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फारूख अब्दुल्लाह को जब मोदी ने रिहा किया

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 फारुख की रिहाई का मतलब

अवधेश कुमार

जम्मू कश्मीर की पूरी राजनीति पिछले चार दशकों से उनके और बाद में मुफ्ती परिवार के ईद-गिर्द घूमती रही है। वे कह रहे हैं कि मैं जल्दबाजी में कोई राजनीतिक कदम नहीं उठाउंगा। हालात का जायजा लेने के बाद नए एजेंडे को सार्वजनिक करूंगा। संभव है आगे वे विपक्षी नेताओं से बातचीत के बाद धीरे-धीरे अपने रुख में बदलाव लाएं। हालांकि फारुख को पता है कि भाजपा विरोधी पार्टियों और नेताओ ने अवश्य उनकी रिहाई के लिए आवाज उठाई किंतु जम्मू कश्मीर की राजनीति में वे उनकी कोई सहायता नहीं कर सकते। आखिर उनको हिरासत में लिए जाने से लेकर पीएसए के तहत गिरफ्तारी को विपक्ष नहीं रोक सका।

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री व सांसद डॉ. फारूक अब्दुल्ला को हिरासत में लिए जाने तथा उन पर  जन सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) लगाने की जितनी व्यापक चर्चा हुई उतनी उनकी रिहाई की नहीं हो रही है। यही अंतर साबित करता है कि पांच अगस्त 2019 और मार्च 2020 में जम्मू कश्मीर और उसे लेकर देश का वातावरण काफी बदल चुका है। जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने तथा राज्य को विभाजित कर उसे केन्द्रशासित प्रदेश बनाते समय फारूक अब्दुल्ला को हिरासत में लिया गया था तथा 17 सितंबर 2019 को उन्हें पीएसए के तहत बंदी बनाया गया था। करीब साढ़े सात माह बाद रिहा होने को कई लोग चौंकाने वाली घटना कह रहे हैं। हालांकि रिहाई के बाद फारुख द्वारा वक्तव्य देने में बरती जा रही सतर्कता अवश्य चौंकाने वाली है। माना जा रहा था कि वो निकलने के बाद केन्द्र सरकार पर हमला करेंगे तथा कश्मीर को लेकर ऐसा बयान देंगे जिससे नए सिरे से राजनीति गरम होगी। किंतु उन्होंने केवल इतना कहा कि अब मैं आजाद हूं। राजनीति के बारे मंे पूछे गए सवाल पर उनका एक ही उत्तर था, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे नेताओं की रिहाई तक कोई राजनीतिक बातचीत नहीं होगी। विचार करने वाली बात है कि आखिर फारुख इतने संतुलित और संयमित रुख क्यों अपना रहे हैं? क्या इतने दिनों तक दुनिया से दूर रहने के बीच उन्होंने जम्मू कश्मीर के बदले हुए हालात से समझौता कर लिया है? या भविष्य में क्या किया जाए या किया जाना चाहिए इस प्रश्न को लेकर अभी उनके अंदर कोई निश्चयात्मक रुपरेखा नहीं है? या फिर किसी बात का भय है?

ये सारे प्रश्न स्वाभाविक ही उठ रहे हैं। फारुख अब्दुल्ला जम्मू कश्मीर के कोई सामान्य नेता नहीं। उनके परिवार का शासन सबसे ज्यादा समय तक रहा है। जम्मू कश्मीर की पूरी राजनीति पिछले चार दशकों से उनके और बाद में मुफ्ती परिवार के ईद-गिर्द घूमती रही है। वे कह रहे हैं कि मैं जल्दबाजी में कोई राजनीतिक कदम नहीं उठाउंगा। हालात का जायजा लेने के बाद नए एजेंडे को सार्वजनिक करूंगा। संभव है आगे वे विपक्षी नेताओं से बातचीत के बाद धीरे-धीरे अपने रुख में बदलाव लाएं। हालांकि फारुख को पता है कि भाजपा विरोधी पार्टियों और नेताओ ने अवश्य उनकी रिहाई के लिए आवाज उठाई किंतु जम्मू कश्मीर की राजनीति में वे उनकी कोई सहायता नहीं कर सकते। आखिर उनको हिरासत में लिए जाने से लेकर पीएसए के तहत गिरफ्तारी को विपक्ष नहीं रोक सका। ध्यान रखिए, उनकी रिहाई के पांच दिन पूर्व राकंपा अध्यक्ष शरद पवार, तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्षा ममता बनर्जी, माकपा प्रमुख सीता राम येचुरी समेत विपक्ष के प्रमुख नेताओं ने प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री को एक संयुक्त पत्र लिखकर जम्मू-कश्मीर के तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत प्रमुख राजनीतिक नेताओं की रिहाई का आग्रह किया था।

 यह मानना गलत होगा कि इस पत्र के आधार पर केन्द्र ने उनको रिहा किया है। कारण, इस पत्र में विपक्ष ने सरकार पर तीखे हमले भी किए थे। इसमें लिखा गया था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार में लोकतांत्रिक सहमति को आक्रामक प्रशासनिक कार्रवाई द्वारा दबाया जा रहा है। आगे कहा गया था कि इसमें संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के बुनियादी सिद्धांतों को जोखित में डाल दिया है तथा लोकतांत्रिक मानदंडों, नागरिकों के मौलिक अधिकारों और उनकी स्वतंत्रता पर हमले बढ़ रहे हैं। कोई भी सरकार इस तरह के आरोपों को तो स्वीकार करेगी नहीं। ये बातें उसी समय से कहीं जा रहीं हैं जब जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद वहां अनेक पाबंदियां लगाईं गईं, नेताओं को हिरासत में लिया गया, गिरफ्तार किया गया, नजरबंद किया गया तथा जेल में बंद अनेक कैदियों या हिरासतियों को प्रदेश से बाहर के जेलों में स्थानांतरित कर दिया गया। रॉ के पूर्व प्रमुख ए एस दुलत ने कहा है कि उन्होंने गृहमंत्रालय से अनुमति लेकर फारुख अब्दुल्ला से मुलाकात की थी। श्रीनगर उतरने के बाद इंटेलिजेंस के लोग ही हमें वहां तक ले गए। फारुख अब्दुल्ला ने मुझसे कहा कि मैं भारत के प्रति पूरी निष्ठा रखता हूं तथा अपने बच्चों को भी मैंने इसी तरह तैयार किया है। मेरे पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए। दुलत के अनुसार गृहमंत्रालय से मेरे पास फोन आया कि मुलाकात कैसी रही तो मैंने ये बातें बताईं। उनका कहना है कि इसी के बाद उनको रिहा करने का फैसला हुआ। दुलत के दावे पर कुछ भी कहना कठिन है, पर उन्होंने मुलाकात की, गृहमंत्रालय ने उनको अनुमति दी तथा बाद में उनसे संपर्क किया यह सच है। केन्द्र की ओर से कुछ समय पहले ही बयान आया था कि अब चूंकि जम्मू कश्मीर के हालात सामान्य हो रहे हैं इसलिए नेताओं को रिहा किया जाएगा। संभव है आने वाले समय में हालात की समीक्षा के बाद उमर अब्दुल्ला एवं मेहबूबा मुफ्ती सहित पीएसए के तहत बंदी प्रमुख नौ नेताओं को भी रिहा कर दिया जाए। केन्द्र सरकार पहले फारुख की रिहाई के प्रभाव का आकलन करेगी फिर ऐसा करेगी। उमर एवं मेहबूबा पर पहले पीएसए नहीं लगाया गया था। फारुख अब्दुल्ला पर पीएसए लगाने के 5 महीने बाद इन दोनों को इस कानून के तहत बंदी बनाया गया। इसका मूल कारण यही था कि इसके तहत सरकार को तीन महीने तक बिना किसी बाधा के बंदी बनाए रखने तथा दो वर्ष तक बिना मुकदमा चलाए उसे कायम रखने का कानूनी आधार मिल जाता है।

वैसे सरकार ने काफी पहले से जम्मू कश्मीर में लगी पाबंदियां खत्म करनी आरंभ कर दी थीं। आज के समय में लगभग सभी पाबंदियां खत्म हैं। गृह राज्यमंत्री जी. किशन रेड्डी ने पिछले दिनों राज्यसभा में कहा था कि 444 लोगों को हिरासत में लिया गया। उन्होंने बताया था कि सभी मामलों की एक-एक कर समीक्षा की जा रही है और एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर हिरासत अवधि बढ़ाने या छोड़ने का निर्णय लिया जा रहा है।ज्यादातर नेता रिहा हो चुके हैं। हालांकि कई महीनों तक जिन नेताओं व अन्य लोगों को रिहा किया गया उन सभी से एक बांड भरवाया गया। इस बांड में संबंधित लोगों ने कानून व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने में सहयोग का पूर्ण यकीन दिलाया। जिनने बांड नहीं भरा उन्हें रिहा नहीं किया गया। बाद में स्थिति बदलने पर धीरे-धीरे रिहाई की प्रक्रिया शुरु हुई। सज्जाद गनी लोन को रिहा तो किया गया लेकिन उन्हें घर में नजरबंद कर दिया गया। दरअसल, आरंभिक गिरफ्तारी या हिरासत में लिए जाने के पीछे मूल कारण यही था कि अगर ये बाहर रहे तो अशांति पैदा करेंगे। मेहबूबा ने तो कहा था कि अगर कश्मीर से 370 हटा तो यहां भारत का झंडा उठाने वाला कोई नहीं रहेगा। उमर अब्दुल्ला से लेकर फारुख अब्दुल्ला एवं अन्य नेताओं के बयान भी आक्रामक थे। इनका अपना जनाधार है, इसलिए सरकार ने किसी प्रकार का जोखिम लेने की बजाय पूरे प्रदेश में जिस पर भी किसी तरह विरोध या अशांति की आशंका थी सबको बंद कर दिया। यह बात और है कि कुछ समय बाद उनमें अलग-अलग नेताओं से कई माध्यमों से संवाद भी किया जाता रहा।

दरअसल, नरेन्द्र मोदी सरकार की नीति जम्मू कश्मीर की परंपरागत राजनीति को बदलने की है। इसलिए हर पार्टी के नेताओं से संपर्क बनाए रखने की की कोशिश हुई है। बीडीसी चुनाव में भाग लेेने के लिए लोग रिहा किए गए और चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस नीति का एक भाग प्रदेश से पारिवारिक राजनीति का कमजोर करना है। आम धारणा यही है कि चाहे अब्दुल्ला परिवार हो या मुफ्ती…दोनों अलगाववाद को बढ़ावा देते रहे हैं। दोनों का रिकॉर्ड केन्द्र को ब्लैकमेल करने का है। मुफ्ती परिवार खुलकर ऐसा करता था तो अब्दुल्ला दूसरे तरीके से। फारुख अब्दुल्ला की दिल्ली में भाषा कुछ और होती थी और घाटी में कुछ और। उनके अनेक बयान उद्धृत किए जा सकते हैं जिसमें वे पाकिस्तान की वकालत करते दिखते हैं। 25 नवंबर 2017 को तो उन्होंने एक बार कह दिया कि पाक अधिकृत कश्मीर इनके बाप का नहीं है। इससे पूरे देश में गुस्सा पैदा हुआ था। मोदी सरकार को इनको कमजोर करने में कितनी सफलता मिली है कहना कठिन है। पीडीपी टूट चुकी है। मेहबूबा के विश्वसनीय साथी माने जाने वाले अल्ताफ बुखारी ने जम्मू कश्मीर अपनी पार्टी नाम से पार्टी बना लिया है। तो घाटी में एक तीसरा बल खड़ा हुआ है। इसी तरह मुजफ्फर हुसैन बेग को भी सरकार ने विश्वास में लिया है। उन्हें पद्म से सम्मानित किया गया है। दूसरी, तीसरी, चौथी श्रेणी के नेताओं से व्यापक संपर्क किया गया है। जम्मू में भी भाजपा की कोशिश इन दोनों पार्टियों को तोड़ने की रही है और उसमें कुछ सफलता मिली है। फारुख अब्दुल्ला को रिहा करने के पीछे इन कारकों का भी योगदान है। आखिर सरकार को वहां राजनीतिक प्रक्रिया तो शुरु करना ही है। केन्द्रशासित प्रदेश होते हुए भी इन दो परिवारों के वर्चस्व वाली राजनीति वहां वापस न आए यही केन्द्र की कोशिश है। फारुख को भी कुछ अहसास तो है। इसीलिए वे पहले की तरह आक्रामक नहीं हैं। 

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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