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कश्मीर में सेना की गोली से मरे पत्थरबाज

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पत्थरबाजों की मौत पर छाती पीटने वाले नेताओं को क्या कहें

अवधेश कुमार

 

जहां भी आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ होता है पत्थरबाजी और उग्र विरोध प्रदर्शन होने लगता है। हर घटना में इनमें से किसी या कुछ के जान जाने की स्थिति पैदा होती है। यह तो सुरक्षाबलों का संयम तथा प्रशिक्षणों की महिमा है कि उनकी जान बचाते हुए ये ऑपरेशन को अंजाम देने में सफल रहते हैं। अगर ये नेता इनकी मौत पर दुख प्रकट करते हुए भी ये अपील करते कि जहां भी सुरक्षाबल मुठभेड़ करें वहां ये न आएं तो समझा जा सकता था कि इनकी मंशा सही है। इस तरह के बयान से ये आग में पेट्रॉल डाल रहे हैं।

 

किसी भी नागरिक का असमय मारा जाना दुखद है। जम्मू कश्मीर के पुलवामा मुठभेड़ में मारे गए आठ नागरिकों के परिवारों के प्रति निश्चय ही हमारी सहानुभूति होगी। किंतु जिस तरह जम्मू कश्मीर के अनेक नेता बयान दे रहे हैं उनसे तो लगता है मानो सुरक्षा बलों ने जानबूझकर उनको मार दिया। सुरक्षा बलों को पूरी घाटी में खलनायक बनाने वाले केवल अलगाववादी हुर्रियत, आतंकवादी समर्थक तत्व ही नहीं, मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां भी हैं। प्रश्न है कि इस मामले में सुरक्षाबलों के पास क्या विकल्प बचा था? घटना बिल्कुल स्पष्ट है। पुलवामा जिले के खारपोरा सिरनू में सुरक्षा बलों एवं आतंकवादियों के बीच मुठभेड़ आरंभ होने के साथ ही लोगों का समूह आतंकवादियों के समर्थन में नारे लगाते हुए मुठभेड़ स्थल पर जमा हो गया एवं पथराव करना शुरू कर दिया। सुरक्षाबलों को भी इसका अभ्यास हो चुका है, इसलिए वो उन विपरीत परिस्थितयों मेें भी आतंकवादियों के सफाये पर फोकस बनाए रख सके। जैसे ही तीन आतंकवादी मारे गए, इन हिंसक प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षाबलों के साथ गुत्थमगुत्थी आरंभ कर दी, उनकी गाड़ियों पर चढ़ गए, हथियार तक इन्होंने छीनने की कोशिश की। सुरक्षाबलों के साथ इस तरह गुत्थमगुत्थी करने के वीडियो हम अनेक बार देख चुके हैं। वे राह चलते सुरक्षा बलों से उलझते हैं, उनका हथियार छीनने की कोशिश करते हैं, उनको चिढ़ाते हैं और बेचारा जवान प्रतिक्रिया दिए बिना अपने को बचाते हुए वहां से निकलने की कोशिश करता रहता है। किंतु जब हमला एक सीमा से आगे हो जाए तो कोई चारा ही नहीं बचता है। जो स्थिति पैदा हो गई थी उसमें इन्हें भी बल प्रयोग करना पड़ा और परिणाम में सात लोगों को जान गंवानी पड़ी। पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला कहते हैं कि यह एक बुरा ऑपरेशन था जो घटिया और गलत तरीके से अंजाम दिया गया है। संकटग्रस्त कश्मीर में शांति बहाली के लिए राज्यपाल प्रशासन कुछ नहीं कर रहा है। मेहबूबा मुफ्ती कह रहीं हैं कि क्या यही राज्यपाल शासन से उम्मीद थी? कोई भी मुल्क अपने ही लोगों की हत्या कर जंग नहीं जीत सकता।

ये दो उदाहरण बताते हैं कि जम्मू कश्मीर में हम जिनको मुख्यधारा की पार्टियां मानते हैं उनकी सोच क्या है। क्या यह हत्या है? पाकिस्तान की मीडिया इन दोनों बयानों को प्रचारित कर भारतीय सेना को जुल्मी साबित कर रही है। हत्या उसे कहते हैं जब योजना बनाकर किसी ऐसे व्यक्ति या व्यक्ति समूह की जान ले ली जाए जो मुठभेड़ करने की स्थिति में नहीं था। कश्मीर की कठिन बना दी गई परिस्थितियों में काम कर रहे सुरक्षाबल हत्यारे नहीं हैं। वे अपनी जान देकर कश्मीरियों और देशवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित कर रहे हैं। पीपुल्स कांफ्रेंस के नेता सज्जद लोन का कहना है कि अगर किसी अभियान में नागरिकों के मारे जाने की जरा भी आशंका हो तो बेहतर है कि ऐसे अभियान को स्थगित कर दिया जाए। अगर सुरक्षा बल कार्रवाई के लिए यह सिद्धांत बना लें तो वहां उनकी भूमिका केवल मूकदर्शक की रह जाएगी। आतंकवादी जो चाहेंगे करेंगे। जहां भी आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ होता है पत्थरबाजी और उग्र विरोध प्रदर्शन होने लगता है। हर घटना में इनमें से किसी या कुछ के जान जाने की स्थिति पैदा होती है। यह तो सुरक्षाबलों का संयम तथा प्रशिक्षणों की महिमा है कि उनकी जान बचाते हुए ये ऑपरेशन को अंजाम देने में सफल रहते हैं। अगर ये नेता इनकी मौत पर दुख प्रकट करते हुए भी ये अपील करते कि जहां भी सुरक्षाबल मुठभेड़ करें वहां ये न आएं तो समझा जा सकता था कि इनकी मंशा सही है। इस तरह के बयान से ये आग में पेट्रॉल डाल रहे हैं।

वैसे पूरे घटनाक्रम का विवरण स्पष्ट करता है कि सुरक्षा बलों ने हर बार की तरह यहां भी अपनी ओर से पूरी कोशिश की किसी प्रदर्शनकारी और पत्थरबाज की जान लिए बगैर वे ऑपरेशन पूरा कर लेे। सुरक्षाबलों ने हिंसक तत्वों पर काबू पाने और अपना ऑपरेशन समाप्त कर यानी आतंकवादियों का शव एवं वहां से जो भी सामग्रियां मिलें उन्हें लेकर निकल जाने की ही रणनीति पर काम कर रहे थे। लेकिन पत्थरबाज एवं उग्र भीड़ का हमला रुकने के नाम नहीं ले रहा था। बावजूद इसके पहले आंसू गैस के गोले छोड़े गए, पैलेट गन भी इस्तेमाल हुए….जब अपने को बचाने का उपाय न था तो बल प्रयोग करना पड़ा। या तो ये उनके सामने समर्पण करते, कुछ अपना हथियार छिने जाने देते, कुछ घायल होते, कुछ मृत्यु को प्राप्त होते या फिर सुरक्षा बल के रुप में अपनी निर्धारित भूमिका को अंजाम देते। उन्होंने समय के अनुसार उपयुक्त विकल्प को चुना। यही एकमात्र रास्ता था। आगे भी ऐसी विकट स्थिति में उन्हें यही करना होगा। इनसे यह पूछा जाना चाहिए कि आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ चला रहा हो तथा लोग पत्थरबाजी करने लगें, सामने विरोध प्रदर्शन हो, मुठभेड़ समाप्त हो जाने के बाद ये और उग्र होकर सामने आ जाएं, सुरक्षाबलों की अपनी ही जान पर आफत आ जाए तो वे क्या करें? यदि पत्थरबाजों और प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने दो चार सुरक्षाकर्मियों की जान ले ली होती या उनको गंभीर रुप से घायल भी कर दिया होता तो इनमें से किसी का बयान नहीं आता। सब चुप्पी साधे होते। उस मुठभेड़ में एक जवान शहीद हो ही चुका था। इस पर किसी का बयान नहीं आया। क्या उस जवान की जान की कीमत इनकी नजर में कुछ नहीं है?

सुरक्षा बल इसके अलावा आतंकवादियों के परिवार से संपर्क कर उनकी वापसी की अपील करवाते हैं, जो हथियार छोड़कर वापस आ गए सामान्य पूछताछ के बाद उनकी काउंसिलिंग कराई जाती है….घर छोड़ा जाता है। उमर, मेहबूबा या अन्य ऐसे नेता इस पक्ष की चर्चा नहीं करते। अगर कश्मीर के नेता चाहते हैं कि आम लोग ऑपरेशन में न मारे जाएं तो उन्हें भी इस घटना के बाद पुलिस की तरह बयान जारी करना चाहिए। जम्मू कश्मीर पुलिस ने इस घटना के बाद जारी बयान में कहा है कि आम लोगों की मौत का दुख है। हम एक बार फिर आम लोगों से अपील करते हैं कि वो मुठभेड़ वाली जगह पर जानें से बचें क्योंकि यहां जाना मना है और जाने पर जान का खतरा हो सकता है। जो भी आतंकवादी के समर्थन में सरेआम संघर्ष करने आ जाए उसे क्या नाम दिया जा सकता है?

 

जिस आतंकवादी को मारा गया वह हिज्बुल मुजाहीद्दीन के सर्वाधिक वांछित आतंकवादियों में से एक जहूर अहमद ठोकर था जिसके साथ दो आतंकवादी और थे। ठोकर 163 टीए बटालियन का पूर्व सैनिक था। जुलाई 2017 में इस खबर से देश भर में सनसनी फैली थी कि एक जवान अपने सरकारी राइफल सहित फरार हो गया है। उसके बाद जब आतंकवादी के वेश में उसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई तो साफ हो गया कि वह हिज्बुल मुजाहीद्दीन का कामंडर बन गया है। चिंता का विषय है कि जहां वह मारा गया वह उसका गांव था। उसके साथ मारे गए दो अन्य आतंकवादी राजपुरा पुलवामा के ही वासी थे। इससे फिर इस बात की पुष्टि हुई है कि आतंकवादी बनने के बावजूद उनका अपने गांव व रिश्तेदारों से संपर्क बना रहता है तथा वे वहां आते-जाते भी रहते हैं। यह वही जहूर है जिसने अपने साथियों के साथ मिलकर सैन्यकर्मी औरंगजेब को पुलवामा में अगवा कर हत्या कर दी थी। औरंगजेब पुंछ के मेढर तहसील के अपने सलानी गांव ईद मनाने जा रहा था। उस घटना का वीडियो भी इन आतंकवादियों ने जारी कर दिया था। ठोकर ने ही जम्मू कश्मीर पुलिस में उप निरीक्षक इम्तियाज को भी मार डाला था। लोगों को तो खुशी होनी चाहिए कि जो आतंकवादी अपने गुट के साथ जांबाज फौजी एवं सिपाही को मारकर उसका वीडियो जारी करते हुए सुरक्षा बलों को खुलेआम चुनौती दे रहा था अंततः सुरक्षाबलों ने उसका काम तमाम कर अपने साथियों की नृशंस हत्या का बदला ले लिया।

औरंगजेब के गांव में इस घटना पर संतोष व्यक्त किया भी गया। किंतु घाटी में प्रदर्शन हो रहा है, चारों ओर सुरक्षाबलों को जालिम कहकर भारत विरोधी नारे लग रहे हैं। इनसे विचलित होकर सुरक्षा बलों को कार्रवाई रोककर वापस लौट जाने की घोषणा तो नहीं की जा सकती। जिस तरह जेहादी आतंकवाद एक विचार है वैसे ही पत्थरबाजी भी। थल सेना प्रमुख जनरल विपीन रावत ने घाटी में ही यह बयान दिया था कि जो लोग पत्थरबाजी करते हैं वे जान लें कि उनके साथ भी दुश्मनों जैसा व्यवहार किया जाएगा, क्योंकि पत्थर भी एक हथियार है जिससे वे हमारे उपर हमले करते हैं। बावजूद पत्थरबाज नहीं मानें तो मूल कारण इसके पीछे निहित विचार है ही जिसकी प्रेरणा मजहब के नाम पर फैलाए गए अलगाववाद की विकृत सोच है। यह विचार पत्थरबाजों में भरा गया है या वो शक्तियां जो इन विचारधारा का पोषक हैं इनका इस्तेमाल करतीं हैं। ये जम्मू कश्मीर में हैं और सीमा के उस पार भी। दोनों के सबूत अनेक बार सामने आ चुके हैं। ये इस्लाम के नाम का गलत इस्तेमाल कर कश्मीर को भारत से अलग करने को जेहाद साबित करते हैं और इसका असर है। जाहिर है, इनसे कई स्तरों पर लड़ने की जरुरत है और उन पर जितना संभव है काम हो रहा है। किंतु मुख्य बात है हथियार बंद आतंकवादियों का खात्मा कर जम्मू कश्मीर को शांत करना। वही सुरक्षाबल कर रहे हैं और यही उनको करना चाहिए भी। ऑपरेशन ऑल आउट को इस दिशा में कामयाबी मिल रही है। इस वर्ष अब तक करीब 240 आतंकवादी मारे जा चुके हैं। 2017 में भी 213 आतंकी मारे गए जबकि 2016 में कुल 150 आतंकवादी मारे गए थे। इस तरह आतंकवादियों के काम तमाम किए जाने की संख्या बढ़ रही है। माना जा रहा है कि 250 के आसापास आतंकवादी अभी भी जम्मू कश्मीर में सक्रिय हैं। सुरक्षा बल इसके अलावा आतंकवादियों के परिवार से संपर्क कर उनकी वापसी की अपील करवाते हैं, जो हथियार छोड़कर वापस आ गए सामान्य पूछताछ के बाद उनकी काउंसिलिंग कराई जाती है….घर छोड़ा जाता है। उमर, मेहबूबा या अन्य ऐसे नेता इस पक्ष की चर्चा नहीं करते। अगर कश्मीर के नेता चाहते हैं कि आम लोग ऑपरेशन में न मारे जाएं तो उन्हें भी इस घटना के बाद पुलिस की तरह बयान जारी करना चाहिए। जम्मू कश्मीर पुलिस ने इस घटना के बाद जारी बयान में कहा है कि आम लोगों की मौत का दुख है। हम एक बार फिर आम लोगों से अपील करते हैं कि वो मुठभेड़ वाली जगह पर जानें से बचें क्योंकि यहां जाना मना है और जाने पर जान का खतरा हो सकता है। जो भी आतंकवादी के समर्थन में सरेआम संघर्ष करने आ जाए उसे क्या नाम दिया जा सकता है?

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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