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भगवा झंडा को दंगाई बताना

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झंडा लेकर दंगा कहां होता है

अवधेश कुमार

भारत के दंगों में झंडा लेकर हमला करने की घटनाएं शायद ही कहीं हुई हो। झंडा लेकर लोग समूह में हमला करने निकले हों, इसका रिकॉर्ड तो उत्तर प्रदेश पुलिस के पास होगा नहीं। दंगा और झंडा में आखिर क्या संबंध है? हां, फिल्मों में अवश्य ऐसे दृश्य देखे गए हैं। तो उत्तर प्रदेश की पुलिस का यह अभ्यास फिल्मों से प्रेरित था या वाकई दंगा से निपटने की भावना से किया गया था? अगर दंगों से निपटने की भावना से प्रेरित था तो इसके लिए किसी झंडे की आवश्यकता ही नहीं थी।

उत्तर प्रदेश पुलिस के क्या कहने! उसकी इलाहाबाद ईकाई ने दंगों से निपटने का एक अभ्यास किया जिसमें दंगाई की भूमिका निभाने वाले पुलिस वालों के हाथों भगवा झंडा थमा दिया गया था। जाहिर है, यह ऐसा कृत्य था जिसका विरोध निश्चित था। अभ्यास करने की योजना बनाने वाले पुलिस अधिकारियों को इसकी विरोधी प्रतिक्रियाओं का पूर्वाभास होना चाहिए था। अगर इसका आभास नहीं था तो फिर पुलिस अधिकारी होने का उनको अधिकार ही नहीं है। भगवा रंग हिन्दू धर्म का प्रतीक सदृश है। इस रंग का अर्थ बहुत व्यापक है जिसमें यहां विस्तार से चर्चा संभव नहीं है। जब आप वह झंडा अभ्यास करने वालों के हाथों में देकर उसे दंगाई दिखाते हैं तो उसका एक संदेश भी निकलता है। वह संदेश यह निकलता है कि दंगा करने वाले एक ही समुदाय के होते हैं। जाहिर है, यह आपत्तिजनक और अस्वीकार्य हरकत है। इसलिए इसका जो भी विरोध हो रहा है वह सर्वथा उचित है।

यह कहा जा रहा है कि पुलिस अभ्यास ही तो कर रही थी। उसमें यदि भगवा झंडे का प्रयोग कर ही लिया तो कौन सा आसमान टूट पड़ा। ऐसे लोगों के अनुसार इसे मुद्दा बनाना बेमानी है। प्रश्न यह है कि भगवा झंडे का ही उपयोग क्यों किया गया? इसके पीछे आपकी सोच क्या थी? जिनने उपयोग किया उनने यह कल्पना की कि भारत के करोड़ों लोगोें की भावनाएं उससे भड़केंगी? उनने ये सोचा कि उसके विजुअल्स भारत के बाहर जहां जाएंगे वहां के लोग क्या सोचेंगे? कुल मिलाकर भगवा रंग की छवि क्या बनेगी? मान लीजिए अनजाने में ही इसका उपयोग किया गया हो, या इसके पीछे कोई गलत इरादा नहीं था तब भी यह बहुत बड़ी गलती है या इसे अपराध कहें तो भी गलत नहीं होगा। इस गलती और अपराध की सजा उसे ही मिलनी चाहिए जिसने इसकी योजना बनाई।

भगवा रंग हिन्दू धर्म का प्रतीक सदृश है। इस रंग का अर्थ बहुत व्यापक है। जब आप वह झंडा अभ्यास करने वालों के हाथों में देकर उसे दंगाई दिखाते हैं तो उसका एक संदेश भी निकलता है। वह संदेश यह निकलता है कि दंगा करने वाले एक ही समुदाय के होते हैं। जाहिर है, यह आपत्तिजनक और अस्वीकार्य हरकत है।

अनजाने में आखिर दूसरा कोई रंग उपयोग करने का विचार क्यों नहीं आया? अनेक रंग के कपड़े हो सकते थे। भगवा का उपयोग ही ध्यान में कैसे आया? इसलिए इस बात को गले उतारना आसान नहीं है कि बिना जाने या बिना सोचे या बिना गलत इरादे के भगवा रंग का उपयोग किया गया। निश्चय ही इसके पीछे कुछ सोच थी। हो सकता है कि प्रदेश सरकार एवं सपा को खुश करने की भावना रही होगी। दुर्भाग्य से भगवा रंग को पिछले कुछ वर्षों में संघ परिवार व भाजपा के साथ नत्थी कर दिया गया है। इस रंग पर उस परिवार का एकाधिकार नहीं हो सकता। सनातन धर्म के नैष्ठिक संन्यासी, जिनका सम्मान पूरा समाज करता है, भगवा वस्त्र ही पहनते हैं। अन्य संन्यासियों से लेकर रामकृष्ण मिशन, आर्य समाज….सब इस रंग का वस्त्र पहनते हैं। इसलिए इस रंग पर किसी एक संगठन परिवार का एकाधिकार नहीं हो सकता।

दुर्भाग्य से भगवा रंग को पिछले कुछ वर्षों में संघ परिवार व भाजपा के साथ नत्थी कर दिया गया है। इस रंग पर उस परिवार का एकाधिकार नहीं हो सकता। सनातन धर्म के नैष्ठिक संन्यासी, जिनका सम्मान पूरा समाज करता है, भगवा वस्त्र ही पहनते हैं। अन्य संन्यासियों से लेकर रामकृष्ण मिशन, आर्य समाज….सब इस रंग का वस्त्र पहनते हैं। इसलिए इस रंग पर किसी एक संगठन परिवार का एकाधिकार नहीं हो सकता।

यह बात भी गले नहीं उतरती कि वहां जो खेल का क्लब है उसका प्रतीक रंग भगवा है और उसी का उपयोग हो गया। कैसे हो गया? खेल में उपयोग करना और दंगा विरोधी अभ्यास में दंगाई बनाकर पेश करने में मौलिक अंतर है। भगवा ही नहीं किसी धर्म, संप्रदाय, पंथ, मजहब के झंडे या रंगों का उपयोग ऐसे अभ्यासों में नहीं होना चाहिए। वैसे भी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी सरकार के आने के बाद से दंगों में बढ़ोत्तरी हुई है। इसमें माहौल को ऐसा बनाने की आवश्यकता है ताकि सांप्रदायिक विद्वेष की जहां भी जितनी भावनाएं हैं उनका शमन हो, शांति और सद्भाव कायम हो सके। इस तरह के कदम से तो लोगों की भावनाएं भड़केंगी। और भावनाएं भड़केंगी तो उसका परिणाम क्या शांति और सद्भाव में आएगा? क्या इससे दो संप्रदायोे में भाईचारा बढ़ेगा? इस तरह से विचार करें तो पुलिस का अपराध ज्यादा स्पष्ट हो जाएगा। ऐसा नहीं होता तो आज भाजपा या संघ के दूसरे संगठनों को विरोध करने का अवसर नहीं मिलता। वे सड़क पर नहीं उतरते। यह अवसर आपने प्रदान किया है।

तो कहीं इसके पीछे राजनीति को जानबूझकर गर्म करने का इरादा तो नहीं था? यह प्रश्न इसलिए उठता है कि भारत के दंगों में झंडा लेकर हमला करने की घटनाएं शायद ही कहीं हुई हो। झंडा लेकर लोग समूह में हमला करने निकले हों, इसका रिकॉर्ड तो उत्तर प्रदेश पुलिस के पास होगा नहीं। दंगा और झंडा में आखिर क्या संबंध है? हां, फिल्मों में अवश्य ऐसे दृश्य देखे गए हैं। तो उत्तर प्रदेश की पुलिस का यह अभ्यास फिल्मों से प्रेरित था या वाकई दंगा से निपटने की भावना से किया गया था? अगर दंगों से निपटने की भावना से प्रेरित था तो इसके लिए किसी झंडे की आवश्यकता ही नहीं थी। इस वर्ष उत्तर प्रदेश में 29 दंगों की घटनाएं बताई जा रहीं है। इनमें से कितने दंगे हैं जिनमें भगवा झंडा लेकर हमला किया गया? या कितने दंगे हैं जिनमें झंडे का उपयोग हुआ? एक भी नहीं। मुजफ्फरनगर दंगे की सिहरन भरी घटनाएं हम सब आज तक नहीं भूलंें हैं। कोई एक घटना उत्तर प्रदेश पुलिस बता दे जिसमें भगवा झंडे या किसी प्रकार के झंडे का प्रयोग हुआ हो। उत्तर प्रदेश के कई दंगें अपनी भयानकताओं के लिए कुख्यात हैं। हाशिमपुरा के दंगे का फैसला अभी आया है, उसमें क्या झंडे का प्रयोग हुआ था? मेरठ के दंगे में हुआ था? मुरादाबाद के दंगों मे हुआ था? फैजाबाद में हुआ था? मथुरा में हुआ था? सहारनपुर में हुआ था? जब कहीं झंडे का प्रयोग हुआ ही नही ंतो फिर झंडे के प्रयोग का विचार आया कहां से? उसमें भी भगवा झंडा को फहराते हुए दंगाइयों को दिखाना और उनको खदेड़ना। इसलिए ऐसी हरकत का हर स्तर पर विरोध होना चाहिए।

दंगों या अन्य ऐसे अपराधों से संबंधित आंतरिक सुरक्षा से संबंधित मौक ड्रिल महीने में एक बार होना चाहिए। यह पहले से निर्धारित प्रक्रिया है। अगर आप ऐसे अभ्यास नहीं करंेगे तो आपका पुलिस बल दंगा होने पर निपटने के लिए तैयार ही नहीं रहेगा। अभ्यास से ही पुलिस बल की चुस्ती, तंदुरुस्ती, चौकसी तो बनी ही रहती है, वहउन तरीकों को भी सीखती है जिनसे दंगों या अन्य अपराधों से निटपने में उसकी क्षमता व कुशलता विकसित हो सके। उत्तर प्रदेश पुलिस की ही एक तस्वीर हमारे पास कानपुर से आई है जिसमें जवान को बंदूक पकड़ना तक नहीं आता था। उसकी जांच करने वाले अधिकारी कह रहे थे कि यह अपने भी मरेगा और दूसरे को भी ले जाएगा। यह अभ्यास की कमी या अभ्यास न होने का परिणाम है। इसलिए पुलिस को हर प्रकार के अपराधों से निपटने के लिए लगातार अभ्यास कराते रहना आवश्यक है, जिसमें दंगा भी शामिल है। इसकी पूरी संरचना, तरीके सब निर्धारित हैं, जिसका पालन होता ही नहीं। जब पुलिस को इसकी याद आती है कि अरे हमें तो अभ्यास भी करना है तो फिर उसमें ऐसी विकृत सोच आती है कि उसका अभ्यास विवादास्पद हो जाता है। शायद राजनीतिक नेतृत्व को खुश करने की भावना में पुलिस ऐसी खतरनाक गलती कर जाती है जिसके परिणाम पूरे समाज के लिए बुरा होता है।

भगवा ही नहीं किसी धर्म, संप्रदाय, पंथ, मजहब के झंडे या रंगों का उपयोग ऐसे अभ्यासों में नहीं होना चाहिए। वैसे भी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी सरकार के आने के बाद से दंगों में बढ़ोत्तरी हुई है। इसमें माहौल को ऐसा बनाने की आवश्यकता है ताकि सांप्रदायिक विद्वेष की जहां भी जितनी भावनाएं हैं उनका शमन हो, शांति और सद्भाव कायम हो सके। इस तरह के कदम से तो लोगों की भावनाएं भड़केंगी।

 

भगवा झंडा लेकर दंगाइयों को दिखाने का अभ्यास ऐसा ही है। इससे दंगों से निपटने की कुशलता और सक्षमता कितनी बढ़ी यह कहना भले मुश्किल हो, पर इससे एक बड़े वर्ग में जो आक्रोश पैदा हुआ उसका परिणाम किसी के लिए अच्छा नहीं होगा। उत्तर प्रदेश सरकार को इसे राजनीतिक नजरिए से देखने की जगह इसके दूरगामी नकारात्मक परिणामों को देखना चाहिए और उसके आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए। इस घटना के लिए क्षमा याचना तथा आगे इसकी पुनरावृत्ति न हो, इसलिए यह आदेश जारी होना चाहिए कि पुलिस के किसी अभ्यास में ऐसे प्रतीकों का प्रयोग न किया जाए। दंगा विरोधी अभ्यास में तो किसी प्रकार के झंडे का उपयोग होना ही नहीं चाहिए।

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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