को सीधे 180 डिग्री पर लाकर खड़ा कर दिया है। सोलिह तो भारत समर्थक हैं हीं, उनको सहयोग करने वाले निर्वासित जीवन जी रहे पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद भी हमारे दोस्त हैं। विजय के बाद सोलिह को सबसे पहले बधाई देकर भारत ने जता दिया है कि उसकी कूटनीति उपर से जितनी निष्क्रिय दिख रही थी उतनी थी नहीं। ऐसा ही श्रीलंका के मामले में भी हुआ था।

वहां के पूर्व राष्ट्रपति महिन्द्रा राजपक्षे हालांकि एकदम से खुलकर तो भारत विरोध नहीं करते थे, किंतु उनकी नीतियों में ऐसा साफ दिखने लगा था। भारत को विश्वास में लेने की कोशिश की जगह उन्होंने हमारे दूसरे पड़ोसी देशों की ओर मुंह मोड़ा। जब आम चुनाव में उनकी पराजय हुई तो उनकी पार्टी ने भारत पर ही इसका आरोप मढ़ दिया था।
वास्तव में श्रीलंकाई चुनाव परिणामों के कुछ समय बाद ही यह साफ हो गया था कि भारत ने अत्यंत ही परिपक्वता दिखाते हुए सतर्कता के साथ वहां भूमिका निभाई थी। भारत सामान्यतः किसी देश की राजनीति में सीधे हस्तक्षेप नहीं करता, लेकिन कोई दूसरा देश वहां विरोध में सक्रिय हो और शासन प्रतिकूल नीतियां बनाने लगे तो जहां भी संभव है मान्य अंतर्राष्ट्रीय दायरों में भूमिका अपरिहार्य हो जाती है। भारत ने मालदीव में भी श्रींकाई रणनीति को दुहराया है। वैसे भी वहां के कुछ नेता अपनी मतांधता या अन्य ग्रंथियों के कारण भारत विरोध में जितना चले जाएं उनके साथ मालदीव की समूची आबादी नहीं हो सकती। भारत के प्रति वहां के एक बड़े वर्ग में लगाव आज भी बना हुआ है। यह वैसा ही जैसे बांग्लादेश मे। बांग्लादेश में आज भी ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है जो भारत को अपना मुक्तिदाता मानते हैं। इसलिए वहां के कट्टरपंथी संगठन, पार्टियां, नेता विरोध में जितना आग उगले वे पूरे देश को अपने साथ नहीं ला सकते। मालदीव के साथ भारत के सदियों पुराने धार्मिक, भाषाई, सांस्कृतिक और व्यावसायिक संबंध है। मालदीव में करीब 25 हजार भारतीय रह रहे हैं। मालदीव के लोगों के लिए शिक्षा, चिकित्सा और व्यापार के लिहाज से भारत एक पसंदीदा देश है। यामीन की भारत विरोधी रवैये के बावजूद मालदीव के नागरिकों द्वारा उच्च शिक्षा और इलाज के लिए लॉन्ग टर्म वीजा कीे मांग बढ़ती गई। भारत ने इन पर संबंधों का असर नहीं पड़ने दिया। ऐसे लोगों का भारत के प्रति लगाव की तुलना चीन और पाकिस्तान नहीं कर सकता था।
हालांकि मालदीव की स्थिति बिगड़ने पर मोहम्मद नशीद और गयूम दोनों ने भारत से सैनिक हस्तक्षेप की मांग कई बार की। कई दूसरे नेता भी ऐसा चाहते थे।

भारत ने 30 वर्ष पूर्व वहां सैनिक हस्तक्षेप किया भी था। मालदीव पर सबसे लंबे समय तक अपना एकाधिकारवादी शासन चलाने वाले मायूम अब्दुल गय्यूम के तख्ता पलट को भारत ने विफल कर उनको फिर से सत्ता सौंपी थी।


इस बार स्थिति थोड़ी भिन्न थी। अब्दुल्ला यामीन ने चीन के साथ विशेष व्यापार समझौता करके इतनी छूट दे दी कि वह वहां आच्छादित होने लगा था। चीन क्या करता यह स्पष्ट नहीं था, किंतु पिछले फरबरी में जब यह संभावना पैदा हुई कि भारत वहां 1988 की तरह सैनिक हस्तक्षेप कर सकता है तो चीनी युद्धपोतों की हिंद महासागर में गतिविधियां बढ़ गईं। चीन के 11 युद्धपोत पूर्वी हिंद महासागर पहुंच गए। चीन ने यह बयान भी दिया कि वहां के 4,00,000 लोगों में पूरे विवाद से निपटने की क्षमता है और किसी को उसमें दखल नहीं देना चाहिए। चीन का सीधा संदेश था कि मालदीव के मामले में भारत दखल देने की कोशिश न करे। वास्तव में यामिन ने चीन को भारत के उपर तरजीह देने के जितने कदम उठाए उसे वह गंवाना नहीं चाहता था। मालदीव के स्टेट इलेक्ट्रिसिटी कंपनी स्टेलको की ज्यादातर परियोजनाएं चीन की सहायता से चलने लगीं। यहां तक कि मालदीव के अधिकारियों ने पाकिस्तान के साथ स्टेल्को का करार कर दिया। यामिन की कृपा से चीन ने धीरे-धीरे वहां भारत का स्थानापन्न कर लिया। मालदीव को बाहरी मदद का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अकेले चीन से मिलने लगा। रोड एंड बेल्ट इनिशिएटिव के नाम पर मालदीव के कई द्वीन चीन के हाथ चले गए।

चीन की इतनी व्यापक उपस्थिति तथा उसके रवैये को देखते हुए भारत के लिए सधे तरीके से कदम उठाना आवश्यक था। अंदर ही अंदर भारत वहां के प्रमुख विपक्षी नेताओं से संपर्क में था और यामिन के गैर लोकतांत्रिक आचरण पर विश्व के प्रमुख देशों से भी संवाद कर रहा था। यामिन ने जिस तरह से वहां लोकतंत्र को कुचलने का क्रम जारी रखा उससे देश के अंदर एवं बाहर स्थिति उनके खिलाफ जाती रही। मलदीव उच्चतम न्यायालय ने पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद के खिलाफ मुकदमे पर रोक लगा दी थी और 9 विपक्षी सांसदों की बहाली का आदेश दिया तो यासिन ने संसद ही भंग कर दिया। अब्दुल गयूम और मुख्य न्यायाधीश अब्दुल्ला सईद को बिना निष्पक्ष न्यायिक कार्रवाई के जेल में डाला गया। उनके साथ नशीद की पार्टी के लोग भी जेल में डाले गए। यामिन की पूरी कोशिश थी कि विपक्षविहीन स्थिति मंें चुनाव कराकर अपनी विजय सुनिश्चित की जाए। चीन और पाकिस्तान को यामीन के इन गैर लोकतांत्रिक कदमों से कोई फर्क पड़ता नहीं था। भारत ने पहले आपातकाल लगाने का विरोध किया। आपातकाल बढ़ाने के फैसले पर भी एतराज जताया लेकिन भाषा काफी संयमित थी। वहां के विपक्षी नेता एवं उनके समर्थक भारत से मुखर विरोध की अपेक्षा कर रहे थे।

15 जून को विदेश मंत्रालय की तरफ से जारी बयान में न केवल मुख्य न्यायाधीश सहित राजनीतिक कैदियों को रिहा करने की मांग की गई बल्कि यह भी कहा गया कि मालदीव में जैसी स्थिति बन रही है वह अब्दुल्ला यामीन की सरकार की कानून के दायरे में सरकार चलाने की मंशा पर प्रश्न उठाती है। मौजूदा हालात को देखते हुए निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया को लेकर भी संशय है। भारत ने यह प्रचार जारी रखा कि मालदीव के वर्तमान शासन के तहत निष्पक्ष चुनाव नहीं हो सकता।

भारत के प्रयासों से अमेरिका और ब्रिटेन ने बयान जारी कर दिया कि अगर निष्पक्ष चुनाव नहीं हुए तो मालदीव पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। भारत की इस कूटनीति तथा विश्व के प्रमुख देशों के बयानों से मालदीव के विपक्षी नेताओं का मनोबल बढ़ा। उन सबने गठबंधन करके यामीन के खिलाफ संयुक्त उम्मीदवार के तौर पर सोलिह को उतारा और परिणाम सामने है।

भारत ने यामीन की छवि को कमजोर करने की रणनीति के तहत सुरक्षा परिषद की अस्थायी सीट चुनाव में मालदीव को हरवा दिया। हालांकि भारत ने मालदीव को मत देने का वायदा किया किंतु जाहिर है, यह बिना शर्त नहीं रहा होगा। जब यामीन में बदलाव नहीं आया तो भारत ने वहां ऐसी स्थिति बनाई ताकि ज्यादा से ज्यादा देश उसे मत न दें और मालदीव हार गया। इस परिणाम का भी मालदीव की जनता पर मनोवैज्ञानिक असर हुआ। बहरहाल, चुनाव परिणामों के बाद भारत ने अवश्य राहत की सांस ली है किंतु जो कुछ यामीन ने कर दिया है उसे पूर तरह पलटवाना होगा। सोलिह इसके लिए तैयार भी हैं। लंबे समय तक लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने वाले मोहम्मद नशीद की भी वापसी होगी। भारत को ऐसी स्थिति पैदा करनी होगी ताकि ये वहां ज्यादा शक्तिशाली बने। इसलिए आगे बढ़कर जितनी मदद संभव है करनी चाहिए। यामीन के शासन को सीख के तौर पर लेकर सतर्कता और दृढ़ता के साथ मालदीव के प्रति नीति बनानी होगी। मालदीव के लोगों का जुड़ाव हमारे लिए बड़ी शक्ति है।

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