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जब कांग्रेस ने अर्नब गोस्वामी पर किए सैंकड़ो मुकदमे

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भय पैदा कर पत्रकारों का मुंह बंद करने की रणनीति

अवधेश कुमार

जब हम समाचार लिखते या बोलते हैं तो हम विचार देने से बचते हैं। हालांकि अगर सामाचार विश्लेषण करते हैं तो वहां सीमित मात्रा में विचार आ जाता है। पर जहां विचार प्रस्तुत करना है, बहस करनी है वहां तो हर पत्रकार को उसी तरह अपना राजनीतिक मत रखने का अधिकार है जैसे किसी अन्य को। अगर किसी पत्रकार को लगता है कि कोई पार्टी या सरकार गलत दिशा में जा रही है, उसके नेताओं का आचरण सही नहीं है तो वह उसे प्रखरता से उठाएगा। पार्टी एवं नेताओं की तीखी आलोचना करेगा। इसी तरह उसे लगता है कि कोई पार्टी या सरकार अच्छा काम कर रहा है तो वह प्रशंसा करेगा। अगर अर्नब गोस्वामी के मत में कांग्रेस और उसका प्रथम परिवार तथा अन्य नेता गलत हैं तो इसे रखने का उनको पूरा अधिकार है।

कांग्रेस बनाम अर्नब गोस्वामी और रिपब्लिक मीडिया मामले में जिस तरह पूरा देश आलोड़ित हुआ वैसा पहले नहीं देखा गया। पत्रकारों पर पहले भी मुकदमे हुए, उनको गिरफ्तार कर यातनाएं दी गईं, उनके परिवारों को परेशान किया गया, अनेकों की हत्याएं भी हुईं, लेकिन ऐसा संभवतः पहली बार हुआ है कि एक पार्टी बाजाब्ता खुल्लमखल्ला किसी पत्रकार के खिलाफ आपराधिक मामलों में अलग-अलग राज्यों में कई सौ की संख्या प्राथमिकी दर्ज करा रही हो तथा न्यायालय में मामला भी। अर्नब के खिलाफ कांग्रेस शासित राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब, महाराष्ट्र, झारखंड के अलावा तेलांगना एवं जम्मू कश्मीर में प्राथमिकी पार्टी के नेताओं द्वारा दर्ज कराई गई। कुल मिलाकर पूरी रणनीति ऐसी थी कि चारों ओर से पुलिस उनको गिरफ्तार करने पहुंचे, एक जगह गिरफ्तारी हो और जमानत मिले तो दूसरी जगह गिरफ्तार हो जाएं। यह सिलसिला बनाए रखने का पूरा इंतजाम किया गया। यह नहीं कहा जा सकता कि बिना केन्द्रीय नेतृत्व की सहमति के पार्टी में चारों ओर बड़े-बड़े नेता मुकदमा दर्ज कराने लगें। हालांकि , उच्चतम न्यायालय ने अर्नब को राहत दे दिया है। सारे मामले पर स्थगनादेश मिल गया, नागपुर के मामले को मुंबई स्थानांतरित करने का आदेश हुआ तथा तीन सप्ताह तक उनके खिलाफ किसी कार्रवाई पर रोक रहेगी। इस तरह कांग्रेस की पूरी कुटिल रणनीति तत्काल विफल हो गई। इस बीच वे जमानत के लिए आवेदन कर सकेंगे और ज्यादा संभावना इसी बात की है कि उनको जमानत मिल जाए। इस तरह की राहत सामान्य बात नहीं है, क्योंकि न्यायालय में कांग्रेस के दिग्गज वकीलों की फौज खड़ी थी। वे सब घाघ हैं, पर हरीश साल्वे एवं मुकुल रोहतगी की टीम की दलीलांे के सामने वे सफल नहीं हो सके। हालांकि इसे अंतिम आदेश नहीं मानना चाहिए। संभव है आगे वे कुछ नई अपील के साथ आ जाएं। यदि पार्टी में उच्च स्तर पर यह तय हुआ है कि रिपब्लिक मीडिया एवं अर्नब को सबक सिखाना है तो वे अपने तईं हर संभव कोशिश करेंगे। मुंबई पुलिस ने उच्च्तम न्यायालय के आदेश के बावजूद 12 घंटों में पूछताछ का दो नोटिस दिया और अर्नब के पुलिस थाने पहुंचने पर 12 घंटे 30 मिनट तक पूछताछ हुई।

इस मामले में ऐसा क्या था जिससे इतनी लंबी पूछताछ की आवश्यकता हो? बहरहाल,  इस मामले ने लोकतंत्र के अंदर पत्रकारिता और राजनीतिक दलों की भूमिका, दोनों के अंतर्सबंध, एक दूसरे के प्रति व्यवहार आदि को फिर से बहस में ला दिया है। देश का संविधान हर व्यक्ति को कुछ निश्चित सीमा के साथ अभिव्यक्ति का अधिकार देता है। पत्रकार भी नागरिक है। हालांकि पत्रकारों के लिए संविधान में कोई अलग से व्यवस्था नहीं है। जन ,सूचना, जन शिक्षण, राजनीतिक दलों को मर्यादा में रहने तथा जन सेवा की मूल अवधारणा से आवद्ध रखने के लिए काम करने की भूमिका के कारण पत्रकारिता का दायित्व बढ़ जाता है। कहीं संविधान में नहीे लिखा है कि हमें राजनीति को इस तरह दबाव में रखना है कि वो लोकतांत्रिक आचरण तथा जन हित से बाहर जाने से बचें, पर हमारी भूमिका में वो है। जब हम समाचार लिखते या बोलते हैं तो हम विचार देने से बचते हैं। हालांकि अगर सामाचार विश्लेषण करते हैं तो वहां सीमित मात्रा में विचार आ जाता है। पर जहां विचार प्रस्तुत करना है, बहस करनी है वहां तो हर पत्रकार को उसी तरह अपना राजनीतिक मत रखने का अधिकार है जैसे किसी अन्य को। अगर किसी पत्रकार को लगता है कि कोई पार्टी या सरकार गलत दिशा में जा रही है, उसके नेताओं का आचरण सही नहीं है तो वह उसे प्रखरता से उठाएगा। पार्टी एवं नेताओं की तीखी आलोचना करेगा। इसी तरह उसे लगता है कि कोई पार्टी या सरकार अच्छा काम कर रहा है तो वह प्रशंसा करेगा। अगर अर्नब गोस्वामी के मत में कांग्रेस और उसका प्रथम परिवार तथा अन्य नेता गलत हैं तो इसे रखने का उनको पूरा अधिकार है। हर पत्रकार के बात रखने, शब्द प्रयोग करने का अपना तरीका है। वैसे पालघर में साधुओं की योजनापूर्वक हुई हत्या के बाद कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी पार्टियांे ने जैसी शर्मनाक चुप्पी साधी उससे पूरे देश में गुस्सा बढ़ा। इसको अभिव्यक्त करना भी पत्रकार के नाते हमारी भूमिका है। आईना दिखाने का दायित्व भी हमारा है। जब किसी मुसलमान की भीड़ द्वारा हत्या होती है तो सोनिया गांधी से लेकर, राहुल, प्रियंका और कांग्रेस के अन्य नेता हाहाकार मचा देते हैं, बिना जाचं के भाजपा और आरएसस को अपराधी साबित कर देते हैं। ऐसा ही रवैया अनेक पार्टियों, पत्रकारों के एक तबके, बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, एनजीओ एक्टििवस्टो, लीगल एक्टिविस्टों का रहता है। लेकिन जब किसी हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख्ख और उसमें भी भगवाधारी साधू-संत-संन्यासी की हत्या कर दी जाए तो इनके मुंह में दही जम जाता है। यह अजीब किस्म का सेक्यूलरवाद भारत में है जहां हत्या भी मजहब के नजरिए से देखा जाता है। अगर अर्नब गोस्वामी ने यह प्रश्न उठाया और सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका बाड्रा पर तीखे प्रहार किए तो इसमें गलत क्या है? हम सब लोगों ने अपने-अपने तरीेके से इस पहलू को उठाया है।

तब भी यदि कांग्रेस को आपत्ति थी तो उसका लोकतांत्रिक तरीका यही है कि आप पत्रकार वार्ता बुलाकर उसमें विरोध दर्ज करा सकते थे, लौकडाउन में सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखते हुए वैधानिक और अहिंसक विरोध का कोई रास्ता अपनाया जा सकता था। मानहानि का भी मुकदमा किया जा सकता था। लेकिन इस तरह देश भर में मुकदमा दर्ज करने का अर्थ है कि आप ,आतंकित कर पत्रकार का मुंह बंद कराना चाहते हैं। आपका यह भी उद्देश्य हो सकता है कि अगर अर्नब जैसे शक्तिशाली पत्रकार को कानूनी रुप से परेशान कर दिया, या कुछ दिनों जेल में रहने को मजबूर कर दिया तो मीडिया के दूसर घराने भय से ही तीखी आलोचना से बचेंगे। संसदीय लोकतंत्र में किसी पार्टी की यही सोच भयानक है और डर पैदा करती है। यह न केवल अलोकतांत्रिक, अनैतिक, अधिनायकवादी, फासीवादी सोच और व्यवहार का पर्याय है। पत्रकारों और प्रेस के प्रति हम कांग्रेस के ऐसे कई कदमों को यहां उदाहरण के रुप में प्रस्तुत कर सकते हैं जब उसने हमारी आजादी की गला घोंटने की कोशिश की और उसमें विफल हुए। यह तो देश का दुर्भाग्य है कि पत्रकारों में वैचारिक तौर पर इतने तीखे विभाजन हो गए हैं कि राष्ट्रवादी सोच वालो के साथ स्वनामधन्य पत्रकारिता के पुरोधा, एडिटर्स गिल्ड, प्रेस क्लब कोई खड़ा नहीं होता। आप देख लीजिए, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देने वाले इन पत्रकारों ने एक ट्वीट तक इसके विरोध में नहीं किया। जिनने किया वो भी इनकी नजर में घृणा के पात्र हैं। लेकिन यह एक लड़ाई जिसे हमें लड़ना ही होगा। पत्रकारों की स्वतंत्रता के नाम पर जो पाखंड देश मेें कायम कर दिया गया है उस पर प्रहार करना ही होगा। विचारों में अंतर हो सकता है लेकिन कोई पार्टी योजनाबद्ध तरीके से राज्य दर राज्य किसी पत्रकार के खिलाफ मुकदमा करे और पत्रकार बिरादरी एक स्वर में सामने न आए इससे बड़ा पाप और अपराध कुछ नहीं हो सकता।

कांग्रेस के अंदर किस तरह का वातावरण बना है कि प्रदेश सरकार के मंत्री और अध्यक्ष तक प्राथमिकी दर्ज करा रहे हैं। मानहानि का मुकदमा दायर करते तो समझ में आता लेकिन आपराधिक मामलों में मुकदमा दर्ज कराना कैसे राजनीतिक व्यवहार का प्रमाण है? केवल छत्तीसगढ़ में 103 मुकदमे हुए। कुल मिलाकर कितने युवा कांग्रेस के जिन दो नेताओं ने अर्नब और उनकी पत्नी को पीछा कर हमला करने या काली स्याही फंेकने की कोशिश की उसके बारे में कहा जा रहा है कि उसे सोनिया, राहुल या प्रियंका ने तो कहा नहीं होगा। मूल बात है पार्टी के अंदर के वातावरण का। अंदर जब यह माहौल बना दिया गया हो सोनिया जी, राहुल जी और प्रियंका जी अर्नब एवं रिपब्लिक को सबक सिखाना चाहते हैं तो फिर ऐसे लोग हमले की कोशिश करेंगें। इसलिए कांग्रेस नेतृत्व इससे अपने को बरी नही ंकर सकता। यहां विचार करने वाली बात यह भी है कि अर्नब समर्थ हैं तो उनके लिए उच्चतम न्ययालय में बड़े वकील खड़े हो गए। अगर छोटे और कम सामर्थ्य वाले पत्रकारों के साथ ऐसा हो तो उनका क्या होगा? इसलिए ऐसे आचरण का जितना संभव है विरोध किया जाएगा।

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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