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करतारपुर साहिब गलियारा

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पाकिस्तान के रवैये पर सतर्क रहने की आवश्यकता

अवधेश कुमार

करतारपुर के गुरुद्वारा दरबार साहिब के धार्मिक महत्व को बताने की आवश्यकता नहीं है। जिस स्थान पर गुरु नानक देव जी पैदा हुए, जहां जीवन के अंतिम 18 वर्ष रहकर उन्होंने अपना शरीर त्यागा वह सिखों के साथ हिन्दुओं के लिए भी महत्वपूर्ण तीर्थस्थान है। वहां पहुंचने के लिए अभी पहले लाहौर जाना होता है और उसके बाद 140-45 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। गुरदासपुर सीमा पर स्थित डेरा बाबा नाकर गुरुद्वारा से सीधा रास्ता बन जाने के बाद श्रद्धालु चाहें तो पैदल भी वहां जा सकते हैं। सीमा से यह 3-4 किलोमीटर पर है। यह तो विभाजन के समय सीमा रेखा खींचने वाले रैडक्लिफ की नासमझी या बदमाशी थी कि ऐसे महत्वपूर्ण स्थल को उसने पाकिस्तान के हिस्से कर दिया। उसने लाहौर को भी मनमाने तरीके से पाकिस्तान को दे दिया जिसका व्यापक विरोध हुआ। कायदे से करतापुर भारत का भाग होना चाहिए था। यह आवाज 1947 से लगातार उठाई जानी चाहिए थी कि करतारपुर साहिब पर भारत का दावा बनता है। ऐसा क्यों नहीं हुआ यह समझ से परे है। किंतु जिस तरह अचानक पाकिस्तान ने अपना उदार रवैया दिखाया है वह अनायास नहीं हो सकता। करतारपुर साहिब तक गुरुदासपुर सीमा से सीधा रास्ता दिया जाए इसकी मांग वर्षों से की जा रही थी। अटलबिहारी सरकार ने इसका औपचारिक प्रस्ताव दिया। कहा जाता है कि जनरल परवेज मुशर्रफ इसके लिए तैयार भी हो गए थे लेकिन हो न सका। उसके बाद डॉ मनमोहन सिंह ने भी इस पर बात की, पर नहीं हुआ। जिन कुछ महीनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और नवाज शरीफ के बीच बेहतर रिश्ते थे उसमें भी इस पर बात चली और संकेत मिला कि गलियारा खोला जाएगा। प्रश्न है कि आखिर ऐसा क्या हो गया कि इमरान खान के शपथग्रहण समारोह में शामिल होने गए नवजोत सिंह सिद्धू के पास आकर पाकिस्तान के थल सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने कह दिया कि हम करतारपुर साहिब सीमा को खोलने जा रहे हैं?

करतापुर साहिब का मामला धार्मिक दृष्टि से इतना संवेदनशील है कि भारत सरकार इस पर किसी तरह का नकारात्मक रुख अपना नहीं सकती थी। किंतु इसकी आड़ लेकर पाकिस्तान की चाल को कामयाब होने भी नहीं दिया जा सकता।  पाकिस्तान यह प्रदर्शित कर रहा है कि उसने करतारपुर साहिब सीमा खोलने तथा वहां तक आने-जाने का मार्ग देकर ऐसी उदारता बरती है जिसके बाद भारत को उसके सामने बिछ जाना चाहिए। इमरान खान के भाषण का अर्थ यही था।  इनको नहीं भूलना चाहिए कि आज तक सिखों को उनके शीर्ष धर्मस्थल के लिए उचित रास्ता न देकर ये अपराध कर रहे थे। आशंका तो यही है कि करतारपुर साहिब की आड़ में पाकिस्तान खालिस्तान भाव को फिर से जिन्दा करने की चाल चल सकता है। ननकाना साहिब से लेकर सच्चा सौदा तक खालिस्तान के पोस्टर लगे पड़े हैं। 


सेना प्रमुख द्वारा ऐसा कहे जाने के मायने वही नहीं हो सकते जो भक्ति के भाव में डूबे हमारे सिख और हिन्दू भाई-बहन समझ रहे हैं। इमरान खान ने गलियारे की नींव डालने को एक बड़े समारोह का रुप दिया, भारतीय विदेश मंत्री तक को आमंत्रित किया एवं भारत से चुनिंदा 31 पत्रकारों को वहां आने का वीजा दिया गया। इमरान ने वहां जो भाषण दिया उसमें कश्मीर का जिक्र तो था लेकिन आतंकवाद को रोकने का नहीं। उसके दो दिनोें पूर्व 26 नवंबर 2008 के मुंबई हमले की दसवीं वार्षिकी थी। इमरान उस दिन हमले के गुनाहगारों को सजा दिलाने का कम से कम ऐलान भी कर देते तो माना जा सकता था कि वाकई वो भारत से रिश्ते सुधारने के प्रति गंभीर हैं। करातपुर शिलान्यास समारोह में उन्होंने अपने भाषण में कह दिया कि जब दोनों देश नाभिकीय हथियारों से लैश हैं तो युद्ध हो ही नहीं सकता। जब युद्ध नहीं हो सकता तो रिश्ते सामान्य करने में ही भलाई है। यह विचित्र सा तर्क है। भारत पाकिस्तान संबंधों के रास्ते की मूल बाधा आतंकवाद है। उस पर उन्होंने कुछ बोला ही नहीं। उल्टे करतापुर साहिब में उनके एवं सेना प्रमुख के साथ खालिस्तानी आतंकवादी गोपाल सिंह चावला दिखा जो कि खुलेआम भारत को तोड़़ने की धमकियां देता है। यह वही गोपाल सिंह चावला है जिसने ननकाना साहिब एवं सच्चा सौदा साहिब में दर्शन करने वाले भारतीय राजनयिकों को अपमानित किया तथा हमारे सिख राजनयिक को केस बढ़ाया हुआ हिन्दू तक कह दिया। वे अपनी ड्युटी निभाने वहां गए थे। भारत की शिकायत के बावजूद उसके खिलाफ कदम उठाना तो दूर उसके साथ वीवीआईपी व्यवहार किया जा रहा है।


इसको हमें किस तरह लेना चाहिए? वास्तव में करतापुर साहिब का मामला धार्मिक दृष्टि से इतना संवेदनशील है कि भारत सरकार इस पर किसी तरह का नकारात्मक रुख अपना नहीं सकती थी। किंतु इसकी आड़ लेकर पाकिस्तान की चाल को कामयाब होने भी नहीं दिया जा सकता। इसलिए बातचीत का प्रस्ताव ठुकराना तथा विदेशी मंत्री सुषमा स्वराज का वहां न जाना बिल्कुल सही निर्णय है। हरसिमरत कौर तथा हरदीप पुरी जैसे दो सिख मंत्रियों को भेजकर सरकार ने इसे धार्मिक सीमाओं तक ही रहने की उपयुक्त रणनीति अपनाई। पाकिस्तान यह प्रदर्शित कर रहा है कि उसने करतारपुर साहिब सीमा खोलने तथा वहां तक आने-जाने का मार्ग देकर ऐसी उदारता बरती है जिसके बाद भारत को उसके सामने बिछ जाना चाहिए। इमरान खान के भाषण का अर्थ यही था। पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कसूरी भी यही बोल रहे थे। इनको नहीं भूलना चाहिए कि आज तक सिखों को उनके शीर्ष धर्मस्थल के लिए उचित रास्ता न देकर ये अपराध कर रहे थे। आशंका तो यही है कि करतारपुर साहिब की आड़ में पाकिस्तान खालिस्तान भाव को फिर से जिन्दा करने की चाल चल सकता है। ननकाना साहिब से लेकर सच्चा सौदा तक खालिस्तान के पोस्टर लगे पड़े हैं। जब इसका विरोध किया गयातो पाकिस्तान सरकार का जवाब था कि गुरुद्वारों का प्रबंधन सिख समुदाय करता है और उसमें हमारी कोई भूमिका नहीं। क्या अजीब बात है। वहां भारत को तोड़ने वाले, सिखों को भड़काने वाले, हिन्दू सिखों के बीच तनाव पैदा करने वाले पोस्टर डाले जाएं, भाषण दिए जाएं और सरकार कह दे कि उससे उनका कोई लेना-देना नहीं। इसका अर्थ समझना कठिन नहीं है। यही नहीं हाल के दिनों मंें पाकिस्तान ने ब्रिटेन से लेकर कनाडा, अमेरिका आदि से आने वाले सिख फॉर जस्टिस के लोगों को भारी संख्या में वीजा दिया है। यह वही संगठन है जो 2020 में खालिस्तान के लिए जनमत संग्रह की मांग कर रहा है। इनकी वहां पूरी खातिरदारी की गई है।


कहने का तात्पर्य यह कि करतारपुर साहिब तक पहुुंचने का रास्ता मिलने से एक ओर यदि वर्षों की आकांक्षायें पूरी हो रहीं हैं तो दूसरी ओर चुनौतियां और खतरे भी बढ़े है। हजारों की संख्या में जाते-आते लोगों के साथ आतंकवादियों की भी घुसपैठ कराने की रणनीति अपनाई जा सकती है। 26 नवंबर को भारतीय क्षेत्र में शिलान्यास करते हुए अनेक भावुक बातें की गईं किंतु पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरींदर सिंह ने साफ कहा कि जब तक पाकिस्तानी सेना हमारे जवानों को शहीद करना बंद नहीं करतीं हमारे संबंध अच्छे नहीं हो सकते। उन्होेंने तो यहां तक कह दिया जाए कि जब तक पाकिस्तान ऐसा करने से बाज नहीं आता तो दरबार साहिब नहीं जाएंगे। कैप्टन अमरींदर सिंह स्वयं सेना में रहे हैं। इस कारण पाकिस्तानी सेना की छलनीतियों से पूरी तरह वाकिफ हैं। उन्होंने तो जनरल बाजवा को लताड़ भी लगाई कि आखिर सेना के किस पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण में ऐसा करने की सीख दी जाती है? हाल ही में अमृतसर के निकट संत निरंकारी मिशन पर हुए आतंकवादी हमले के सूत्र पाकिस्तान से जुड़े हुए मिले हैं। वस्तुतः कैप्टन अमरींदर का रुख भावुकता से परे व्यावहारिक है।

उन्होेंने सिद्धू को वहां जाने से रोकने की भी कोशिश की पर कोई व्यक्तिगत यात्रा के रुप में कहीं जा सकता है। केन्द्र सरकार की तो विवशता थी कि ऐसे अवसर पर वह पाकिस्तान को इसका गलत लाभ उठाने नहीं दे सकता था। इसलिए दो सिख मंत्रियों को भेजा गया। सिद्धू के पास ऐसी कोई मजबूरी नहीं थी। वे इमरान खान को फरीश्ता कहते रहे, उनकी शान में कशीदे पढ़ते रहे, भारत के अंदरुनी विवाद को पाकिस्तान की जमीन से उठाया वह सब अवांछनीय है। वे पंजाब के मंत्री हैं, लोकसभा एवं राज्यसभा के सदस्य रह चुके हैं। देश की सीमा से बाहर वे भारत के प्रतिनिधि होते हैं। अगर इतना तक का उन्हें भान नही ंतो फिर कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। हम न भूलें कि पाकिस्तान उच्चायोग ने चुनकर केवल उन्हीं पत्रकारों को वीजा दिया जिनकी छवि पाकिस्तान विरोधी की नहीं है। इन 31 पत्रकारों में से किसी ने वहां एक भी असुविधाजनक सवाल न पूछे, न चिंताजनक पहलुओं को उठाया।


1980 के दशक से पाकिस्तान ने पंजाब में खालिस्तानी अलगाववाद को बढ़ाव देने की योजना पर काम आरंभ कर दिया। पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के प्रतिशोध के भाव से भरा रहा है। भारत ने खालिस्तानी आतंकवाद की कितनी बड़ी कीमत चुकाई है यह पूरे विश्व को पता है। पाकिस्तान में महत्वपूर्ण गुरुद्वारा  के होने तथा सिख समुदाय की उपस्थिति का उसे लाभ मिलता है। कश्मीरी आतंकवादियों की भर्ती, उनके प्र्रशिक्षण से लेकर घुसपैठ कराने के समान ही खालिस्तानी आतंकवादियों के लिए ढांचे खड़े किए गए। हालांकि आज पाकिस्तान के साथ अमेरिका नहीं है जहां से आने वाले हथियार और धन का इस्तेमाल वह कर सके। इस मामले पर चीन भी उसके साथ नहीं हो सकता। बावजूद जो कुछ दिख रहा है उसके आलोक में हम यह मान नहीं सकते कि करतापुर साहिब का रास्ता खोलने के निर्णय के पीछे उनकी कोई दूरगामी भारत विरोधी मंशा नहीं है। हालांकि गुरु नानक देव जी की 550 वीं जयंती सिख समुदाय वहां मना सकेंगे यह हमारे लिए संतोष का विषय है। वैसे भारत ने वहां 24 घंटे वर्ष भर लोगों के जाने आने की छूट तथा उनको सुरक्षा देने की मांग की है। पाकिस्तान कितना करता है देखना होगा। किंतु सिख भाई-बहनों को भी पाकिस्तान की चालों के प्रति सतर्क रहना होगा। आखिर होगा तो वह पाकिस्तान का भाग ही। वहां जाने वाले भारतीयों को खालिस्तान के पोस्टर और बैनर देखने होगे जिन पर भारत विरोधी बातें लिखीं होंगी। उसे देखकर पर क्या गुजरेगी इसका केवल अनुमान लगाया जा सकता है। भारतीय वहां कुछ करने की स्थिति में भी नहीं होंगे। हमारे लिए चिंता का विषय यही है कि वहां खालिस्तानी तत्व अगर धार्मिक वाणी के नाम पर भड़काने वाले भाषण देते रहे, इसके साहित्य बांटते रहे तो पता नहीं कुछ नवजवान भ्रमित हो जाएं।

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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