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भाजपा राष्ट्रीय परिषद का दिल्ली अधिवेशन

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भाजपा ने साफ किया 2019 का एजेंडा
अवधेश कुमार

मोदी और शाह ने इसका ध्यान रखा कि मुद्दे और वैचारिकता दोनों को इस तरह परोसा जाए ताकि पार्टी के अंदर आत्मविश्वास एवं उत्साह पैदा हो।  पार्टी के सामने सबसे बड़ा प्रश्न विपक्षी पार्टियों के गठबंधन का सामने करने का है। मोदी ने तेलांगना में गठबंधन की पराजय, कर्नाटक के मुख्यमंत्री की बार-बार व्यक्त की जा रही पीड़ा तथा राजस्थान एवं मध्यप्रदेश में मुकदमे हटाने की बसपा की शर्त की याद दिलाते हुए कहा कि अभी से इनका अंतर्विरोध दिख रहा है। मोदी ने भाजपा के लिए यह नारा दे दिया कि वो मजबूत नहीं मजबूर सरकार चाहते हैं। ऐसा क्यों चाहते हैं इसके उत्तर में उन्होंने वंशवाद से लेकर भ्रष्टाचार, कुशासन आदि की बात कह दी। इसके विपरीत हम मजबूत सरकार चाहते हैं और क्यों चाहते हैं इसके उत्तर में उन्होंने कहा कि सशक्त आम जनता के साथ सक्षम राष्ट्र बना सके। इसे तर्ज में उन्होंने कम से कम एक दर्जन कारण और नारे दे दिए। तो आम चुनाव में भाजपा का नारा होगा- हम मजबूत सरकार चाहते हैं जबकि वो मजबूर। उनका जनता के सामने यह सबसे बड़ा प्रश्न होगा कि आपको मजबूत सरकार चाहिए या मजबूर?

 

पांच वर्ष पहले ठीक इसी समय भाजपा ने राजधानी के रामलीला मैदान में एक साथ राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद की बैठक आयोजित की थी। उसमें मोदी ने प्रधानमंत्री के उम्मीवार के रुप में अपना विस्तृत विजन रखा था। उस भाषण को सुनने के बाद मोदी के प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाए जाने का विरोध करने वाले लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि लगा जैसे हम विवेकानंद को सुन रहे है। मोदी का वह जादुई असर ऐसा था कि अनेक आलोचकों के मुंह से भी निकल गया था कि मोदी ने वाकई देश के भविष्य के बारे में काफी विस्तार से विचार किया था। जाहिर है, भाजपा रामलीला मैदान के राष्ट्रीय परिषद को अपने लिए भाग्यशाली मानती है और इसीलिए यहीं आयोजन भी किया गया। स्वयं अध्यक्ष अमित शाह ने अपने भाषण में इसका जिक्र किया। वास्तव में भाजपा के इतिहास में इतना बड़ा राष्ट्रीय परिषद कभी आयोजित नहीं हुआ। इसी से अनुमान लगता है कि 2019 के आम चुनाव की दृष्टि से भाजपा इसे कितना महत्व दे रही थी। यह राष्ट्रीय परिषद तीन प्रमुख राज्यों में पराजय के बाद हुआ है इसलिए पार्टी नेतृत्व के सामने उसकी समीक्षा के बाद गलतियों को सुधारते हुए नेताओं-कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने, उनमें आत्मविश्वास पैदा करने तथा चुनाव का एजेंडा को साफ करने का यह सबसे महत्वपूर्ण और लोकसभा चुनाव के पूर्व का आखिरी अवसर था। प्रश्न है कि क्या भाजपा नेतृत्व इन उद्देश्यों में सफल हुआ?

नेताओं-कार्यकर्ताओं और समर्थकों को आगाह किया गया कि आप चूक गए तो फिर विपरीत विचारधारा वाले जीत जाएंगे जिसका परिणाम देश को सदियों तक भुगतना पड़ेगा। जाहिर है, यह तीन राज्यों में पराजय के पीछे समर्थकों और कार्यकर्ताओं के असंतोष जैसे कारणों को दूर करने का एक प्रभावी पूर्वोपाय था। विचारधारा शब्द का प्रयोग भले मोदी ने नहीं किया लेकिन भाजपा और राजग तथा अन्य दलों के बीच के अंतर को स्पष्ट करने के लिए उन्होेंने वे सारे उदाहरण दिए जो साबित करते थे हमारे बीच विचारों का कितना मतभेद है। यह हमें आम चुनाव संपन्न होने तक सुनाई देता रहेगा।

इसका उत्तर तो अगले लोकसभा चुनाव का परिणाम ही देगा, पर पूरी कोशिश अवश्य हुई। राष्ट्रीय परिषद में जो प्रस्ताव पारित किए उन पर नजर दौड़ाएं तो एक साथ सरकार की उपलब्धियों के दावों संबंधी आंकड़ों व तथ्यों तथा वैचारिकता का दस्तावेज सबके हाथों आ गया। सरकार की उपब्धियांें को लेकर तो जनता के पास जाना ही है, लेकिन कुछ मुद्दे ऐसे होंगे जिनको भाजपा अपने लिए निर्णायक मानकर पेश करेगी। भाजपा को लगता है कि कृषि और किसान को इस चुनाव में विपक्ष बड़ा मुद्दा बनाएगा इसलिए इस पर अलग से काफी लंबा प्रस्ताव गृहमंत्री राजनाथ सिंह द्वारा रखवाया गया। इसमें साफ लिखा है कि आजादी के बाद किसी सरकार ने किसानों की वास्तविक समस्या को समझकर उनका निकटवर्ती एवं दूरगामी समाधन के लिए कदम नहीं उठाया जितनी नरेन्द्र मोदी सरकार ने उठाया है। हम इससे सहमत हो असहमत किंतु नेताओं-कार्यकर्ताओं के मन में कागजात के साथ अपनी बात उतार देने का महत्व तो है। ऐसे ही दूसरे प्रस्तावों के संदर्भ में भी कहा जा सकता है। किंतु भाजपा या किसी पार्टी में मुख्य महत्व प्रमुख नेताओं के भाषण का ही है। इस नाते यह देखना आवश्यकता होगा कि प्रधानमंत्री मोदी ने आयोजन के समापन पर तथा अध्यक्ष अमित शाह ने उद्घाटन में क्या-क्या कहा।

दोनों नेताओं ने इसका ध्यान रखा कि मुद्दे और वैचारिकता दोनों को इस तरह परोसा जाए ताकि पार्टी के अंदर आत्मविश्वास एवं उत्साह पैदा हो। उदाहरण के लिए अमित शाह ने कहा कि हम 2019 में 2014 से बेहतर परिणाम लाएंगे। पार्टी के सामने सबसे बड़ा प्रश्न विपक्षी पार्टियों के गठबंधन का सामने करने का है। उपस्थित नेता और कार्यकर्ता आपस में इस पर बातचीत भी कर रहे थे। मोदी एवं शाह दोनों ने इसका जिक्र किया। मोदी ने तेलांगना में गठबंधन की पराजय, कर्नाटक के मुख्यमंत्री की बार-बार व्यक्त की जा रही पीड़ा तथा राजस्थान एवं मध्यप्रदेश में मुकदमे हटाने की बसपा की शर्त की याद दिलाते हुए कहा कि अभी से इनका अंतर्विरोध दिख रहा है। मोदी ने कुल मिलाकर भाजपा के लिए यह नारा दे दिया कि वो मजबूत नहीं मजबूर सरकार चाहते हैं। ऐसा क्यों चाहते हैं इसके उत्तर में उन्होंने वंशवाद से लेकर भ्रष्टाचार, कुशासन आदि की बात कह दी। इसके विपरीत हम मजबूत सरकार चाहते हैं और क्यों चाहते हैं इसके उत्तर में उन्होंने कहा कि सशक्त आम जनता के साथ सक्षम राष्ट्र बना सके। इसे तर्ज में उन्होंने कम से कम एक दर्जन कारण और नारे दे दिए। तो आम चुनाव में भाजपा का नारा होगा- हम मजबूत सरकार चाहते हैं जबकि वो मजबूर। उनका जनता के सामने यह सबसे बड़ा प्रश्न होगा कि आपको मजबूत सरकार चाहिए या मजबूर?

इसका असर जनता के मनोविज्ञान पर अवश्य होगा। जबसे विपक्षी दलों के गठबंधन की चर्चा चली है यह बहस देश भर में जारी है कि हमें 1996 के संयुक्त मोर्चा जैसी सरकार चाहिए कि एक बड़ी पार्टी के नेतृत्व में कुछ छोटे दलों को साथ लेकर चलने वाली सरकार? उत्तर प्रदेश में बसपा सपा गठबंधन को लेकर चिंता का निवारण भी करना था। इस संबंध में अमित शाह का तर्क था कि पार्टियों का अंकगणित भौतिक शास्त्र नहीं बल्कि रसायन शास्त्र की तरह काम करता है। यानी बसपा सपा के मिल जाने का मतलब यह नहीं कि उनको सारे वोट मिल जाएंगे। उन्होंने पूरे जोश से कह दिया कि हम पिछली बार की 73 से ज्यादा सीटे जीतेंगे। इस कार्यकारिणी से जो तीसरा मुख्य स्वर निकला वह था, आगामी 2019 के चुनाव को विचारधारा की लड़ाई साबित करना। यह अमित शाह के भाषण का मुख्य थीम था। उन्होंने कहा कि 2019 का चुनाव एक तरह का वैचारिक युद्ध है, यह दो विचारधाराओं की लड़ाई है जो सदियों तक असर छोड़ने वाला है। इसका उन्होंने विश्लेषण भी किया और पानीपत के तृतीय युद्ध की याद दिलाते हुए कहा कि उसके बाद 200 साल तक भारत गुलाम रहा। इस तरह नेताओं-कार्यकर्ताओं और समर्थकों को आगाह किया गया कि आप चूक गए तो फिर विपरीत विचारधारा वाले जीत जाएंगे जिसका परिणाम देश को सदियों तक भुगतना पड़ेगा। जाहिर है, यह तीन राज्यों में पराजय के पीछे समर्थकों और कार्यकर्ताओं के असंतोष जैसे कारणों को दूर करने का एक प्रभावी पूर्वोपाय था। विचारधारा शब्द का प्रयोग भले मोदी ने नहीं किया लेकिन भाजपा और राजग तथा अन्य दलों के बीच के अंतर को स्पष्ट करने के लिए उन्होेंने वे सारे उदाहरण दिए जो साबित करते थे हमारे बीच विचारों का कितना मतभेद है। यह हमें आम चुनाव संपन्न होने तक सुनाई देता रहेगा। सामान्य वर्ग को दिया गया आर्थिक आधार पर आरक्षण तथा जीएसटी में किऐ गए सुधारों को भी प्रमुख मुद्दा बनाया जाएगा। भाजपा समझ गई है कि अनसूचत जाति जनजाति कानून पर उच्चतम न्यायलय के फैसले को पलटने के कारण अगड़ों तथा जीएसटी के कारण व्यापारी वर्ग के असंतोष का खामियाजा उसे भुगतना पड़ रहा है। इसलिए अमित शाह ने स्वयं इनकी चर्चा की। उन्होंने कहा कि जीएसटी से न केवल कर कम किया गया बल्कि कर देने की सीमा को भी बढ़ा दिया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने आर्थिक आधार पर आरक्षण की स्वयं चर्चा करते हुए यह बताया कि जो कुछ बाबा साहब अंबेदकर ने दिया है उसे बनाए रखने के प्रति हम संकल्पित हैं तो जो दूसरे समूहों के गरीब हैं उनको भी आगे लाने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं। इस तरह भाजपा समाज के हर समूह को साथ लाने की रणनीति अपनाएगी।
नरेन्द्र मोदी का नाम इस चुनाव में भाजपा के लिए सबसे बड़ा हथियार होगा यह पहले से स्पष्ट है। राष्ट्रीय परिषद में सारे स्वर इसी के अनुरुप थे। उदाहरण के लिए अमित शाह ने कहा कि आज मोदी जी जैसा नेता दुनिया की किसी पार्टी के पास नहीं है। हमारे पास मोदी हैं और विरोधियों के पास न नेता है और न नीति। स्वयं मोदी ने भी भाषण में यह पूछकर कि आपको कैसा सेवक चाहिए देश के सामने अपने को नये सिरे से प्रस्तुत कर दिया। इसके समानांतर उन्होंने राहुल गांधी का नाम लिए बिना कहा कि आपको दो में से एक को चुनना है। यह सवाल मोदी सहित पूरी भाजपा मतदाताओं के सामने रखेगी। मोदी ने शिवाजी की माता जिजाबाई का उदाहरण देते हुए कहा कि मुझे वो कह रहीं हैं कि जाओ आम आदमी और गरीब की भलाई में लग जाओ। विवेकानंद का उठो और जब तक लक्ष्य न प्राप्त कर लो आगे बढ़ते रहो की बात करके मोदी ने नेताओं-कार्यकर्ताओं को झकझोड़ने की कोशिश की। भाजपा के आम कार्यकर्ताओं और समर्थकों को ऐसी बातें ज्यादा अपील करती है। प्रधानमंत्री ने कार्यकर्ताओं और नेताओं का आगाह करने की भी रणनीति अपनाई कि अगर उनकी सरकार नहीं आई तो ये उन सबको कानून के डंडे से उत्पीड़ित करेंगे। पूर्व यूपीए सरकार द्वारा उनको परेशान करने का करते हुए उन्होंने कहा कि किस तरह उनको जेल जाने की धमकी दी जाती थी तथा अमित शाह को तो जेल में भेजा भी। स्वयं को पीड़ित किए जाने का भावनात्मक पासा पिछले चुनाव की तरह इस बार भी लोगों के सामने रहेगा। दरअसल, मोदी को पता है कि कई मामलों पर केवल उनके समर्थक ही नहीं, कार्यकर्ताओं और नेताओं का एक वर्ग भी असतुष्ट और नाराज हैं। उनको मनाने का इससे ज्यादा भावुक अपील नहीं हो सकतीं। तो देखना होगा इसका कितना असर होता है।

हालांकि प्रधानमंत्री और अमित शाह दोनों ने राम मंदिर का जिक्रं किया लेकिन उसमें यह समझाने की ही मुख्य कोशिश थी कि कांग्रेस उच्चतम न्यायालय में इसका फैसला होने ही नहीं देना चाहती। प्रधानमंत्री ने कहा कि न इसे भूलना है और देश को भूलने देना है। इसका अर्थ साफ है कि चुनाव में राममंदिर मुद्दा होगा लेकिन उसकी ध्वनि यह होगी कि कांग्रेस मंदिर नहीं बनने देना चाहती। वैसे अमित शाह ने यह समझाने की कोशिश की कि इस मुद्दे को छोड़ा नहीं गया है। शाह ने जैसे ही कहा कि पार्टी चाहती है कि जल्द से जल्द भव्य राम मंदिर बने हाथ उठाकर लोगों ने इतनी देर तक आवाज लगाई कि शाह को अपना भाषण थोड़ी देर के लिए रोकना पड़ज्ञ। इसमें यह संदेश साफ था कि नेताओं-कार्यकर्ताओं के दिलों के कितने करीब यह मुदृदा है। शाह के पास भी कुछ ठोस कहने के लिए नहीं था। उन्होंने भी कहा कि कांग्रेस इसके जल्द निपटारे में अड़चन पैदा कर रही है। इतने से कार्यकर्ता और समर्थक संतुष्ट होंगे ऐसा मानने का कारण नहीं है। यह मोदी और शाह को भी पता है। इसलिए उन्होंने योजनापूर्वक दूसरे मुद्दे और प्रश्न ज्यादा आक्रामकता से उठा दिए हैं ताकि कम से कम संगठन परिवार के अंदर बहस मंदिर केन्द्रित न होकर इन पर आए। वस्तुतः राष्ट्रीय परिषद से मोदी और शाह ने चुनाव के अपने सारे मुद्दे स्पष्ट कर दिए हैं जिनमें वो सब कुछ है जिनकी हम अपेक्षा कर रहे थे। अब इनकी प्रभाविता और स्वीकार्यता साबित होनी है।

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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