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बुलंदशहर हिंसा के पीछे साजिश थी

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बुलंदशहर को हिंसा की आग में दहलाने के अपराधी कौन हैं

अवधेश कुमार

बुलंदशहर हिंसा को लेकर कई बातें अब सामने आ रहीं हैं। इन्सपेक्टर सुबोध सिंह की हत्या के आरोप में भी एक व्यक्ति पकड़ा गया है। किंतु अभी तक यह पता नहीं चल पाया कि आखिर गोहत्यायें करके उनके अवशेष सड़क किनारे ईंख की खेतों में छोड़ देने वालों के पीछे कौन थे? लोगों का गुस्सा तो गोहत्या के कारण ही था। इंस्पेक्टर सुबोध सिंह पर लोगों का आरोप था कि गोहत्या करने वाले उनको घूस देते हैं और वे आंखे मूंद लेते हैं। खैर, मैंने हिंसा के दूसरे दिन ही लेख लिखा था। उसका एक छोटा अंश अखबारों मे छपा था। उसे आपके लिए फिर प्रस्तुत कर रहा हूं।

 

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के स्याना के महाव गांव की भयावह घटना ने मुख्यतः दो बातें साबित की हैं। एक, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लगाए गए बारुद के ढेर अभी भी खत्म नहीं हुए हैं। किंतु इससे भी बड़ी बात यह कि सारी स्थिति समझते हुए प्रशासन इसे सही समय पर संभाल नहीं सकी। जो कुछ हुआ वह अकल्पनीय है। हालांकि अंत में सरकार ने स्थिति संभाल ली। अब वहां किसी तरह की हिंसा नहीं है। बुलंदशहर में तब्लीगी इज्तमा के कारण भारी मुसलमान पहुंचे थे। अगर हिंसा या हिंसा के संदर्भ में किसी तरह की अफवाह फैलती तो आज क्या स्थिति होती इसकी कल्पना से ही सिहरन पैदा हो जाती है। पूरी घटना को देखें तो इसमें बड़ी सांप्रदायिक हिंसा का सुनियोजित षडयंत्र नजर आता है। आखिर इतनी संख्या में गोवंश को काटकर ठीक सड़क के किनारे पड़े खेतों में डाल देने का क्या उद्देश्य हो सकता है? अगर किसी को गोकशी करनी है तो वह उसे छिपाने का प्रयास करेगा। वहां पहुंचे अधिकारियों का कहना है कि खेतों में गाय के अवशेष जगह-जगह लटकाकर रखे गये थे। स्याना के तहसीलदार राजकुमार भास्कर का बयान है कि ईख के कई खेतों में गोवंश के कटे अंश रखे थे। गाय के सिर और खाल आदि अवशेष गन्ने पर लटका रखे थे जो दूर से ही दिख रहे थे। अगर यह सच है तो फिर बताने की आवश्यकता नहीं कि इसका उद्देश्य क्या हो सकता है। ऐसा करने वालों को पता था कि चारों ओर से बुलंदशहर के तब्लीगी इज्तमा में जमा लोग इस रास्ते से लौटने वाले हैं जिसके पहले हिन्दू गोवंश के इन कटे अवशेषों को देखकर आक्रोशित हो चुके होंगे और वे गुस्से में उन पर हमला कर सकते हैं। उसके बाद तो हिंसा आग की तरह फैलनी ही थी।


इस दृष्टि से विचार करंे तो कहा जा सकता है कि प्रदेश और देश सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के एक बड़े षडयंत्र से बचा गया है। हालांकि उसमें भीड़ से जूझते एक इन्सपेक्टर का बलिदान हो गया, एक नवजवान भी गुस्साये भीड़ एवं पुलिस के बीच संघर्ष का शिकार हो गया, चौकी तक जल गई, सरकारी वाहनों और संपत्तियों को भारी नुकसान हुआ और यह सब दुखद और एक सभ्य समाज के नाते शर्मनाक भी है, किंतु विचार करने वाली बात है कि आखिर स्थिति इतनी बिगड़ी क्यों? गोहत्या की सूचना मिलने पर हिन्दू समाज गुस्से में आएगा यह राज्य सरकार और उसके मातहत काम करने वाले पुलिस और प्रशासन को बताने की आवश्यकता नहीं थी। ऐसी स्थिति में लोगों का स्थानीय पुलिस प्रशासन के विरुद्ध आक्रोश व्यक्त करना स्वाभाविक था। लोग ट्रैक्टर, ट्रौली में भरकर यदि हाईवे या पुलिस चौकी पर प्रदर्शन करने की जिद पर अड़े थे तो गुस्सैल भीड़ को देखते हुए इसे भी अस्वाभाविक कतई नहीं कहा जा सकता है। जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार कुछ दिनों पहले ही खुर्जा के इस्लामाबाद में 21 गोवंश काट दिए गए थे। उससे पैदा हुआ गुस्सा शांत भी नहीं हुआ था कि महाव की घटना सामने आ गई। लोग गाय के अवशेष ट्रैक्टर-ट्रॉली में भर कर बुलंदशहर-गढ़मुक्तेश्वर स्टेट हाईवे की तरफ ले जाना चाह रहे थे। बेचारे तहसीलदार ट्रैक्टर-ट्रॉली के आगे खड़े होकर लोगों से मिन्नत करने लगे। स्थानीय पुलिस ने भी समझाने का प्रयास किया। कानूनी कार्रवाई करने, दोषियों को पकड़ने जैसे जितने वायदे हो सकते थे किए गए। आरंभ में पुलिस प्रशासन की कोशिश किसी तरह भीड़ को शांत करना ही होता है। किंतु ऐसे मामलांें में जहां धार्मिक भावनायें भड़कीं हों शांत करना आसान नहीं होता। पुलिस की संख्या कम और भीड़ की ज्यादा। भीड़ ट्रैक्टर-ट्रॉली लेकर हाईवे पर चिंगरावठी पुलिस चौकी पर पहुंचीं। वहां की घटना के बारे में अलग-अलग विवरण है। पुलिस का कहना है कि कुछ लोग मान गए थे लेकिन इसी बीच पथराव होने लगा, तोड़-फोड़ की जाने लगी और फिर पुलिस ने भी जवाबी कार्रवाई की। बेकाबू भीड़ ने पुलिस के कई वाहन फूंक दिए और चिंगरावठी पुलिस चौकी में आग लगा दी।
किंतु एकाएक ऐसा नहीं हो सकता। गहराई से देखा जाए तो इस मामले मंें राज्य सरकार तथा उसकी पुलिस प्रशासन की हर स्तर विफलता साबित होती है। पुलिस को नौ बजे सुबह सूचना मिल गई थी। गोहत्या की घटना पर देश भर की जो स्थिति है और स्वयं उत्तर प्रदेश का जो माहौल है उसे देखते हुए पुलिस प्रशासन को तुरत एक्शन में आना चाहिए था। बिल्कुल सड़क से लगे इलाके में पहुंचना भी कठिन नहीं था। 10 बजे सुबह एसडीएम और स्याना के इंस्पेक्ट पहुंचे। 11 बजे सुबह ग्रामीण ट्रैक्टर-ट्राली में अवशेष लेकर चिंगरावठी चौकी रवाना होेने लगे। यानी इस बीच दो घंटे का समय यूं ही चला गया। हालांकि आसपास के कुछ थाने की पुलिस वहां पहुंच रही थी। करीब 11.30 बजे सुबह ग्रामीणों और पुलिस के बीच फायरिंग और पथराव शुरू हुआ। इस बीच स्थिति को पूरी तरह संभाला जा सकता था। स्थिति जब नियंत्रण से बाहर हो गई तो करीब 12.30 बजे जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस उपाधीक्षक बुलंदशहर से घटनास्थल के लिए निकले। आखिर उसम समय तक वो किस बात की प्रतीक्षा कर रहे थे? वे पहुुचे तब तक इंस्पेटक्र सुबोध कुमार सिंह की मौत हो चुकी थी। आईजी, एडीजी और कमिशनर 3.30 बजे पहुंचे।
जरा सोचिए, 10 बजे तक सोशल मीडिया के माध्यम से इसकी आधी-अधूरी जानकारी देश भर मेें फैल चुकी थी। क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं उनके सहयोगियों तक इतनी संवेदनशील घटना की जानकारी नहीं पहुंची? अगर नहीं पहुंची तो इसका अर्थ है कि दावांें के विपरीत पूरी व्यवस्था लचर है। अगर पहुंची और पुलिस प्रशासन को पहुंचने में इतना विलंब हुआ तो साफ है कि सरकार ने इसकी गंभीरता को समझते हुए समय पर आवश्यक कार्रवाई के निर्देश जारी नहीं किए। राज्य सरकार इसलिए कठघरे मंे है, क्योंकि पिछले काफी दिनों से खुफिया विभाग की रिपोर्टों के अंश हमारे सामने आ रहे थे जिसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गोहत्या सहित अन्य कार्यों से हिंसा भड़काने की योजनाओं की बात थीं। इन सूचनाओं के आधार पर पुलिस प्रशासन अलर्ट पर है। पिछले कुछ महीनों में मेरठ, मुजफ्फरनगर, शामली, सहारनपुर समेत कई जिलों में गोहत्या की अफवाह मात्र पर तनाव पैदा हुआ है। पथराव, वाहनों में तोड़फोड़ व आगजनी की घटनायें हो चुकी है। पुलिस तक पर फायरिंग तक हो चुकी है। जिस प्रदेश की ऐसी स्थिति हो वहां इतनी लचर कार्रवाई शर्मनाक है। आधे घंटे के अंदर वहां इतनी संख्या में पुलिस, पीएसी, आरएएफ, प्रशासनिक अधिकारियों के साथ नेताओं का समूह पहुंच जाना चाहिए था। समय का यह विवरण बताता है कि इतनी बड़ी घटना को संभालने के लिए उच्च पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को जितनी तत्परता दिखानी चाहिए नहीं दिखाई गई। सरकार सचेत हो जाती तो ऐसी स्थिति नहीं होती। कह सकते हैं उच्चाधिकारियों के सामने बुलंदशहर में तब्लीगी इज्तमा को शांतिपूर्वक संपन्न कराना तथा लोगों को सुरक्षित वापस भेजने की जिम्मेवारी थी। किंतु इतनी बड़ी घटना को संभालने का दायित्व भी तो उन्हीं का था। जो जानकारी है ये सब केवल फोन पर ही स्याना पुलिस को निर्देशित कर रहे थे। यह कैसा कानून का राज है जहां करीब एक घंटे तक वह युद्ध के मैदान में बदल गया था जहां पुलिस वालों की जान पर आफत आ गई, उन्हें चौकी छोड़कर भागना पड़ा… यहां तक कि गांव के सामान्य लोग भी घरबार छोड़कर भाग रहे थे। पुलिस प्रशासन की प्राथमिकत तब्लीगी इज्तमा में आए लोगों को जल्दी सुरक्षित वापस कराना था। उपर से दबाव जाम हटाने का था। पुलिस का लगा कि यदि जाम नहीं हटा तो सांप्रदायिक हिंसा हो सकती है इसलिए उन्होंने जबरन लोगों को हटाने की कोशिश की। पुलिस की थोड़ी संख्या बढने पर लाठीचार्ज हुआ और पूरी स्थिति बिगड़ गई। पुलिस यह भूल गई कि उसकी संख्या कम है। हालांकि बाद में पुलिस ने इज्तमा से लौट रहे लोगों का रूट डायवर्ट करा दिया। किंतु तब तक जो होना था हो गया। अब एडीजी मेरठ जोन प्रशांत कुमार और आईजी राम कुमार रात में बुलंदशहर में कैंप कर रहे हैं। स्याना छावनी में तब्दील हो चुकी है। पांच कंपनी आरएएफ और छह कंपनी पीएसी के साथ-साथ पर्याप्त संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है। जब सब कुछ हो गया तो ऐसा करने से अब क्या हासिल होगा?

यह भी विचार करने की बात है कि अगर उत्तर प्रदेश में सारे अवैध कत्लखाने बंद हो गए, गोवंश की हत्या प्रतिबंधित है तो फिर इतनी संख्या में उनके कटे अंग, उतारे गए चमड़े आदि वहां आए कैसे? बजरंग दल के जिस जिला संयोजक पर लोगों को उकसाने का आरोप है उसने ही थाने को इसकी सूचना दी और नामजद रिपोर्ट लिखवाई थी। इसका मतलब यह हुआ कि मुख्यमंत्री के स्वयं रुचि लेने के बावजूद से गोवंश की हत्यायें हो रही हैं। इतनी संख्या में गोवंश की हत्या और उनके शरीर के अंगोें को अलग करने का काम तो पेशेवर ही कर सकते हैं। जिसे अनुभव नहीं वह तो खाल नहीं उतार सकता। यह गंभीर विषय है और यह भी सरकार तथा पुलिस प्रशासन की विफलता दर्शाती है। जड़ तो गोवंश की हत्या ही है। दुर्भाग्य से हम मूल कारणों को गौण बनाकर उसके बाद हुई हिंसा को प्रमुख मान रहे हैं। गोवंश की हत्या कर खेतों में रखने वाले समाज के दुश्मन हैं। लोगों को इसके खिलाफ प्रदर्शन करने, धरना देेने का भी अधिकार है, पर कानून हाथ मंें लेना तो अपराध है। आप पुलिस पर हमला करें, गाड़ियां जलायें, थाने जलायंें यह कतई स्वीकार्य नहीं। आखिर उस 47 वर्ष के पुलिस अधिकारी का क्या कसूर था? मारे गए उस नवजवान का क्या दोष था? षडयंत्रकारी यही तो चाहते थे कि लोग गुस्से में हिंसा करें और फिर चारों ओर सांप्रदायिक संघर्ष हो। इस समय देश में जिस तरह के षडयंत्र चल रहे हैं उसमें समाज को ज्यादा सतर्क और संतुलित होने की जरुरत है। वैसे भी पुलिस अपनी विफलता कभी नहीं स्वीकारती। जब लोग हिंसा करते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई को ही पुलिस अपनी सफलता के रुप में प्रचारित करती है। इस तरह की हिंसा से मामला दूसरी दिशा में मुड़ जाता है। अगर अहिंसक प्रदर्शन होता तो इस समय केवल गोहत्या का मुद्दा देश के सामने होता। प्रतिक्रिया में हुई हिंसा इस समय सुर्खियां बन रहीं हैं।
वैसे इसमें कई बातों की गहराई से जांच की आवश्यकता है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार सुबोध कुमार सिंह की मौत बायीं आंख में गोली लगने से हुई और सिर पर भी किसी भारी चीज की चोट के निशान पाए गए हैं। इस तरह गोली मारने का काम कोई अपराधी ही कर सकता है। आम लोग तो ऐसे गोली नहीं मार सकते। साफ है कि भीड़ में ऐसे तत्व शामिल थे जिनने स्थिति का लाभ उठाया। हालांकि जो वीडियो सामने आया है उसमें उनकी क्षतिग्रस्त गाड़ी सड़क किनारे एक खेत में खड़ी दिख रही है। वीडियो में फायरिंग की आवाज भी सुनाई दे रही है। सुबोध कुमार सिंह गाड़ी की ड्राइवर के पीछे वाली साइड में सिर के बल लटके हुए हैं। उनका सिर जमीन से सटा हुआ नजर आ रहा है। उनके बाएं हाथ व शरीर के बाएं हिस्से पर कोई चोट का निशान नजर नहीं आ रहा। वीडियो में हिसंा करती भीड़ आपस में कोतवाल के मरने की चर्चा करते नजर आ रहे हैं। इसके बाद दंगाई गाली-गलौच करते हुए सड़क की ओर भागते नजर आ रहे हैं और सड़क पर पहुंचते ही एक अन्य गाड़ी को पलटने की कोशिश कर रहे हैं। सुबोध कुमार को अकेले उनके साथी जान बचाने के लिए भाग गए थे।


मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्याना की घटना की जांच के लिए एडीजी इंटलीजेंस एसबी शिराडकर को भेजा। साथ ही मेरठ रेंज के महानिरीक्षक की अध्यक्षता में एक एसआईटी का भी गठन किया गया। ग्रामीण चपेट मेें आए। हालांकि गोहत्या के मामले में भी सात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। ये हैं, ं सुदैफ चौधरी, इलयास, शराफत, अनस, साजिद, परवेज और सरफुद्दीन। किंतु 27 नामजद एवं 60 बेनामी लोगों के खिलाफ भी कठोर घाराओं मेें प्राथमिकी दर्ज की गई है। ऐसा लग रहा है जैसे बजरंग दल का संयोजक नहीं होता तो घटना घटती ही नहीं। अगर वह दोषी है तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो, लेकिन जिनने सुबोध कुमार को गोली मारी उसकी पहचान करना पुलिस का ही काम है। बगैर इसके किसी को हत्या की धारा में नामजद करना गलत है।
खुफिया रिपोर्ट आपके पास है और घटनायें पहले से घट रहीं हैं फिर भी कार्रवाई में ऐसी लापरवाही को क्या कहा जा सकता? मेरठ, बुलंदशहर, हापुड़ समेत कई जनपदों में गोहत्या को लेकर तनाव होता रहता है। मेरठ में खासतौर पर लिसाड़ीगेट, ब्रह्मपुरी, सरधना, सरूरपुर, किठौर, भावनपुर,जानी, इंचौली, दौराला, खरखौदा और मुंडाली में गोहत्या के कारण सांप्रदायिक तनाव कई बार पैदा हो चुका है। हालांकि अभी तक पुलिस प्रशासन ने स्थिति को कहीं भी ज्यादा बिगड़ने नहीं दिया। किंतु खुफिया का इनपुट प्रमाणित तो होता रहा। गोहत्या ऐसा मामला है जिससे एकदम तुरत आक्रोश भड़कता है। खबर फैलते ही लोगों की भीड़ उमड़ती है। थानों का घेराव होता है, जुलूस निकलते हैं। मेरठ, बुलंदशहर और मुजफ्फरनगर में सबसे ज्यादा ऐसी घटनायें हुईं हैं। ऐसी घाटनायें भी सामने आई हैं जबं गोतस्कर ने कार्रवाई में लगे पुलिस पर ही हमला कर दिया। उनकी हत्यायें भी हुईं हैं। इतना सब कुछ होते हुए भी यदि पुलिस प्रशासन ऐसे मामले को लेकर समय पर पूरी ताकत से सक्रिय नहीं हुई तो इसे क्या कहा जाए? यह सरकार और उसकी पुलिस को तमगा देने की भूमिका तो नहीं है। आप दूसरे को खलनायक बना दीजिए जबकि दोषी आप भी हैं।

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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