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केजरीवाल का सुपारी मीडिया

New Delhi: Delhi Chief Minister Arvind Kejriwal during confidence vote in Delhi Assembly in New Delhi on Thursday. PTI Photo by Manvender Vashist (PTI1_2_2014_000197b)
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तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के अनुसार मीडिया ने उनकी पार्टी को समाप्त करने की सुपारी ले रखी है। सुपारी शब्द जघन्य अपराधियों के लिए प्रयोग किया जाता है जो धन लेकर हत्या या अन्य आपराधिक वारदात करता है। तो केजरीवाल की नजर में मीडिया और उसमें काम करने वाले पत्रकार उसी तरह के अपराधी हैं।

वैसे केजरीवाल मीडया को, पत्रकारों को गालियां पहले भी दे चुके हैं, देते रहते हैं। जबसे वे मुख्यमंत्री बने हैं कम से कम एक दर्जन बार वो मीडिया पर हमला कर चुके हैं। अब उन्होंने अपनी बात पहुंचाने का अपना तरीका चुना है कि उनका ही आदमी उनसे प्रश्न पूछे और वे उसका अपने अनुसार उत्तर दंें तथा वही बाइट चारों ओर भेज दिया।ऐसे कोई मीडिया संस्थान कार्य नहीं कर सकता है।

मीडिया उनकी नजर मंें उनके खिलाफ अपुष्ट, बिना प्रमाण और आरोपों की जांच किए खबरें दिखता है। तो उनके पास सबूत है क्या कि मीडिया ने सुपारी ली है? अगर सबूत हैं तो वे सामने लाएं? किस मीडिया ने या पत्रकार/पत्रकारों ने उनकी पार्टी या उनके खिलाफ सुपारी ली है?

जो व्यक्ति स्वयं मीडिया की पैदाईश है वह मीडिया को सुपारी लेने वाला अपराधी कह रहा है। नेताओं को टेलीफोन बात में कमीना आपने कहा, लात मारकर बाहर निकालने की बात आपने कही तो क्या मीडिया उसे प्रकाशित, प्रसारित न करे?

आशीष खेतान के बारे में प्रशांत भूषण ने बयान दिया कि तहलका के गोवा फेस्ट के लिए शशि रुइया ने पैसे दिए और उनने 2 जी मामले में उसके पक्ष में प्लांटेड खबरें लिखीं जो कि पेड न्यूज की श्रेणी में आता है। मीडिया ने उस बयान को उसे छापा, दिखाया और खेतान ने पत्रिका में जो लिखा था उसे सामने रख दिया। खेतान का बयान भी चला। अमेठी लोकसभा चुनाव में एक छात्रा तथा महिला के साथ कुमार विश्वास के संबंधों को लेकर पार्टी के भीतर से ही खबरें, तस्वीरें, केजरीवाल को भेजी गईं शिकायतें आदि सामने र्लाइं गईं।

यह साफ हो रहा है कि उनकी मानसिकता एकपक्षीय एकाधिकारवादी चरित्र तक सीमित है। यानी हम जो सोचें, करें, बोलें बस वही सही और उसी अनुरुप पत्रकारों को खबरे या विश्लेषण लिखनी या बोलनी चाहिए।

मंत्री पर फर्जी डिग्री का आरोप गलत भी हो सकता है सही भी। आप कह रहे हैं सही है तो मीडिया उसे भी दिखा रहा है, विरोधी कह रहे हैं कि फर्जी है उसे भी, और उन विश्वविद्यालयों के अधिकारियों के वक्तव्य भी, न्यायालय में आया शपथ पत्र भी दिखा रहा है। केवल आपका ही पक्ष दिखाए और दूसरे का न दिखाए यह पत्रकारिता नहीं हो सकती। यह फासीवाद सोच है। इसका विरोध होना चाहिए।

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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