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पाकिस्तान के रवैये से हम परेशान क्यों हों

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अवधेश कुमार

थोड़ी भी गहराई से देखें तो कूटनीतिक दृष्टि से हमें कोई क्षति नहीं। इस बार की बातचीत एवं संयुक्त वक्तव्य की विशेषता यह थी कि यह विन्दूवार थी, संक्षिप्त थी और सबसे बढ़कर मछुआरों को छोड़ने तथा धार्मिक यात्राओं को बढ़ावा देने के अलावा मुख्य मोर्चे पर जो कुछ करना है पाकिस्तान को करना है। हमारे जिम्मे कोई काम नहीं। बाचतीत का पूरा दारोमदार पाकिस्तान पर है। मुंबई हमले पर मुकदमा तेज उन्हें करना है, आरोपियों के आवाज के नमूने उन्हें देने है। अगर वे इससे पीछे हटते हैं तो इसका संदेश दुनिया में उनके संदर्भ में नकारात्मक जाएगा।

 

भारत में पाकिस्तान के रवैये पर जैसी प्रतिक्रिया सुनने को मिल रही है वह स्वाभाविक है। पाकिस्तान के बयानों से ऐसा लगता है कि 10 जुलाई की बातचीत से जो माहौल बना था, संयुक्त वक्तव्य से जो भावनाएं व्यक्त हुईं थीं, उसे एकबारगी तार-तार कर दिया गया है। पाकिस्तान से बातचीत के विरोधी एवं संयुक्त वक्तव्य की आलोचना करने वालों का वक्तव्य है कि हम तो पहले ही कह रहे थे कि यह नासमझी है, पाकिस्तान बदलने वाला नहीं है, उससे बातचीत या समझौते का कोई मतलब नहीं है। पहली नजर में उनकी बातें सही भी लगती हैं। आखिर नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ के बीच मुलाकात को तीन दिन भी नहीं बीते थे कि पाकिस्तान की ओर से ऐसी कई बातें कहीं गईं जिनसे लगने लगा कि उसका इरादा बातचीत कर समस्याओं का समाधान या रास्ते निकालने की जगह स्वयं को यह साबित करना है कि हमें भारत को कूटनीति घेरे में फंसा देना है।

कश्मीर के एजेंडे में शामिल हुए बगैर बातचीत नहीं हो सकती। भारत से मुंबई हमलों पर और सबूत चाहिए। जितना सबूत दिया गया वह पर्याप्त नहीं है। मुकदमा तभी आगे बढ़ेगा जब हमें और सबूत मिलेंगे। जले पर नमक यह कि समझौता एक्सप्रेस विस्फोट से जुड़ी सूचनाएं साझा करे। ये तीनों बातें कहने वाले और कोई नहीं नवाज शरीफ के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज हैं जो स्वयं मोदी नवाज वार्ता में शामिल थे और जिन्होंने उफा में बयान दिया था कि दोनों देशों ने माना है कि आपसी बातचीत से रास्ता निकालना है, कश्मीर सियाचीन और सरक्रीक जैसे मुद्दों को बैक चैलन डिप्लोमेसी के लिए छोड़ दिया जाए

पाकिस्तान की ओर से मुख्यतः पांच बयान आए। एक, कश्मीर के एजेंडे में शामिल हुए बगैर बातचीत नहीं हो सकती। दो, भारत से मुंबई हमलों पर और सबूत चाहिए। जितना सबूत दिया गया वह पर्याप्त नहीं है। मुकदमा तभी आगे बढ़ेगा जब हमें और सबूत मिलेंगे। जले पर नमक यह कि समझौता एक्सप्रेस विस्फोट से जुड़ी सूचनाएं साझा करे। ये तीनों बातें कहने वाले और कोई नहीं नवाज शरीफ के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज हैं जो स्वयं मोदी नवाज वार्ता में शामिल थे और जिन्होंने उफा में बयान दिया था कि दोनों देशों ने माना है कि आपसी बातचीत से रास्ता निकालना है, कश्मीर सियाचीन और सरक्रीक जैसे मुद्दों को बैक चैलन डिप्लोमेसी के लिए छोड़ दिया जाए तथा जब निश्चित समझौत की स्थिति बने तब घोषणा की जाए। ये बातें आईं हीं थी कि भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त ने 21 जुलाई को ईद-मिलन के लिए हुर्रियत नेताओं को आमंत्रित किया और बयान दिया कि उनके साथ हमारे संबंधी अटूट हैं। हम उन्हें हर प्रकार का राजनीतिक कूटनीतिक समर्थन देते रहेंगे। भारत ने पाकिस्तान से एक वर्ष पहले इसी आधार पर बातचीत रद्द कर दिया था कि अगर आपको हुर्यित से बात करनी है तो उन्हीं से करिए। इसके पहले के दो दिनों में मुंबई हमले के सूत्रधार लश्कर ए तैयबा के कमांडर जकीउर रहमान लखवी के आवाज के नमूने के संबंध में एक बयान उसके वकील का था कि हमारे मुवक्किल ने पहले भी आवाज के नमूने देने से इन्कार किया था और आगे भी करेंगे। ऐसा कोई कानून नहीं जो आवाज देने के लिए मजबूर करे। उसके वकील का बयान तो समझ में आता है, पर पाकिस्तान सरकार की ओर से मुंबई हमले के आरोपियों के खिलाफ पैरवी करने वाले सरकारी वकील ने भी कह दिया कि हमने पहले भी कोर्ट से इसकी अनुमति मांगी थी, लेकिन नहीं मिली। हम आगे इसके लिए अपील नहीं करेंगे। उफा के संयुक्त वक्तव्य में यह शामिल है कि मुंबई हमलों के मामलों की सुनवाई तेज की जाएगी एवं आरोपियों के आवाज के नमूने भारत को दिए जाएंगे ताकि मिलान की जा सके। इन बयानों से यह साझा वक्तव्य एवं पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की वचनबद्धता मिनट में खत्म हो जाती है।

क्या यह मान लें कि उफा में दोनों प्रधानमंत्रियों की जो 55 मिनट की बातचीत हुई एवं साझा वक्तव्य जारी हुआ वह सब व्यर्थ था? क्या बातचीत की गाड़ी चल निकलने की जो संभावना बनी थी वह फिर से जहां की तहां रुक गई? कूटनीति खासकर पाकिस्तान के संदर्भ में इस तरह के सीधे प्रश्नों का इतना ही स्पष्ट एवं सीधा उत्तर देना ठीक नहीं होगा। पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज अगर कहते हैं कि कश्मीर पर बातचीत के बिना किसी दूसरे मसले पर बातचीत मुमकिन नहीं है, हम अभी भी पुराने मसलों पर ही खड़े हैं, दोनों देशों के बीच तनाव कम करने के लिए मोदी-नवाज की मुलाकात अच्छी शुरुआत है, लेकिन हम अपने उसूलों और इज्जत से समझौता नहीं कर सकते तो उसका अर्थ यह नहीं है कि 55 मिनट की बातचीत, उस बातचीत के पहले के प्रयासों, बातचीत के बाद साझा वक्तव्य पर सहमति आदि व्यर्थ हो गए।

 

प्रश्न है कि पाकिस्तान से आ रहे इन बयानों को हम किस तरह लें? क्या यह मान लें कि उफा में दोनों प्रधानमंत्रियों की जो 55 मिनट की बातचीत हुई, फिर दोनों विदेश सचिवों ने बात की एवं साझा वक्तव्य जारी हुआ वह सब व्यर्थ था? भारत ने जल्दबाजी कर दी? या भारत ने पाकिस्तान को समझने में फिर एक बार गलती कर दी? क्या बातचीत की गाड़ी चल निकलने की जो संभावना बनी थी वह फिर से जहां की तहां रुक गई? कूटनीति खासकर पाकिस्तान के संदर्भ में इस तरह के सीधे प्रश्नों का इतना ही स्पष्ट एवं सीधा उत्तर देना ठीक नहीं होगा। पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज अगर कहते हैं कि कश्मीर पर बातचीत के बिना किसी दूसरे मसले पर बातचीत मुमकिन नहीं है, हम अभी भी पुराने मसलों पर ही खड़े हैं, दोनों देशों के बीच तनाव कम करने के लिए मोदी-नवाज की मुलाकात अच्छी शुरुआत है, लेकिन हम अपने उसूलों और इज्जत से समझौता नहीं कर सकते तो उसका अर्थ यह नहीं है कि 55 मिनट की बातचीत, उस बातचीत के पहले के प्रयासों, बातचीत के बाद साझा वक्तव्य पर सहमति आदि व्यर्थ हो गए। संयुक्त वक्तव्य में लंबे समय बाद कश्मीर का जिक्र न होने से पाकिस्तान के अंदर नवाज शरीफ के खिलाफ जो माहौल बना था, जिस तरह से विरोधी, मीडिया का एक वर्ग उन पर भारत के सामने अपना हित गिरवी रख देने, मोदी के सामने झुकने आदि का आरोप लग रहा था उसमें राजनीतिक जोखिम से बचने के लिए कुछ न कुछ ऐसा बोलना आवश्यक था। इसलिए वो अपने देश के अंदर के माहौल के अनुसार बोल रहे हैैं। दूसरे, यह मान लेना नादानी और नासमझी दोनो होगी कि पाकिस्तान कश्मीर पर रुख बदल लेगा, वह हुर्रियत का परित्याग कर देगा, कश्मीर में हमला करने वालों को मुजाहीद्दीन कहना बंद कर देगा, मुंबई हमले के आरोपियों को तुरत पकड़कर फिर से जेल में डालेगा एवं इस तरह मामले चलाएगा कि उनको उनको सजा मिले।

इसलिए पाकिस्तान की ओर से जो बयान आ रहे है उन्हें अनपेक्षित नहीं माना जाना चाहिए। वहां की दूसरी राजनीतिक पार्टियां, कट्टरपंथी संगठन के साथ सेना की सोच की भारत संबंधी विदेश नीति में बड़ी भूमिका है। वैसे भी जो देश स्वयं आतंकवाद से पस्त हो गया है वह दूसरे की इसमें क्या मदद कर सकता है? पाकिस्तान 18 फरवरी 2007 को हुए समझौता रेल विस्फोट का मामला अनर्गल तरीके से उठा रहा है। मुंबई में पाकिस्तान से आकर आतंकवादियों ने हमला किया था, उसकी पूरी योजना वहां बनी, आतंकवादियेां का प्रशिक्षण वहां हुआ, हमले के दौरान उनको निर्देश भी वहीं से दिए जाते रहे। उससे समझौता विस्फोट की तुलना है ही नहीं। यह तो भारत में हुआ हमला है, जिसमें छानबीन एवं मुकदमा चल रहा है। लेकिन वह ऐसा करेगा। अब हमें तय करना है कि हम कैसे इन सबको लेते हैं, इस पर प्रतिक्रिया कैसे देते हैं। मोदी सरकार की ओर से विदेश सचिव की प्रेस वार्ता के बाद कोई बयान नहंीं दिया गया है और यह उचित है। हां, भाजपा के प्रवक्ता एम जे अकबर ने अवश्य उतावलापन में इसे ऐतिहासिक साबित कर दिया था।

यह मान लेना नादानी और नासमझी दोनो होगी कि पाकिस्तान कश्मीर पर रुख बदल लेगा, वह हुर्रियत का परित्याग कर देगा, कश्मीर में हमला करने वालों को मुजाहीद्दीन कहना बंद कर देगा, मुंबई हमले के आरोपियों को तुरत पकड़कर फिर से जेल में डालेगा एवं इस तरह मामले चलाएगा कि उनको उनको सजा मिले।

अगर थोड़ी भी गहराई से देखें तो कूटनीतिक दृष्टि से हमें कोई क्षति नहीं। इस बार की बातचीत एवं संयुक्त वक्तव्य की विशेषता यह थी कि यह विन्दूवार थी, संक्षिप्त थी और सबसे बढ़कर मछुआरों को छोड़ने तथा धार्मिक यात्राओं को बढ़ावा देने के अलावा मुख्य मोर्चे पर जो कुछ करना है पाकिस्तान को करना है। हमारे जिम्मे कोई काम नहीं। बाचतीत का पूरा दारोमदार पाकिस्तान पर है। मुंबई हमले पर मुकदमा तेज उन्हें करना है, आरोपियों के आवाज के नमूने उन्हें देने है। अगर वे इससे पीछे हटते हैं तो इसका संदेश दुनिया में उनके संदर्भ में नकारात्मक जाएगा। कई देशों के नागरिक मुंबई हमले में मारे गए थे। सबकी नजर पाकिस्तान के रवैये पर है। इसमें पाकिस्तान नंगा होगा। इसके बाद भारत दुनिया के सामने यह कहने की स्थिति में होगा कि हमने तो अपनी ओर से पूरी कोशिश की, शांति, सद्भाव एवं संबंध बेहतर करने की, पर पाकिस्तान का रवैया देख लीजिए। बातचीत में सहमति और पाकिस्तान वापस जाते ही बयान और रवैये बदल गया।

इसलिए पाकिस्तान की ओर से जो भी बयान आएं, हमें अपना सार्वजनिक रुख नहीं बदलना है। आगे भी संयुक्त वक्तव्य के अनुरुप हमें कदम आगे बढ़ना है। सुरक्षा सलहकारों की बातचीत होनी है। इसमें तो आतंकवाद ही मुख्य मुद्दा होगा, कश्मीर तो इसमें आएगा नहीं। बीएसफ यां पाक रेंजर्स के डिजी या डिजीएमओ की सांस्थानिक वार्ता मंें सीमा पर गोलीबारी रुकने के तौर तरीकों पर बात होनी है। इसमें हमारे लिए खोने तो कुछ है नहीं।  पाकिस्तान अगर आगे नहीं आता है तो कोई क्षति नहीं, क्योंकि हम सुरक्षा मामले पर ढील देने नहीं जा रहे। सीमा एवं नियंत्रण रेखा पर नए समझौते के बगैर सीमा सुरक्षा बल को कार्रवाई करने की स्वतंत्रता का निर्देश जारी है। पाकिस्तान नहीं मानता है तो हम अपने अनुसार कार्रवाई के लिए स्वतंत्र होंगे। हां, भारत को आगे के लिए निश्चित नीति बनाकर रखनी होगी कि अगर पाकिस्तान ने समझौते के अनुरुप कुछ काम किया तो हमें क्या करना है और नहीं किया तो हमें कैसा रुख अपनाना है। लेकिन इससे प्रधानमंत्री मोदी दक्षेस सम्मेलन में भाग लेने पाकिस्तान न जाने का फैसला कर लें यह विचार आज स्वीकारने योग्य नहीं। अगर वैसी परिस्थिति आई और पाकिस्तान के शासन ने बिल्कुल भारत के प्रतिकूल रुख अपनाया तो फिर वह भी हो सकता है। 2005 में मनमोहन सिंह ने ढाका दक्षेस सम्मेलन की यात्रा बंगलादेश सरकार की भारत विरोधी रवैये के कारण रद्द कर दिया था। किंतु इस समय ऐसी स्थिति नहीं आई थी। पाकिस्तान अपने देश को समझाने के लिए जो भी बयान दे, अगर वह व्यवहार में संयुक्त बयान पर आगे बढ़ता है तो हमें बढ़ना चाहिए।

Pak Bharat FS press meet Ufa 10 July 2015

पाकिस्तान अगर आगे नहीं आता है तो कोई क्षति नहीं, क्योंकि हम सुरक्षा मामले पर ढील देने नहीं जा रहे। सीमा एवं नियंत्रण रेखा पर नए समझौते के बगैर सीमा सुरक्षा बल को कार्रवाई करने की स्वतंत्रता का निर्देश जारी है। पाकिस्तान नहीं मानता है तो हम अपने अनुसार कार्रवाई के लिए स्वतंत्र होंगे। हां, भारत को आगे के लिए निश्चित नीति बनाकर रखनी होगी कि अगर पाकिस्तान ने समझौते के अनुरुप कुछ काम किया तो हमें क्या करना है और नहीं किया तो हमें कैसा रुख अपनाना है।

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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