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बिना लाइट के ट्रैफिक में फंसा देश

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बिना लाइट के ट्रैफिक में फंसा देश
अवधेश कुमार
हमारा प्यारा देश भारत ऐसी स्थिति में फंसता चम रहा है जिस पर गहराई से विचार करने के बाद ऐसा लगता है मानो इससे निकल ही नहीं पाएगा। लगता है जैसे हमारा देश एक ऐसे चौराहे पर है जहां कोई ट्रैफिक सिग्नल नहीं और जो चाहे जिधर से निकलने की कोशिश कर रहा है, एक दूसरे से लड़ रहा है, टकरा रहा है…..जहां तक नजर आए अस्तव्यवस्तता का ऐसा ही नजारा…….ट्रैफिक संभालने वाला जितना संभव है स्थिति को संभालने में लगा है। यह समझ नहीं आ रहा कि वह सफल होगा या नहीं। एक स्वस्थ देश का लक्षण यह है कि वहां किसी मामले पर विवेक से प्रतिक्रियाएं आए, देशहित के मामलों पर सरकार और विपक्ष की आवाज एक हो, कठिन परिस्थिति में भी सरकार साहस के साथ जो सही हो, देशहित में हो वही करने की कोशिश करे यह न सोचे कि इससे विपक्ष हंगामा करने लगेगा, तात्कालिक बदनामी सहते हुए भी जो होना चाहिए वही करे, सुरक्षा के मामले पर एकता अखंडता के मामले पर बिल्कुल शत-प्रतिशत एकता दिखे….। वैसे तो एक पूर्ण स्वस्थ देश के लिए बहुत कुछ चाहिए, पर मोटा मोटी स्वस्थ देश का चरित्र इस न सबका समुच्चय हो सकता है। आप जरा दल निरपेक्ष होकर विचार करिए और आज के भारत की तस्वीर बनाइए। क्या ये लक्षण हमारे देश में हैं? अगर नहीं हैं तो फिर चाहे हम जितना दावा करें इसे संभाला नहीं गया तो फिर भविष्य को लेकर चिंता की लकीरें खींची रहेंगी।

अभी कश्मीर में एक आतंकवादी मारा गया। सैनिकों द्वारा उसका शव खींचकर लाने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। कश्मीर से लेकर देश में एक बड़े समूह ने ऐसा हंगामा मचाया मानो किसी महामानव के शव का अपमान हुआ है। आतंकवादी मरने के लिए ही आते हैं लेकिन मरने से पहले और बाद में वे कितना क्षति पहुंचा सकते हैं यह मुख्य लक्ष्य होता है। उनके शरीर में विस्फोटक लगे होते हैं। पहले ऐसा हुआ कि जब सैनिक उसके शव को उठाने लगे तो विस्फोट हो गया और कई मारे गए। उसके बाद से यह सामान्य नियम बन गया कि दूर से कोई रस्सी-जंजीर लगाकर शव को कुछ दूर खींचकर लाते हैं। यह पूरी दुनिया में होता है। लेकिन भारत के अलावा आपको कहीं कोई हंगामा सुनने को नहीं मिलेगा। मान लीजिए, नियम नहीं भी हो तो एक आतंकवादी, जो केवल खून बहाए विध्वंस करे, उसके शव के साथ कैसा बर्ताव होना चाहिए? उसके साथ एक ही बर्ताव होना चाहिए कि उसके शव को दूर कहीं जाकर फेंक दीजिए ताकि उसे चील, कौए, कुत्ते खाएं। उसे महसूस हो कि मरने पर दो गज जमीन नहीं मिलेगी। ऐसा होने लगे तो आतंकवाद काफी कम हो जाएगा। वो जन्नत में जाने के ख्वाब में आतंकवादी बनते हैं। उसके लिए दो गज जमीन में दफन होना जरुरी माना जाता है। जब उसके शव की यह दशा होगी तो वे ऐसा करने से भागेंगे। तुर्की में 17 वीं सदी में ऐसे ही आतंकवाद पैदा हो गया था। वहां के सैनिकों ने इनको मारकर शव को जानवरों, पक्षियों को खाने के लिए फंेंकना शुरु किया धीरे-धीरे आतंकवाद खत्म हो गया।

too many Zebra crossing and no one bother abou it..
one of the many in city one like this at Shivaji road.
Express Photo by Pavan Khengre. 27/12/10, Pune

लेकिन हमारे देश में ऐसे लोग हैं जिनको इससे मतलब कम है कि आतंकवाद खत्म हो, उनके सामने आतंकवादियों का मानवाधिकार सर्वोपरि है। आतंकवादियों का शव आप सौंप दीजिए और हजारों लोग उसके जनाजे में शामिल होकर भारत विरोधी नारे लगाएं ये इन्हें मंजूर है। यह एक उदाहरण है हमारे देश की आत्मघाती सोच का। अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को मारकर समुद्र में कहां दफना दिया किसी को नहीं मालूम। किसी अमेरिकी ने आवाज नहीं उठाई। संदिग्ध माओवादियों की गिरफ्तारी पर देख लीजिए क्या हो रहा है? कई पार्टियों के साथ कांग्रेस जैसी पार्टी उनके साथ आ गई है। उनकी पार्टी के वकील सबको बचाने में लगे हैं। पुलिस उनसे पूछताछ करने से पहले उच्चतम न्यायालय का चक्कर लगा रही है। जितने बड़े-बड़े वकील खड़े हैं उनके बाद इनका गिरफ्तार होना असंभव सा हो गया है। आप कैसे इस देश को माओवादी हिंसा को खत्म करेंगे, जब तक शहरों में उनको बौद्धिक खुराक से लेकर वित्तपोषण तक की व्यवस्था करने वाले विद्यमान हैं? इस तरह की आत्मघाती प्रकृति वाला देश दुनिया में आपको नहीं मिलेगा।
अब जरा दूसरी दिशा में मिलते हैं। इस समय बैंका का पैसा गबन करने का आरोप झेलने वाले भगोडों पर हंगामा मचा हुआ है। इनमें विजय माल्या ने लंदन से बयान दे दिया कि वो लंदन आने के पहले वित्त मंत्री अरुण जेटली से मिल था। देश में तूफान खड़ा है। उन पर माल्या को भगाने का आरोप लग रहा है। इस्तीफे की मांग हो रही है। जिस विजय माल्या को सब लोग चोर कह रहे थे वह अचानक सत्यवादी हो गया क्योंकि उसने सरकार के किसी मंत्री का नाम ले लिया। कल कोई दुश्मन देश हमारे यहां अशांति पैदा कराना चाहे तो उसे कुछ करना ही नहीं प्रधानमंत्री पर कुछ ऐसा आरोप लगा दे जो देशहित के विरुद्ध जाने वाला हो तो उनके खिलाफ पता नहीं कितना बड़ा तूफान खड़ा हो जाएगा। यह बहुत ही चिंताजनक स्थिति है। कोई संतुलन एवं विवेक से आचरण करने को तैयार ही नहीं है। इसका एक दूसरा पहलू भी है और महत्वपूर्ण है। जेटली कह रहे हैं कि माल्या राज्यसभा के सदस्य थे और जब मैं अपने कार्यालय में आ रहा था तो मेरे पीछे आए और कहा कि मैं सेट्लमेंट करना चाहता हूं, उनके हाथ में कुछ कागजात भी थे, मैने उनसे केवल इतना कहा कि आप बैंक से जाकर बात करिए। प्रश्न है कि विजय माल्या के यहां यदि बैंक का पैसा डूब रहा है तो सरकार का उद्देश्य उसे किसी तरह वापस कराने का होना चाहिए। आखिर वित्त मंत्री उनका पक्ष सुन लेते तो क्या हो जाता? मेरा मानना है कि माल्या का मामला आसानी से निपटाया जा सकता था। सरकार विपक्ष के हंगामे की चिंता किए बगैर हिम्मत के साथ उनसे बात करती, वित्त मंत्री स्वयं उसके सामने बैंक प्रतिनिधियों को बुलाते और समझौता का रास्ता निकल सकता था। मुझे याद है माल्या ने न्यायालय में बताया था कि बैंक बढ़ा-चढ़ाकर बता रहा है। मेरे यहां करीब 5 हजार करोड़ बनता है जो मैं किश्त में चुकान को तैयार हूं। यह सामान्य नियम है कि डूबते पैसे को पाने के लिए बैक कर्जदार के साथ बैठकर रास्ता निकालते हैं और ब्याज नहीं मिलने वाला है तो कई बार मूलधन से ही सेट्ल कर लेते हैं। माल्या पहले भी विदेश गया और उसे जब पूछताछ के लिए बुलाया गया आया। किंतु जब वातावरण मामला सुलझाने की जगह किसी को केवल परेशान करने का हो तो वह भागेगा ही। कौन नहीं जानता कि जिस यूनियन बिवरेज कंपनी को उसने खड़ा किया उसमें उसके ज्यादा शेयर लेकर उसे ही कंपनी से बाहर कर दिया गयां। क्या उसमें सरकार को दखल नहीं देना चाहिए था?

मेहुल चौकसी और नीरव मोदी का मामला भी देख लीजिए। मेहुल चौकसी का मामला बड़ा विचित्र है। उस पर मामला इसलिए दर्ज हुआ, क्योंकि बैंकोे के अनुसार वह नीरव मोदी का साझेदार था। यह भी नहीं देखा गया कि कब तक और किस कंपनी में साझेदार था। वह एक कंपनी में साझेदार था तथा वह साझेदारी भी 2000 में खत्म हो गई। कोई इतनी बड़ी संपत्ति छोड़कर विदेश नहीं भागेगा। उसका व्यापार देश के साथ विदेश तक था। उसके सारे शॉप, वर्कशॉप, कार्यालय सील हो गए, खाते फ्रीज कर दिए गए। कई हजार लोगांे को प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रोजगार उसकी कंपनी से मिलता था। उसके आभूषण निर्यात भी होते थे। सरकार को मोटा कर मिलता था। सब गया। हजारों लोग सड़कों पर आ गए। आज भी इस मामले को आसानी से निपटाया जा सकता है। किंतु इसे इतना बड़ा मुद्दा बना दिया गया है कि सरकार इसे छूना ही नहीं चाहती। सीबीआई, और प्रवर्तन निदेशालय की भूमिका समझौता कराने की है नहीं। ऐसे ही मामले में तो सरकार की पहचान होती है। उसका मामला सुलझ जाए तो यह भारत के हित में होगा। नीरव मोदी का मामला थोड़ा जटिल है। लेकिन वह भी बिगड़ा इसीलिए कि राजनीतिक नेतृत्व ने उसमें हाथ डालने की कोशिश तक नहीं की। हम यहां किसी को ईमानदारी का प्रमाण पत्र नहीं दे रहे। व्यवसाय करने और बैकों का उपयोग करने में न जाने इन्होंने कितनी बेइमानियां की होंगी। किंतु यहां प्रश्न दूसरा है। हमको अपना पैसा निकालना है और उनका व्यवसाय चल सकता है तो उसका रास्ता भी बनाना है। बैंक अधिकारी अपना गला बचाने के लिए कर्ज लेने वालों को खलनायक बना देते हैं। व्यवसाय जारी रखने वालों के यहां फंसे हुए कर्ज के अनेक ऐसे मामले हैं जिनमें मिल बैठकर रास्ता निकाला जा सकता था। बैंक व्यावहारिक रास्ता अपनाते तो कर्ज वापस आ सकता था और कर्जदार अपना व्यवसाय भी जारी रख सकता था। जिसका व्यापार रुक गया वह फिर से खड़ा कर सकता था। हां, कुछ मामले मंे समस्या है। किंतु किसी को जेल मेें डालने में हमारा हित है या उसके पास जो कुछ है उससे जितना हो सकता है कर्ज वापस करा लेने मंें? अगर वाजिब कारण से व्यवसाय डूबा है तो वैसे व्यक्ति को फिर से खड़ा होने का मौका भी मिलना चाहिए। एक स्वस्थ देश में तंत्र की भूमिका ऐसी ही होनी चाहिए। किंतु जहां ऐसे मामलों को राजनीति का हथियार बनाकर सरकार पर मिलीभगत का निराधार आरोप लगेगा और सरकार उस दबाव में आ जाएगी उस देश की दुर्दशा निश्चित है।
अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्पलेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

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