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कोरोना के देवदूत – by Awadhesh Kumar

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 देवता का एक अर्थ देने वाला होता है। सामान्य अर्थ में देवदूत का अर्थ होता है देवता का संदेश मनुष्य तक पहुंचाने वाला। इस्लाम और ईसाइयत में भी इसकी परिकल्पना है। कोरोना कोविड 19 प्रकोप के दौरान हम देवदूतों के रुप में किसे देख सकते हैं? अगर केवल देने के अर्थ में लिया जाए तो आज देवदूत वही है जो केवल कुछ न कुछ दे रहा है। भारत का आम बौद्धिक और राजनीतिक वातावरण इतने नकारात्मक तत्वों से भर दिया गया है कि समाज में बहती सकारात्मकता की प्रबल धाराएं भी उस शोर में कई बार दिखाई नहीं देती। ऐसा लगता है जैसे सारे लोग स्वार्थों के वशीभूत ही कोई काम करते हैं। किंतु हमारे देश में आज भी निजी, सामाजिक, पेशागत, धार्मिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक….संगठनों में ऐसे की संख्या काफी ज्यादा है जो हर संकट के समय देवदूत की परिभाषा पर खरे उतर जाते हैं। आप नजर दौड़ाएंगे तो पूरे कोरोना संकट के बीच ऐसे देवदूतों की भूमिका आपको दिखाई देगा।  

राजनीति के बारे में हमने बिल्कुल नकारात्मक धारणा बना दी है, पर आप उनके योगदान को नकार नहीं सकतें। इस समय सारे मुख्यमंत्री देवदूत की तरह अपनी जनता की सुरक्षा, उनके बचाव, उपचार तथा गरीबों को राहत और सांत्वना देने में लगे हैं। आप यह तो कह सकते हैं कि कुछ मुख्यमंत्री बेहतर काम कर रहे हैं लेकिन यह नहीं कह सकते कि कोई समय की मांग के बिल्कुल उलट भूमिका निभा रहा है। इसलिए सरकारों के संदर्भ में देवदूत के स्तरों पर हमें राज्यों के मुख्यमंत्रियों को रखना पड़ेगा। इस संदर्भ में हम केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन की अनदेखी नहीं कर सकते। सभी राज्यों के स्वास्थ्य मंत्रियों, स्वास्थ्य सचिवों से लेकर, राष्ट्रीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद, स्वास्थ्य क्षेत्र में अनुसंधान करने वाले निजी एवं सरकारी संस्थानों, अन्य मेडिकल संघों, केन्द्र से लेकर राज्यों के मुख्य अस्पतालों के प्रमुखों, विश्व स्वास्थ्य संगठन, डीआरडीओ, राज्यों के मुख्यमंत्रियों …सबसे पूरी तरह समन्वय बनाकर काम करना तथा स्वास्थ्यकर्मियों को प्रोत्साहित करते रहना किसी दृष्टि से कम सराहनीय नहीं है। एक से 175 से ज्यादा टेस्ट के लिए सरकारी लैब को समुन्नत कर देना तथा 67 से ज्यादा निजी लैबों की जांच कर मान्यता देने का काम सामान्य नहीं है। इस समय 602 अस्तपाल विशेष रुप से कोरोना मरीजों के लिए तैयार किए जा चुके हैं।

अगर नजर दौड़ाएंगे तो कोरोना के बीच देवदूतों की संख्या इतनी ज्यादा दिखती है कि आप सबका विवरण तक नहीं दे सकते। डॉक्टरों के बारे में आम धारणा थी कि ज्यादातर की रुचि मरीजों की सेवा में नहीं होती। सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्यकर्मियों के व्यवहार की आलोचना सदा से होती रही है और इनमें सच्चाई भी है। आज वही सरकारी अस्पतालें देवदूतों के केन्द्र मेें बदल गए हैं। वही डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी जिस तरह से अपनी जान जोखिम में डालकर निर्धारित अवधि से ज्यादा काम कर रहे हैं, संदिग्ध संक्रमितों या घोषित संक्रमितों के घरों तक पहुंच रहे हैं, उनको समझा बुझाकर अस्पताल ला रहे हैं, कोरंटाइन करने की व्यवस्था करते हैं….उन सबकी कल्पना शायद ही किसी ने की हो। जो डॉक्टर एवं स्वास्थ्यकर्मी मजहबी कट्टरता से भरे मरीजों की गालियां सुनकर, शरीर पर उनका थूक झेलकर, यहां तक कि हिंसा भी सहन कर काम कर रहे हैं उन्हें आप क्या कहेंगे तय कर लीजिए। आवश्यक सम्पूर्ण सुरक्षोपाय के बिना जो स्वास्थ्यकर्मी गांवों-मोहल्लों में सर्वेक्षण कर रहे हैं उनको आप इस श्रेणी से कैसे बाहर कर सकते हैं? कई महिला डॉक्टरों ने अपनी मातृत्व अवकाश को बीच में ही खत्म कर दिया और काम करने आ गईं। किसी ने बच्चे का जन्म दिया और उसके बाद फिर काम पर। लैबों, मेडिकल कॉलेजों आदि ने कोरोना प्रकोप आने के साथ इस पर काम करना आरंभ कर दिया और टेस्ट किट बना डाले हैं। पीपीई की कमी का समाचार आते ही कई कंपनियों ने निर्माण आरंभ कर दिया और उनको मान्यता भी मिली है। रेलवे पीपीई का निर्माण कर रही है तथा वंेटिलेटर भी विकसित किया है। रेल कोचों को आईसीयू तथा कोरंटाइन केन्द्र के रुप में तैयार किया जा चुका है। रेलवे ऐसा करेगा इसकी कल्पना कौन कर सकता था?  निजी क्षेत्र में सबसे पहले आनंद महिन्द्रा ने वेंटिलेटर बनाने की घोषणा की और आज काम काफी प्रगति में है। रुड़की आईआईटी ने ऋषिकेष एम्स के साथ मिलकर सबसे छोटा और कम मूल्य का वेंटिलेटर विकसित कर दिया। 

जिस समय कोरोना प्रकोप ने दस्तक दिया किसी ने ऐसी उत्साहजनक तस्वीर की कल्पना नहीं की थी। तो इन देवदूतों ने ऐसी स्थिति पैदा की है। आज भारत दुनिया के करीब 31 देशों को हाइड्रोक्लोरोक्विन की आपूर्ति कर रहा है क्योंकि हमारे देवदूतों ने उत्पादन इतना करने की ठान ली कि देश में कमी न हो और बाहरी मांगों की भी पूर्ति हो जाए। जो डॉक्टर-विशेषज्ञ एवं स्वास्थ्यकर्मी देश के बाहर काम करने को तैयार हुए उनको भी आप भूल नहीं सकते। दक्षेस देशों में हमारे लोग जा रहे हैं। ईरान जैसे संक्रमित देश में  लैब के साथ पहुंच गए और काम कर रहे हैं। क्या आप उन पायलटों एवं वायुयान कू्र के योगदान को नजरअंदाज कर सकते हैं जिन्होंने कोरोना के भयानक प्रकोपों के बीच भारतीयों को लाने का जोखिम उठाया? भ्रष्टाचार और उदण्डता की छवि वाली हमारी पुलिस अच्छा काम कर रही है। पुलिसकर्मी को पता है कि संक्रमित हो सकता है लेकिन वो सड़कों पर हैं। इस समय उनकी भूमिका पुलिस के साथ सामाजिक कार्यकर्ता, लापरवाह लोगों के लिए मार्गदर्शक एंव कई के लिए स्वास्थ्यकर्मी तक की हो गई है। हम यह नहीं कहते कि पुलिस का अचानक कायाकल्प हो गया है, लेकिन जो अच्छा कर रहे हैं उनकी प्रशंसा न करें तो कृतघ्नाता होगी। 

आपको ऐसे लोग गरीबों, मजदूरों, असहायों के लिए भोजन, मास्क, सेनेटाइजर आदि की व्यवस्था में दिख जाएंगे जिनका चेहरा तक जाना-पहचाना नहीं है। बड़े संगठन भी सामने हैं। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके अनुषांगिक संगठन भोजन, राशन से लेकर आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति में लगे हैं। गुरुद्वारे कर रहे हैं। अन्य धार्मिक-सामाजिक संस्थाएं सक्रिय हैं। ऐसे-ऐसे लोगों ने अपना एक समूह बना लिया है जो कभी समाज सेवा में नहीं रहे दोनों शाम का भोजन बांट रहे हैं, राशन पहुंचा रहे हैं। अगर ये लोग और संस्थाएं काम नहीं कर रहे होते तो देश की स्थिति विकट होती। प्रधानमंत्री की अपील के बाद अनेक परिवार अतिरिक्त भोजन बनाकर जरुरतमंदों तक पहुंचा रहे हैं। उन सबको आप क्या विशेषण देंगे? ऐसे लोग सामने आए जिन्होंने लौकडाउन के बीच का किराया माफ कर दिया है। प्रधानमंत्री के पीएम केयर्स फंड में जिस तरह का दान आ रहा है वैसा पहले शायद ही देखा गया हो। किसी ने एक वर्ष का पेंशन दे दिया तो किसी ने तीर्थ यात्रा के लिए जमा किए सारा धन तो किसी ने हज के लिए जमा किए धन। मीडियाकर्मी अपनी जान जोखिम में डालकर हर आवश्यक समाचार और विचार हम तक पहुंचा रहे हैं। ऐसे पत्रकारों को भी अपको इन्हीं की श्रेणी में रखना होगा। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राजनीतिक विचारों से सहमत- असहमत हो सकते हैं, लेकिन ये सारी स्थितियां पैदा करने के पीछे उनकी सर्वप्रमुख भूमिका को नकार नहीं सकते। प्रधानमंत्री मोदी का लोगों से सीधे संवाद कर खतरे के बारे में बताना, उनको अनुशासित होकर इसका सामना करने के लिए मानसिक रुप से तैयार करना, उनका साहस बढ़ाना, पुचकारना, समय-समय पर उनकी निराशा को खत्म करने के लिए भारतीय परंपरा के अनुरुप देशव्यापी कुछ कार्यक्रम देना, सभी मुख्यमंत्रियों से सतत् संवाद बनाए रखना, कहां किसको क्या जरुरत है उसकी पूर्ति करने की पूरी कोशिश करना, साहसपूर्ण और जोखिम भरे फैसले करना, इससे प्रभावित होने वाले समाज के गरीब और कमजोर तबके के लिए राहत की व्यवस्था करना, हर समर्थ को गरीबों की चिंता करने के लिए प्रेरित करते रहना, अपनी पार्टी कार्यकर्ताओं को भी इसके लिए आगे आने को उत्प्रेरित करना… आदि सारे कार्य एक साथ करने वाले को क्या कहेंगे यह आप तय कर लीजिए। जब देश का नेता आगे बढ़कर अपनी भूमिका निभाता है तो उससे दूसरे लोगों को भी प्रेरणा मिलती है और हौंसला बढ़ता है। सब एकजुट होकर कोरोना प्रकोप से लड़े, उससे जूझते हुए जो परेशानियां-कठिनाइयां आएं उनका साहस से सामना करे इसके लिए देश को तैयार करना सामान्य बात नहीं होती। आखिर इसके पहले हमने कब डॉक्टरों, नर्सो, कंपाउडरों, आशा कार्यकर्ताओं, अन्य स्वास्थ्य सहयागियों सहित सारे स्वास्थ्यकर्मियों, सफाईकर्मियों, चालकों, सिपाहियों आदि को इतना सम्मान मिलते देखा है? कब इनके लिए तालियां, थालियां, शंख और घंटियां बजीं थीं? सफाईकर्मियों पर फूलों की बारिस होते तो किसी ने नहीं देखा होगा। तो इनको देवदूत बना देने का माहौल प्रधानमंत्री ने ही निर्मित किया है। 

इस तरह आप पूरे देश के करोना से संबंधित समस्त तस्वीरों को साथ मिलाकर देखें तो आपको यह निष्कर्ष निकालने में कोई हिचक नहीं होगी कि सरकारों से लेकर गैर सरकारी स्तरों पर लाखों की संख्या में हर श्रेणी के लोग अलग-अलग रुपों में देवदूत की अवधारणा के सदृश काम कर रहे हैं। इनसे ही स्थितियां विकट होने से बच रहीं हैं। ऐसे लोगों का सम्मान करना हम सबका दायित्व हैं।

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