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क्या ऐसी मीडिया और पत्रकारिता से हमें डर नहीं लगना चाहिए

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मणिपुर का इतना बड़ा आतंकवादी हमला बहस का विषय नहीं
अवधेश कुमार
मणिपुर में इतना बड़ा आतंकवादी हमला हुआ जिसमें एक साथ 20 सुरक्षाकर्मी मारे गए एवं 12 घायल अस्पताल में पड़े हैं, लेकिन आप देख लीजिए हमारी चर्चा में वह विषय है ही नहीं। जिन नेताओं की हम आलोचना करते हैं उनने तो इसकी आलोचना की। प्रधानमंत्री ने तुरत ट्विट कर बयान दिया और सभी शहीद सुरक्षा बलों को श्रद्धांजलि दी। केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने उच्चतम स्तरीय बैठक की जिसमें रक्षा मंत्री , राष्ट्रीय सुरक्षा सलहकार सेना प्रमुख उपस्थित थे। घटना का विश्लेषण किया गया एवं आगे के कदमों विचार करके उसके अनुसार कार्रवाई की जा रही है। पर मीडिया के लिए यह बहस या चर्चा का विषय नहीं रहा।
क्या 20 सुरक्षा कर्मियों का इस तरह मारा जाना, एक दर्जन का घायल होना राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है? पूर्वोत्तर में हाल के वर्षों की यह सबसे बड़ी घटना है। इतनी संख्या में सुरक्षाकर्मी कब मारे गए वह शायद ही किसी की स्मृति मंे हो। तो क्या पूर्वोत्तर वाकई हमारे लिए उपेक्षित है? या वहां से टीआरपी नहीं आता, इसलिए बहस कराकर क्या पाएंगे? अगर मानसिकता यह है तो अत्यंत ही डरावनी है। मीडिया की संपादकीय सामग्री और विषय तय करने वाले पता नहीं कैसे भूल रहे हैं कि इन घटनाओं में पूरे देश की रुचि है। आप इस पर ठीक से बहस कराएंगे, पूरा परिप्रेक्ष्य लाएंगे तो पूरा देश उसे सुनेगा। यानी इससे भी टीआरपी आएगी।
फिर इस देश का नागरिक होने के नाते भी हमारा कुछ दायित्व है। पत्रकार होने के नाते तो है ही। पूर्वोत्तर की उपेक्षा की बात पत्रकार ही उठाते हैं और जब समय आता है तो वे चूक जाते हैं। इसलिए उस क्षेत्र के लोगों के अंदर स्वयं को दोयम दर्जे का नागरिक मानने का भाव पैदा होता है। इस भाव को तोड़ना, ऐसी आतंकवादी घटनाओं में उनके साथ खड़ा होते दिखना, आतंकवाद का नकार करना तथा इस त्रासदीपूर्ण घटना के प्रसंग से पूर्वोत्तर के उग्रवाद के प्रति पूरे देश की चेतना जागृत करना…..मीडिया की सर्वप्रमुख भूमिका होनी चाहिए। पत्रकारिता यही तो है।
निस्संदेह, आज मीडिया यानी सामचार चैनलों के आचरण ने एक साथ हम सबको कठघरे में खड़ा कर दिया है। हमारे ही एक भाग मणिपुर में आतंकवादियों ने कोहराम मचा दिया और हमारे लिए वह सुर्खियां पाने वाली खबर ही नहीं। हमारे लिए वह बहस का विषय ही नहीं है। हमारे लिए वह बस कुछ पंक्तियों में समाचार के रुप में निपटा देने वाली घटना मात्र है। क्यों? इसका क्या अर्थ लगाया जाए? क्या चैनलों की पत्रकारिता दिशाभ्रम का शिकार है? क्या वहां संपादकीय निर्णय करने वालों में समझ और संवेदना का अभाव है? क्या वे पूर्वोत्तर के हमारे लिए सामरिक और सांस्कृतक महत्व को नहीं जानते? क्या टीआरपी के दबाव में वे इतने दबे हुए हैं कि उससे बाहर कुछ सोच ही नहीं सकते। क्या टीआरपी के बारे में भी इनकी समझ गलत है? क्या वे यह समझ नहीं पाते कि ठीक तरीके से समग्रता में और जितनी बड़ी यह आतंकवादी कार्रवाई थी उसके पूरे परिप्रेक्ष्य में यदि इस पर चर्चा बहस हो तो उसमें भी नंबर आएगा यानी टीआरपी मिलेगा?
अगर इन सबका उत्तर है, हां तो फिर बताने की आवश्यकता नहीं कि हमारी पत्रकारिता कहां जा रही है। इनमें से कुछ का भी उत्तर हैं तो फिर उसका अभिप्राय भी हम आसानी से समझ सकते हैं। तो यह वाकई एक डरावनी स्थिति है। संचार और सूचना से प्रभावित होने वाले इस युग में यदि जिनको सूचना और विचार हम तक पहुंचाना है उन्हें ही अपने दायित्वों का अपने पेशे का, घटनाओं के महत्व का तथा उसके परिप्रेक्ष्य की समझ नहीं फिर डर तो हमें लगना ही चाहिए।

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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