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ईद पर किसे और कैसे शुभकामनाएं दू, मुस्लिम समाज अपने अंदर बढ़ता कट्टरवाद स्वीकारने तक को तैयार नही

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अवधेश कुमार

हाल के वर्षों में सामूहिक तौर पर मुस्लिम समाज के अंदर जो मजहबी कट्टरता का प्रत्यक्ष अनुभव कर रहा हूं, उससे दिल दहलता है और फिर लगता है कि ईद पर क्या और किस चीज का मुबारकबाद दूं।

पवित्र रमजान के एक महीने तक रोजा रखने के बाद ईद मुसलमान भाई बहनों के लिए संभवतः सबसे बड़ा उत्सव है उल्लास एवं उमंग का। एक महीने के रोजे से आत्मशुद्धि के बाद हर प्रकार का ईर्ष्या, द्वेष, नफरत, हिंसा, वासना का अंत होना चाहिए। अखिर रोजा का मकसद यही है। इससे आगे बढ़ें तो रोजा और ईद किसी प्रकार के नफरत, हिंसा और विरोध के सामने डटकर खड़ा होने, उसका विरोध करने और आवश्यकता हो तो उसके लिए कुर्बानी देने तक का का संकल्प पैदा करना चाहिए। मैं पिछले कई सालों से कुछ निजी मित्रों को तो ईद की शुभकामनाएं दे देता हूं। पर सार्वजनिक रुप से नहीं देता।

एक महीने के रोजे से आत्मशुद्धि के बाद हर प्रकार का ईर्ष्या, द्वेष, नफरत, हिंसा, वासना का अंत होना चाहिए। अखिर रोजा का मकसद यही है। इससे आगे बढ़ें तो रोजा और ईद किसी प्रकार के नफरत, हिंसा और विरोध के सामने डटकर खड़ा होने, उसका विरोध करने और आवश्यकता हो तो उसके लिए कुर्बानी देने तक का का संकल्प पैदा करना चाहिए।

कारण, मैं देख रहा हूं कि मुस्लिम समाज में निजी तौर पर तो रिश्ते निभाने वालों की कमी नहीं हैं। उनके अंदर इन्सानियत भी है, दया भी है, मनुष्यता भी है। विपरीत परिस्थितियों में वो काम भी आते हैं और विश्वास पर खरे भी उतरते हैं। मेरे पंचायत के अंदर मुसलमानों की खासी संख्या रही है, इसलिए ताजिया से लेकर ईद मेले से आदि से बचपन से मेरा रिश्ता रहा है।

लेकिन हाल के वर्षों में सामूहिक तौर पर मुस्लिम समाज के अंदर जो मजहबी कट्टरता का प्रत्यक्ष अनुभव कर रहा हूं, उससे दिल दहलता है और फिर लगता है कि ईद पर क्या और किस चीज का मुबारकबाद दूं। हमारे देश की समस्या यह हो गई कि पत्रकार, नेता, सामाजिक कार्यकर्ताओं में से ज्यादा संख्या ऐसे लोगों की है जो नंगा दिखते सच को बोलने से बचते हैं। माहौल ऐसा बना दिया गया है कि आपने मुस्लिम समाज में बढ़ रही कट्टरता और हिंसक व्यवहार को खुलकर बयान किया तो आप सांप्रदायिक करार दिए जाएंगे, आपको सेक्यूलर विरोधी मान लिया जाएगा, ऐसे लोगों की संख्या बड़ी है जो आप पर टूट पड़ेंगे, आपको आरएसएसी, भाजपाई, हिन्दू महासभाई कुछ भी करार दे सकते हैं। मीडिया में, बौद्धिक क्षेत्र से एक्टिविस्टों की दुनिया में ऐसे लोगों का वर्चस्व लंबे समय से है और ऐसा आतंक कायम हो गया है कि मन की भावना प्रकट करने से लोग डरते हैं। कारण, एक बार आपकी छवि ऐसी बनी तो फिर आप भले अंदर से भी मजहबों का सम्मान करते हों, आपके दिल में भले हिन्दुओं की तरह ही मुसलमानों, ईसाइयों या अन्य मजहब के लोगों के लिए प्यार हो, आपकी स्वीकृति इस समाज में खत्म हो जाती है। उसका परिणाम आप भुगतते हैं।

इस पवित्र महीने में भी  इस्लामी आतंकवादियों ने कितने लोगों की हत्यायें की? मस्जिद में नमाज पढ़ते लोगों का मारा। कुवैत में आईएसआईएस के आंतकवादी ने इसलिए हमला किया, क्योंकि वह मानता था कि उसका जो सुन्नी इस्लाम है वो बेहतर है और इस मस्जिद में शिया संप्रदाय की बात होती है जो उसके इस्लाम के विरुद्ध है। ऐसे ही केन्या में मस्जिद के अंदर हमले हुए।

इसलिए लोग भयानक सच देखते हुए भी बोलने से बचते हैं। अपना चरित्र जरा दूसरा है। अपन मानते हैं कि मनुष्य जीवन में जो नियति है वो कोई बदल नहीं सकता, तो फिर साहस के साथ सच बोलने से बचने की क्या आवश्यकता है। इसलिए अपनी छवि की चिंता किए बगैर, अपने कैरियर में कल क्या होगा इन सबसे परे हटकर हमेशा जो सच समझ में आता है वो बोलता हूं, लिखता हूं और जीवन भर ऐसा ही करता रहूंगा। हालांकि जो लोग सेक्यूलर के नाम पर पाखंड करते हैं, ढोंग करते हैं उनकी तुलना में मैं शुद्ध सेक्यूलर हूं। इसलिए सेक्यूलर हूं कि मुझे मेरे धर्म ने सभी संप्रदायों, पंथों, मजहबों का सम्मान करना सिखाया है। यह भी जीवन भर करता रहूंगा। हमारे धर्म ने हमें सिखाया है कि सबके अंदर एक ही जीव तत्व का वास है तो फिर मैैं इस आधार पर किसी से नफरत क्यों करुं कि वो हमारे धर्म का नहीं है।
किंतु यही सोच मैं कुछ अपवादों को छोड़कर ज्यादातर मुसलमान मित्रोें में नहीं देखता हूं। वो मानते हैं कि बस, केवला उनका मजहब ही सबसे श्रेष्ठ है। हिन्दू धर्म की जिस स्वतंत्रता को हम अपनी विशेषता मानते हैं उसके बारे में ये कहते हैं कि आपका धर्म तो कुछ है ही नहीं। यहां तो कोई नियम, व्यवस्था ही नहीं है। सम्मान प्रदर्शित नहीं करते। मैं इन्हें कहता हूं कि आप अपने मजहब को श्रेष्ठ मानो, मुझे इसमें समस्या नहीं है, पर दूसरे के मजहब को हीन तो न मानो।
मुस्लिम समाज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वहां धार्मिक सुधार, सामाजिक सुधार की आवश्यकता कोई महसूस करता ही नहीं। धार्मिक सुधार की बात वहां धर्म विरोधी है। इससे पूरी दुनिया की समस्याएं बढ़ी हैं।

आपने मुस्लिम समाज में बढ़ रही कट्टरता और हिंसक व्यवहार को खुलकर बयान किया तो आप सांप्रदायिक करार दिए जाएंगे, आपको आरएसएसी, भाजपाई, हिन्दू महासभाई कुछ भी करार दे सकते हैं। मीडिया में, बौद्धिक क्षेत्र से एक्टिविस्टों की दुनिया में ऐसे लोगों का वर्चस्व लंबे समय से है और ऐसा आतंक कायम हो गया है कि मन की भावना प्रकट करने से लोग डरते हैं। कारण, एक बार आपकी छवि ऐसी बनी तो फिर आप भले अंदर से भी मजहबों का सम्मान करते हों, आपके दिल में भले हिन्दुओं की तरह ही मुसलमानों, ईसाइयों या अन्य मजहब के लोगों के लिए प्यार हो, आपकी स्वीकृति इस समाज में खत्म हो जाती है। उसका परिणाम आप भुगतते हैं।

रमजान के पीछे की सोच का जितनी समझ मुझे है उसका वर्णन मैंने किया है। लेकिन आप देख लीजिए, इस पवित्र महीने में भी मजहबी नफरत की हिंसा जारी रही। इस महीने में दुनिया में इस्लामी आतंकवादियों ने कितने लोगों की हत्यायें की? मस्जिद में नमाज पढ़ते लोगों का मारा। कुवैत में आईएसआईएस के आंतकवादी ने इसलिए हमला किया, क्योंकि वह मानता था कि उसका जो सुन्नी इस्लाम है वो बेहतर है और इस मस्जिद में शिया संप्रदाय की बात होती है जो उसके इस्लाम के विरुद्ध है। ऐसे ही केन्या में मस्जिद के अंदर हमले हुए। इस पूरे महीने में दुनिया ने आतंकवादियों से आग्रह किया कि आप रमजान के महीने में खून खराबा मत करो, लेकिन इन पर कोई असर नहीं।

जो लोग सेक्यूलर के नाम पर पाखंड करते हैं, ढोंग करते हैं उनकी तुलना में मैं शुद्ध सेक्यूलर हूं। इसलिए सेक्यूलर हूं कि मुझे मेरे धर्म ने सभी संप्रदायों, पंथों, मजहबों का सम्मान करना सिखाया है। यह भी जीवन भर करता रहूंगा। हमारे धर्म ने हमें सिखाया है कि सबके अंदर एक ही जीव तत्व का वास है तो फिर मैैं इस आधार पर किसी से नफरत क्यों करुं कि वो हमारे धर्म का नहीं है। किंतु यही सोच मैं कुछ अपवादों को छोड़कर ज्यादातर मुसलमान मित्रोें में नहीं देखता हूं।

ये दुनिया को कहां ले जाना चाहते हैं? भारत में एक साक्षी महाराज का कोई बयान आता है तो हम उनकी मिट्टी पलीद कर देते हैं। उनकी आलोचना करने वालों में हिन्दुओं की संख्या ज्यादा होती है। कोई भी ऐसा बयान देता है जो इस देश की सर्वधर्म समभाव यानी सभी धर्मों में एक ही भाव का विचार है के विपरीत बयान देता है तो उसका जीना हम मुहाल कर देते हैं और करते रहेंगे, क्योंकि यह हमारी संस्कृति है। किंतु इसके समानांतर वैसा ही हमला मुस्लिम समुदाय के भीतर से अपने यहां के वैसै लोगों पर नहीं होता जो बिल्कुल घृणा और सांप्रदायिकता का बयान देते हैं। वो खामोश रहकर एक प्रकार से उनका समर्थन करते हैं। असदुद्दीन ओवैसी कौन से शांति और सामाजिक एकता की बात कर रहे हैं!
मीडिया में पूछने पर हिंसा, या सांप्रदायिक बयानों पर जरुर मुस्लिम मजहबी या राजनीतिक नेता कहते हैं कि ये गलत है, पर कभी उसके विरुद्ध सामूहिक विरोध प्रदर्शन नहीं होता है। म्यान्मार में दंगा होता है और आप मुंबई से लेकर लखनउ तक हिंसा और आगजनी का तांडव करते हैं, पर आलोचना के अलावा मुस्लिम समाज के अगुवा कभी हिम्मत से इनके खिलाफ नहीं आते। उनसे बातें करिए तो कहेंगे कि अरे म्यान्मार में मुसलमानों के साथ बहुत अत्याचार हुआ। यानी आप परोक्ष तौर पर हिंसा का समर्थन करते हैं।
आतंकवाद की आलोचना होती है, पर किसी आतंकवादी संगठन के विरुद्ध ये लड़ने के लिए आगे नहीं आते। उल्टे भारत की सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई पर प्रश्न खड़ा करते हैं। इंडियन मुजाहीद्दीन के बारे में पूछेंगे कि इसका दफ्तर कहां है? कौन इसका नेता है? विचित्र स्थिति है। सिमी को तो आज तक मुस्लिम नेता आतंकवादी समूह बन जाना स्वीकार ही नहीं करते, जबकि उस पर प्रतिबंध लगाने पर उच्चतम न्यायालय ने दो-दो बार मुहर लगाई।

मुस्लिम नेता यह मानने को तैयार नहीं कि उनके समाज के अंदर ऐसा कोई देाष है। वे सारा दोष इस देश की व्यवस्था पर डालते हैं। आतंकवाद की बात करने पर अमेरिका और यूरोप की नीतियां सुनाने लगते हैं। इसलिए मैं ईद पर क्या मुबारकबाद दूं। पूरे रमजान महीने में हिंसा करने वालों के खिलाफ कहीं से सामूहिक आवाज नहीं उठना भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है। दुनिया का या भारत का तो जो होगा सो होगा, लेकिन इससे मुसलमान समाज स्वयं अपना विनाश कर देगा जिसकी शायद इन्हें आज कल्पना नहीं है।

एक अत्यंत खतरनाक और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू मुझे अपने मुसलमान मित्रों की सोच में दिखाई देता है। ज्यादातर मानते हैं कि भारत की व्यवस्था उनके साथ अन्याय करती है। भारत में उनको उनका हक नहीं मिलता। अल्पसंख्यकों के नाम पर इतनी सुविधाएं हैं, पर इनको इस देश से केवल शिकायत है। ये हिन्दुओं में गरीबी, अशिक्षा नहीं देखते। जेल में बंद हिन्दुओं के साथ हुए अन्याय पता नहीं ये क्यों नहीं देख पाते। तो ये जो खतरनाक मानसिकता है कि भारत देश उनके साथ अन्याय या भेदभाव करता है वहीं से कट्टरता, देशविरोधी, हिंसा और आतंकवाद तक की सोच पैदा होती है।
मेरे लिए चिंता की बात यह है कि बढ़ती हुई मुस्लिम कट्टरता के समानातंर हिन्दुओं के एक वर्ग में भी उनके प्रति नफरत पैदा हो रहा है। आप देख सकते हैं जो लोग कल तक उनका बचाव करते थे वो सोशल मीडिया में उनके विरुद्ध किस तरह खुलकर लिख रहे है। यह सच है कि हिन्दू समाज में इनके विरुद्ध प्रतिक्रिया अत्यंत नकारात्मक है और यह किसी के लिए भी चिंता का कारण बनेगा।

आतंकवाद की आलोचना होती है, पर किसी आतंकवादी संगठन के विरुद्ध ये लड़ने के लिए आगे नहीं आते। उल्टे भारत की सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई पर प्रश्न खड़ा करते हैं। इंडियन मुजाहीद्दीन के बारे में पूछेंगे कि इसका दफ्तर कहां है? कौन इसका नेता है? विचित्र स्थिति है। सिमी को तो आज तक मुस्लिम नेता आतंकवादी समूह बन जाना स्वीकार ही नहीं करते, जबकि उस पर प्रतिबंध लगाने पर उच्चतम न्यायालय ने दो-दो बार मुहर लगाई।

लेकिन कोई मुस्लिम नेता यह मानने को तैयार नहीं कि उनके समाज के अंदर ऐसा कोई देाष है। वे सारा दोष इस देश की व्यवस्था पर डालते हैं। आतंकवाद की बात करने पर अमेरिका और यूरोप की नीतियां सुनाने लगते हैं।
इसलिए मैं ईद पर क्या मुबारकबाद दूं। पूरे रमजान महीने में हिंसा करने वालों के खिलाफ कहीं से सामूहिक आवाज नहीं उठना भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है। दुनिया का या भारत का तो जो होगा सो होगा, लेकिन इससे मुसलमान समाज स्वयं अपना विनाश कर देगा जिसकी शायद इन्हें आज कल्पना नहीं है।

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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