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अगर मोदी ने गलत किया तो पाकिस्तान में क्यों हो रहा है नवाज का भारी विरोध

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अवधेश कुमार

भारत में एक वर्ग ने जिस ढंग से उफा में नरेन्द्र मोदी और नवाज शरीफ की बातचीत और साझा वक्तव्य की आलोचना करनी शुरु कर दी हैं, जिस ढंग से मोदी पर इन प्रश्नों के साथ हमले हो रहे हैं कि आखिर पाकिस्तान में क्या बदल गया कि आप बातचीत को तैयार हो गए? गोली बम और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते का हुंकार कहां गया? आखिर ऐसा क्या बदल गया कि आपने बातचीत कर ली? इस बातचीत से आपने पाया क्या?

इन महाज्ञानियों को समझाना किसी के वश में नहीं, क्योंकि ये जानबूझकर केवल इसलिए बोल रहे हैं कि इनने तय कर लिया है कि विरोध करना है। मैंने अपनी टिप्पणी में उस बैठक, बातचीत और साझा वक्त्वयों पर चर्चा की थी। आप सबने पढ़ी होगी। अपने यूट्यूब विडियों विश्लेषण में भी इसको समझाने की कोशिश की थी।

मैं ऐसा करने वालों को केवल यह बताना चाहता हूं कि पाकिस्तान में नवाज शरीफ का विरोध आरंभ हो गया है। भारी विरोध हो रहा है। उन्हें मोदी के सामने झुकने वाला तथा पाकिस्तान का हित गिरवी रखने वाला कहा जा रहा है। तो इसमें सच क्या हो सकता है? या तो मोदी ने देशहित से समझौता किया या फिर नवाज ने? दोनों तो एक साथ नहीं कर सकते।

तो हमारे देश के महान विभूतियों के लिए तथा आपके लिए भी यहां पाकिस्तान की प्रतिक्रियाआंे को दे रहा हूं। उसे पढ़ें और फिर निष्कर्ष निकालें

पीपीपी नेता एवं पूर्व गृह मंत्री रहमान मलिक ने कहा कि यह पाकिस्तान का अपमान था, क्योंकि मोदी बैठक में ‘अहंकारी’ थे और बैठक में ‘रूस के जार’ की तरह व्यवहार कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘शरीफ के प्रति मोदी का व्यवहार बेहद असम्मानजनक था और वह एक जार की तरह बर्ताव कर रहे थे। उन्होंने नवाज को अपने ‘सिंहासन’ तक आने के लिए एक लंबे गलियार से गुजरने पर मजबूर किया।’

मलिक ने कहा कि मोदी ने अपने समकक्ष नेता के लिए थोड़ा सा भी राजनयिक शिष्टाचार नहीं दिखाया। उन्होंने नवाज की तरफ एक कदम भी नहीं बढ़ाया।

व पीपीपी की वरिष्ठ नेता एवं अमेरिका में पाकिस्तान की पूर्व राजदूत शेरी रहमान ने कहा कि बैठक भारत के लिए ‘एकपक्षीय’ था। उन्होंने कहा, ‘हम मोदी का सार्क सम्मेलन में स्वागत करते हैं और हम प्रधानमंत्री शरीफ के शांति प्रयासों का भी समर्थन करते हैं, लेकिन द्विपक्षीय संबंधों में सफलता तभी मिल सकती है जब दोनों ओर की चिंताओं को सफलतापूर्वक प्रेषित किया जाए।’

 

पाकिस्तान तहरीके इंसाफ ने कहा कि मोदी को निमंत्रण अनावश्यक था और यह ‘कूटनीतिक प्रोटोकॉल की जरूरतों से परे था।’

तहरीके इंसाफ पार्टी की उपाध्यक्ष शिरीन मजारी ने कहा कि शरीफ कश्मीर मुद्दा और बलूचिस्तान में भारत की संलिप्तता का मुद्दा उठाने में असफल रहे। उन्होंने कहा कि नवाज ने जिस तरीके से भारत का ‘तुष्टीकरण’ किया उससे वह निराश हैं। उन्होंने कहा, ‘मोदी ने मुंबई हमले का मामला उठाया और शरीफ ने जांच में तेजी लाने पर सहमति जताई। शरीफ ने समझौता एक्सप्रेस पर एक शब्द भी नहीं कहा।’

 

तहरीके इंसाफ नेता एवं पूर्व विदेश मंत्री महमूद कुरैशी ने कहा कि संयुक्त घोषणापत्र में कश्मीर का उल्लेख होना चाहिए था।

पाकिस्तान मुस्लिम लीग-कायद के अध्यक्ष एवं पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी शुजात हुसैन ने कहा कि जब तक मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं, बातचीत से कुछ भी नहीं निकलने वाला।———————————————————————————————

 

पाकिस्तान की मीडिया

‘द न्यूज इंटरनैशनल’ ने अपनी प्रमुख खबर में अधिकारियों के हवाले से कहा कि पाकिस्तान खुश नहीं हैं, क्योंकि वह पूर्ण वार्ता प्रक्रिया के शुरू होने की उम्मीद कर रहा था।

 

‘द नेशन’ अखबार अखबार ने इस मुलाकात के मद्देनजर नवाज शरीफ को नाकाम करार दिया है। भारत पर भी आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। अखबार ने शरीफ को नाकाम भी इसी आधार पर बताया है कि वह मोदी के सामने ‘भारत की ओर से फैलाए जा रहे आतंकवाद’ का मुद्दा नहीं उठा पाए।

‘द नेशन’ अखबार के पत्रकार साजिद जिया ने संपादकीय लेख में लिखा, “भारत की जमीन पर पनपने वाले आतंकवाद के मुद्दे को उफा जैसे इंटरनेशनल स्टेज पर उठाया जा सकता था। लेकिन नवाज शरीफ इसमें फेल हो गए। वे मुलाकात के दौरान मुंबई हमले की जांच में घिर गए और उसी पर सफाई देते रहे। इसके इतर शरीफ को भारतीय नेता बलूचिस्तान में रॉ की कारगुजारियों के बारे में बताना चाहिए था। कराची के अलावा देश के कई शहरों में हिंसा में भारतीय फंडिंग का मुद्दा उठाना चाहिए था।”

द नेशन

मुंबई हमलों की जांच के मुद्दे पर नवाज शरीफ घिर गए। वे नाकाम साबित हुए।

 

कुछ अच्छे स्वर

द डॉन’

अखबार ‘द डॉन’ ने ‘शरीफ-मोदी मीटिंग’ हेडलाइन से अपने एडिटोरियल में लिखा- “भारत-पाक रिश्तों में तरक्की इस पर निर्भर करती है कि इसका इन्वेस्टमेंट पॉलिटिकल लीडरशिप में किया गया है या नहीं।” यह भी लिखा गया है कि शरीफ का रुख साफ है, पर दूसरी संस्थाएं खासकर सेना को वे अब तक भरोसे में नहीं ले पाए हैं, जबकि मोदी ठीक इसके उलट जाकर संबंधों में सुधार की गुंजाइश देख रहे हैं।

 

एडिटोरियल में यह भी लिखा है कि दोनों पक्षों को यह भी बताने की जरूरत है कि वह यह सब महज दुनिया को दिखाने के लिए नहीं कर रहा। हालांकि, अखबार ने मोदी द्वारा संबंधों में नई मिठास लाने की कोशिशों का स्वागत किया है।

 

एक्सप्रेस ट्रिब्यून

 

अखबार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने ‘समिट होप्स’ हेडलाइन से अपने एडिटोरियल में लिखा- प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया मुलाकात भले ही ‘डिप्लोमैटिक कोरियोग्राफी’ की तरह लगे, पर यह उम्मीदों से भरी हुई लगती है। एडिटोरियल में इसके पीछे का तर्क यह दिया गया है कि भारतीय नेताओं द्वारा भड़काऊ बयान और लाइन ऑफ कंट्रोल पर दोनों देशों के बीच महीनों के संघर्ष के बावजूद भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते नए मुकाम पर है।

 

द एक्सप्रेस ट्रिब्यून

मोदी-नवाज की मुलाकात डिप्लोमैटिक कोरियाग्राफी की तरह हो सकती है, लेकिन यह उम्मीदों से भरी रही।

हामिद मीर, जियो न्यूज के एडिटर

प्रधानमंत्री मोदी सार्क सम्मेलन में आने को राजी हुए हैं। ज्यादातर पाकिस्तानियों ने इसकी उम्मीद भी नहीं की थी। आखिर 10 साल के लंबे कार्यकाल में मनमोहन सिंह इसकी हिम्मत नहीं दिखा सके थे। भारत में कई लोगों को लगता है कि इस्लामाबाद की फॉरेन पॉलिसी फौज तय करती है। डीजीएमओ में सीधी मुलाकात होगी तो भारत को पता चल जाएगा कि प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और जनरल राहील शरीफ एकमत हैं। उम्मीद है नवाज शरीफ मुंबई हमले के मुकदमे में तेजी लाएंगे।

 

पाकिस्तान में कई लोग साझा बयान में कश्मीर शब्द नहीं होने पर सवाल उठा रहे हैं। इससे शरीफ को समस्या नहीं आएगी। पिछले साल के मुकाबले उनकी स्थिति मजबूत है। वह भारत के साथ बिजनेस आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं, लेकिन कश्मीर की कीमत पर नहीं। उनका सोचना है कि पाकिस्तान और भारत, कश्मीर और बिजनेस दोनों पर साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं। नवाज शरीफ कई मुद्दों पर लचीलापन दिखा सकते हैं। लेकिन इसे कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए।

 

 

 

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Awadhesh Kumar
A well known Public figure,Tv Panellist, Versatile senior Journalist,writer, popular public speaker in high demand, Political Analyst as well as Social Political Activist.

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