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भ्रष्टाचार के खिलाफ कारगर साबित होंगे ये कानून

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भ्रष्टाचार के विरुद्ध कोई भी कारगर कदम उठाया जाए उसका स्वागत होना चाहिए। हमारे सामने दो प्रकार के भ्रष्टाचर चुनौतियां बनकर खड़ी हैं। सरकारी स्तर पर नीचे से उपर तक की रिश्वतखोरी तथा बैंकों से कर्ज लेकर विदेश भाग जाना। पहले स्तर के भ्रष्टाचार हमें सीध प्रभावित करते हैं इसलिए हमारे अंदर उसके खिलाफ गुस्सा पैदा होता है। कितु दूसरे स्तर का भ्रष्टाचार भी परोक्ष रुप में हमें प्रभावित कर रहा है। आखिर हमारा आपका धन ही तो बैंकों में होता है। अगर बैकों का धन डकारकर कोई भाग जाए तो उसकी भरपाई कहीं न कहीं से करनी होगी और वह धन भी हमारा आपका ही होगा। हाल में इन दोनों भ्रष्टाचारों के विरुद्ध कार्रवाई के लिए दो कानून निर्मित किए गए हैं। ये हैं, भ्रष्टाचार निरोधक कानून 2018 और भगोड़ा आर्थिक अपराधी कानून 2018।

इनको भ्रष्टाचार विरोधी कार्रवाई के लिए उठाए जा रहे समग्र कदमों के अंग के रुप में देखा जाना चाहिए। भ्रष्टाचार भारत को कैंसर की तरह ग्रस्त कर चुका है इससे कोई असहमत नहीं हो सकता। 1988 में बना भष्टाचार निरोधक अधिनियम आज के हालात में भ्रष्टाचार के बदले आयाम और इसके नए स्वरुपों में काफी हद तक अप्रासंगिक हो गया था। इसलिए इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई में आए अनुभवों के आलोक में आज के समय के अनुरुप बदला जाना अपरिहार्य हो गया था। इसी तरह बैंकों से कर्ज लेकर विदेश भाग जाने वालों के विरुद्ध अलग से कोई कानून नहीं था। जो अपराध संबंधी कानून हैं उनसे उपयुक्त कार्रवाई संभव नहीं थी। वास्तव में जिस तरह पिछले कुछ समय में बैंकों के साथ धोखाधड़ी कर करोड़ों डकारने वाले विदेश भाग गए हैं और उनसे बकाया वसूली में कठिनाई आ रही है उसे देखते हुए इसके लिए आवश्यक कानून एकदम जरुरी हो गया था। ये कानून अपने-अपने क्षेत्रों में कितने प्रभावी होंगे इनका आकलन करन जल्दबाजी होगी, लेकिन कार्रवाई करने वाली एजेंसियों के पास कानूनों के रुप में ऐसे अस्त्र मिल गए हैं जिनसे वार करने और मामले को तार्किक निष्पत्ति तक ले जाने कठिनाई नहीं होगी। इसके पहले अपराध की अलग-अलग धाराओं में कार्रवाई करनी होती थी।

हालांकि तीन दशक पुराने भ्रष्टाचार निरोधक कानून में संशोधन की कवायद 2013 से आरंभ हुई थी। इसे नए रूप में आने में पांच वर्ष लग गए। पहले बन गया होता तो इसके तहत कार्रवाई भी पहले आरंभ हो गई होती। लेकिन देर आयद दुरूस्त आयद। भगोड़ा विधेयक की अपरिहार्यता को देखते हुए पहले अध्यादेश के रूप में लागू कर दिया गया था। अब वह कानून के रूप में हमारे सामने हैं। ये दोनों कानून कितने कारगर हो सकते हैं इसे समझने के लिए इनके प्रावधानों पर सरसरी नजर डालनी होगी। आप देखेंगे कि अपराध के व्यापक चरित्र का इनमें ध्यान रखा गया है। भ्रष्टाचार निरोधक कानून के अस्तित्व में आने के समय से आए अनुभवों और कमियों को दूर करने की पूरी कोशिश इसमें नजर आती है। वास्तव में भ्रष्टाचर निरोधक कानून के प्रावधानों में रिश्वतखोरी से संबंधित सारे पहलू समाहित हैं। कानून जरूरतों के अनुसार पूरा सख्त है, लेकिन कोई ईमानदारी अधिकारी इसका शिकार न हो जाए इसके लिए प्रावधान किए गए हैं। इसमें रिश्वत लेने वाले के साथ-साथ देने वाले के लिए भी सजा का प्रावधान है। विधेयक में रिश्वत लेने के दोषियों पर जुर्माने के साथ तीन से लेकर 10 साल जेल की सजा का प्रावधान कर दिया गया है। हालांकि दूसरी बार रिश्वत लेने वालों को ही 10 साल की सजा मिलेगी।

पहली बार रिश्वत लेने वालों के लिए अधिकतम सात वर्ष की सजा ही व्यवस्था की गई है। रिश्वत देने वालों को भी छः महीने से सात साल तक की सजा का प्रावधान है।

पहली नजर में ऐसा लगता है कि रिश्वत देने वाले तो मजबूरी में देते हैं इसलिए उनके लिए कड़े प्रावधान उचित नहीं। बात ठीक है कि एक आदमी मजबूरी में रिश्वत देता है। इसमें पहली बार रिश्वत देते वाले को भी जिम्मेदार ठहराया गया है। किंतु ऐसे लोगों को अपने बचाव का मौका दिया गया है। वस्तुतः रिश्वत देने वाले को यह बताना होगा कि किस वजह से और किन परिस्थितियों में रिश्वत दी गयी। अगर यह साबित हो गया कि उनको रिश्वत देने के लिए मजबूर किया गया तो उन्हें मुक्त भी किया जा सकता है। इस प्रावधान का एक प्रमुख कारण भी है। हम न भूलें कि व्यावसायिक संस्थानें अपना काम निकालने के लिए रिश्वत को स्वाभाविक खर्च मानकर व्यवहार करतीं हैं। इसलिए यह प्रावधान जरुरी है। इसीलिए सरकारी कर्मचारी को रिश्वत लेने के लिए उकसाना अपराध बना दिया गया है और इसके लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। यह प्रावधान भी है कि अगर किसी व्यावसायिक संस्थान के कर्मचारी किसी सरकारी कर्मचारी को रिश्वत देने के मामले में संलिप्त पाए जाते हैं तो उसके वरिष्ठ अधिकारियों को भी जिम्मेदार ठहराया जाएगा। यह प्रावधान आज के समय में कितना जरूरी था यह समझना कठिन नहीं है। इस तरह इसे हर तरह के रिश्वत देने और लेने के मामले में इसे एक संतुलित कानून कह सकते हैं। इसका असर अवश्य होगा।

रिश्वत लेने वाले अधिकारी या कर्मचारी किसी तरह बच न पाएं इसके प्रावधान तो है ही, दोषी करार दिये गए कर्मचारियों की संपत्ति की कुर्की का ब्यौरा तथा प्रक्रियाओं में भी बदलाव किया गया है।

अब दोषी करार दिए जाने के साथ संबंधित संपत्तियां आसानी से कुर्क की जा सकेंगी। इससे बचने का कोई रास्ता नहीं है। किंतु आज भी ऐसे ईमानदार अधिकारी एवं कर्मचारी हैं जो रिश्वत नहीं लेते। उनको संरक्षण मिलना जरुरी है ताकि वो स्वयं भी भ्रष्टाचार के विरुद्ध निर्भीक होकर कदम उठाएं। ऐसे अधिकारियों को सुरक्षा प्रदान करने के भी पूरे रास्ते हैं। कानून के अनुसार लोकसेवकों पर भ्रष्टाचार का मामला चलाने से पहले लोकपाल और राज्यों के मामले में लोकायुक्तों से अनुमति लेनी होगी। सेवानिवृत्त लोकसेवकों को भी यह संरक्षण प्रदान किया गया है। लोकसेवक अपनी संपत्ति के घोषित ब्यौरे में भी संशोधन कर सकेंगे। यानी संपत्ति की घोषणा में कुछ छूट गया है तो उसका कारण बताते हुए आप संशोधित विवरण दे सकते हैं। इस तरह कानून एक ओर भ्रष्ट कर्मियों के खिलाफ पूरी तरह सख्त है तो ईमानदार के प्रति पूर्ण उदार भी। भ्रष्टाचार के मामलों मेें न्यायिक प्रक्रिया में विलंब हमारे यहां आम स्थिति रही है। न्यायिक प्रक्रिया की खामियों का लाभ उठाते हुए भ्रष्टाचारी लंबे समय तक जेल से बाहर रहने का रास्ता निकाल लेते हैं। इस कानून ने न्यायिक विलंब का रास्ता बंद करने की कोशिश की है। इसमें कहा गया है कि भ्रष्टाचार के मामले की सुनवाई अदालत में जहां तक संभव हो प्रतिदिन की जाए और मामले का निपटारा दो साल के अंदर कर दिया जाए।
अब आएं भगोड़ा आर्थिक अपराधी कानून पर। इस समय नीरव मोदी और मेहुल चौकसी का मामला हमारे सामने है। विजय माल्या पर तो लंबे समय से चर्चा हो रही है। किंतु बैंकों से कर्ज लेकर या भगाने वाले ये ही नहीं है।

2015 से अब तक वित्तीय अनियमितताओं के 28 आरोपी विदेश भाग चुके हैं। 48 देशों के साथ प्रत्यर्पण संधि होने के कारण कुछ का प्रत्यर्पण संभव है किंतु इसकी प्रक्रिया भी आसान नहीं है। ब्रिटेन के साथ तो हमारा प्रत्यर्पण संधि है लेकिन विजय माल्या को अभी तक नहीं लाया जा सका है।

वास्तव में 2014 से अब तक आर्थिक अपराध के मामलों में सिर्फ 4 का ही प्रत्यपर्ण हो पाया है। शेष के लिए संबंधित देशों से प्रत्यर्पण की अपील की जा चुकी है। हमारे सामने दो प्रकार की चुनौतियां हैं। एक, अपराध करके देश छोड़कर भागने वालों की संख्या बढ़ रही है जिनको रोकना जरुरी है। दूसरे, जो भाग गए उनके आने की प्रतीक्षा करें और इसकी कोई सीमा न हो तो फिर बैंकों का धन कैसे वापस आएगा? वर्तमान कानून इन दोनों का उत्तर है। नए कानून में ऐसे भगोड़ों की देश ही नहीं विदेश की संपत्त्तियों को भी जब्त करने के प्रावधान हैं। हां, किसी प्रकार की कार्रवाई के लिए आर्थिक अपराध करने वालों के खिलाफ न्यायालय से गिरफ्तारी वारंट जारी किया जाना चाहिए। यह कानून 100 करोड़ रुपए से ज्यादा बकाया वाले गबनकर्ताओं पर ही लागू होगा और यह ठीक भी है।

अब भगोड़े आर्थिक अपराधियों की संपत्तियां बेचकर कर्ज देने वालों की भरपाई की जा सकती है। डायरेक्टर या डिप्टी डायरेक्टर स्तर का अधिकारी किसी आरोपी को भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित कर सकेगा। इसके लिए विशेष अदालत में याचिका देनी होगी जिसमें उसके खिलाफ कार्रवाई योग्य सबूत होने चाहिएं।

किसी अपराधी को भगोड़ा घोषित करने के लिए याचिका में उसके पते-ठिकानों के साथ ही उसकी संपत्तियों का ब्यौरा भी शामिल होगा। जब्त किए जाने योग्य बेनामी संपत्तियों और विदेशी संपत्तियों की सूची देनी होगी। साथ ही इन संपत्तियों से जुड़े अन्य लोगों की जानकारी भी शामिल होगी। आवेदन मिलने के बाद विशेष न्यायालय आरोपी को 6 हफ्ते के अंदर पेश होने के लिए नोटिस जारी करेगा। अगर आरोपी तय जगह पर पेश हो जाता है तो कोर्ट भगोड़ा आर्थिक अपराध कानून के तहत कार्रवाई नहीं करेगा।
इस तरह दोनांें कानूनों की आवश्यकता एवं उपयोगिता स्पष्ट है। यह ठीक है कि भ्रष्टाचार हमारे यहां सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्न भी है। इसके विरुद्ध समाज में चेतना पैदा करने की आवश्यकता है। किंतु कानून के बिना इनका निवारण संभव नहीं है। इसलिए दोनों कानूनों का स्वागत है। हां, इसका क्रियान्वयन भी इसकी भावनाआंें के अनुरुप हों यह आवश्यक है।

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